Saturday, September 13, 2008

न्यूक्लियर बम का फॉर्मूला इंटरनेट पर


नई दिल्ली। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग ने पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान के नेटवर्क पर ईरान, उत्तरी कोरिया और लिबिया को परमाणु तकनीकि मुहैया कराने का सनसनीखेज आरोप लगाया है।
संयुक्त राष्ट्र के परमाणु आयोग ने एक रिपोर्ट में कहा है कि परमाणु बम का ब्लूप्रिंट इंटरनेट पर मौजूद है। जिससे ये पता चलता है कि लीबिया को इंटरनेट के जरिए परमाणु बम के ब्लू प्रिंट मिले हैं। इस तरह के गंभीर दस्तावेज का इंटरनेट पर होना सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक है।
इसके अलावा रिपोर्ट में चार साल तक लीबिया के परमाणु हथियार कार्यक्रमों जांच और तथाकथित परमाणु सौदे में ए क्यू खान का संबंध का जिक्र है।
साथ ही आईएईए ने यह भी आशंका जताई है कि ईरान और उत्तरी कोरिया के पास भी इसी तरह के ब्लूप्रिंट हो सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अलबरदेई इस मुद्दे पर कहा कि यह परेशान करने वाला विषय है।
पाकिस्तान के डॉन न्यूज के संवाददाता मुबाशिर जैदी ने सीएनएनआईबीएन से बातचीत में कहा कि विदेश विभाग की ओर से कहा गया है कि यह पुरानी रिपोर्ट है जिसमें खान को शामिल बताया गया था। और आई क्यू खान ने एक निजी टीवी चैनेल पर इस बात को स्वीकार भी किया था।
इस मामले के बाद उनको नजरबंद कर दिया गया था और वह आज भी नजरबंद हैं। अधिकारी इस बात को पुरानी बताने की कोशिश कर रहे हैं कि इसमें कुछ भी नया नहीं है। उन्होंने कहा कि लेकिन कुछ लोग इस मामले के जरिए दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं और इससे यह जानना चाहते हैं कि हमारे देश की सीमा पर क्या हो रहा है।

खांसने के बाद 50 प्रतिशत भारतीय हाथ नहीं धोते


कोलकाता। भारत में कम से कम 50 प्रतिशत लोग खांसने और छींकने के बाद अपने हाथों को नहीं धोते हैं। यह जानकारी शुक्रवार को जारी एक अध्ययन रिपोर्ट से मिली।
डेटॉल लिक्विड एंटीसेप्टिक के निर्माता 'रेस्किट बेंकिशर (इंडिया) लिमिटेड' और 'ग्लोबल हायजेनिक काउंसिल' (जीएचसी) के एक संयुक्त अध्ययन से पता चला कि भारत के 78 प्रतिशत घरों की सतहों पर बैक्टीरिया का स्तर असंतोषजनक है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यहां के 90 प्रतिशत रसोई घरों की सतह पर, 83 प्रतिशत रसोई घरों के सिंक और 85 प्रतिशत नलों में अत्यधिक रूप में बैक्टीरिया पाए जाते हैं।
अध्ययन के अनुसार केवल छह प्रतिशत भारतीय यह मानने को तैयार हैं कि रसोई घरों में लगे नल बीमारी फैला सकते हैं। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2006 में शुरू हुए इस संयुक्त अध्ययन को देश के छह महानगरों में तीन विभिन्न स्तरों पर चलाया गया था।

कॉलेज फीस के लिए वो करेगी कौमार्य नीलाम


कैलिफोर्निया। अमेरिका में एक कॉलेज की छात्रा ने इन दिनों सनसनी फैला रखी है। साथ ही उसने समाज में एक बहस भी छेड़ दी है।
दरअसल इस लड़की ने अपने कुंआरेपन की नीलामी करने की ठानी है। उसकी नीलामी एक सरकारी वेश्यालय की वेबसाइट पर होगी और इसका प्रसारण होगा एक स्थानीय रेडियो पर। छात्रा का दावा है कि कॉलेज फीस भरने और घर वालों की आर्थिक मदद करने के लिए वो ऐसा कर रही है और इसका उसे कोई अफसोस भी नहीं।
22 साल की नतालिया प्राइमरी स्कूल के टीचर की बेटी है। वो बला की खूबसूरत है। ग्रैजुएट है लेकिन उसकी तमन्ना है और पढ़ाई करने की। फीस जुटाने के लिए कैलिफोर्निया के सैन डियागो के साइरस रेडियो पर उसके कुंआरेपन की नीलामी होगी।
रेडियो पर पैसे वाले लगाएंगे कुंआरेपन की बोली। जिसकी बोली सबसे ज्यादा होगी और जो सबसे बेहतर होगा उसे नतालिया के साथ शारीरिक संबंध बनाने का अधिकार मिलेगा।
नतालिया का दावा है कि वो और पढ़ना चाहती है, लेकिन कॉलेज की फीस भरने के लिए उसके पास पैसे नहीं हैं। वो अपने घरवालों की भी आर्थिक मदद करना चाहती है, लेकिन मजबूर है।
आसानी से और ज्यादा पैसे कमाने का उसे और कोई जरिया नहीं सूझा तो उसने अपने कुंआरेपन का सौदा करने का फैसला किया।
इस फैसले पर न तो उसे मलाल है और न दुनिया की परवाह। शॉक जॉक के नाम से मशहूर साइरस रेडियो के मशहूर जॉकी होवार्ड स्टर्न से नतालिया ने नीलामी की बात की। स्टर्न से उसकी मुलाकात करवाई एक स्थानीय कानूनी वेश्यालय के मालिक ने।
वहां नतालिया की बहन काम करती है। नतालिया कहती है-मुझे पता है कि कुछ लोग मेरी वर्जिनिटी को लेकर सवाल उठाएंगे। लेकिन अगर कोई चाहे तो मैं डॉक्टरों से इसकी जांच कराने को तैयार हूं। पढ़ाई और परिवार के लिए अपने कुंआरेपन की नीलामी।
आपको नतालिया का दावा हजम हो या न हो लेकिन पश्चिमी देशों की ये एक कड़वी सच्चाई है। वैसे भी जब किसी भी तरह से पैसा कमाना ही मकसद हो तो फिर दूसरी बहस बेमानी हो जाती है।

Monday, September 8, 2008

आपरेशन के दौरान हो नए नियमों का पालन


Sep 07, 03:40 pm
नई दिल्ली। शल्यक्रिया विशेषज्ञों का कहना है कि शल्यक्रिया की खामियों को रोकने और मरीज की सुरक्षा को बेहतर करने के उद्देश्य से विश्व स्वास्थ्य संगठन [डब्ल्यूएचओ] द्वारा आपरेशन थियेटरों के लिए जारी नई सुरक्षा जांच सूची का पालन अनिवार्य किया जाना चाहिए। डब्ल्यूएचओ ने शल्यक्रिया के दौरान होने वाली गलतियों और मरीज की सुरक्षा के प्रति बढ़ती लापरवाही को रोकने के उद्देश्य से हाल ही में डब्ल््यूएचओ सर्जिकल सेफ्टी चेकलिस्ट जारी की है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक प्रतिवर्ष 23 करोड़ चार लाख बड़ी शल्यक्रियाएं होती हैं।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में शल्यक्रिया विभाग के प्रमुख डा. एमसी मिश्रा ने इस संबंध में पूछे जाने पर बताया कि शल्यक्रिया की खामियों को रोकने और मरीज की सुरक्षा को बेहतर करने के लिए डब्ल्यूएचओ द्वारा आपरेशन थियेटरों के लिए हाल ही जारी नई सुरक्षा जांच सूची का पालन सभी अस्पतालों में वर्तमान समय में अनिवार्य किया जाना चाहिए। डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डा. मागर्रेट चांग का इस संबंध में कहना है, रोकी जा सकने वाली शल्यक्रिया की चोटें और मौत गंभीर विषय बनते जा रहे हैं। शल्यक्रिया के दौरान होने वाली गलतियों और मरीज की सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए जांच सूची का प्रयोग करना सर्वश्रेष्ठ तरीका है।
डा. मिश्रा ने बताया कि प्रत्येक अस्पताल को सुरक्षित शल्यक्रिया और गुणवत्ता तथा उपभोक्ता के मुद्दे को गंभीरता से लेना चाहिए और इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। यदि इस जांच सूची का सही पालन किया जाएगा तो सुरक्षित शल्यक्रिया के लक्ष्य को हासिल करने में कोई परेशानी नहीं होगी। एक प्रश्न के उत्तर में डा. मिश्रा ने कहा कि प्रत्येक अस्पताल को उपभोक्ता की स्वास्थ्य सुरक्षा और हितों का ध्यान रखते हुए सरकार द्वारा अस्पतालों और चिकित्सा देखभाल संस्थानों के लिए बनाए गए राष्ट्रीय मान्यता बोर्ड [एनएबीएच] से मान्यता प्रमाण पत्र लेना भी अनिवार्य होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा होने पर अस्पतालों में सुरक्षित शल्यक्रिया व्यवस्था, गुणवत्ता और उपभोक्ता हितों की रक्षा में अपने-आप सुधार आ जाएगा, लेकिन दुख इस बात का है इस देश के सरकारी अस्पताल इसके लिए तैयार नहीं है। इसका प्रमाण यह है कि पिछले तीन साल के दौरान केवल 25 अस्पतालों ने इस प्रकार का प्रमाण पत्र लिया है।
अपोलो अस्पताल के हड्डी रोग विशेष डा. राजू वैश्य ने कहा कि डब्ल्यूएएचओ की नई सुरक्षा जांच सूची के पालन से रोगी के हितों की रक्षा होगी और अस्पताल को भी लाभ मिलेगा। जनता का उन पर विश्वास बढ़ेगा और अस्पतालों में एक नया माहौल बनेगा। हमारे यहां सभी अस्पतालों में अभी इन बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है।
डब्ल्यूएचओ ने शल्यक्रिया से संबंधित अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पिछले कुछ दशकों में शल्यक्रिया देखभाल और गुणवत्ता में काफी सुधार देखने में आया है, लेकिन निराशाजनक रूप से दुनिया के विभिन्न भागों में परिस्थितियों में अंतर है और इस अंतर को कम करने का हरसंभव प्रयास किया जाना चाहिए। डब्ल्यूएचओ सर्जिकल सेफ्टी चेकलिस्ट सूची में आपरेशन के तीन चरणों की पहचान की गई है। ये चरण हैं मरीज को एनस्थीसिया देने से पहले शल्य चिकित्सा प्रारंभ होने से पूर्व और मरीज के आपरेशन थियेटर से बाहर निकलने से पहले। अभी जांच सूची का पहला अंक ही जारी किया गया है।
प्रत्येक चरण में जांच सूची समन्वयक यह सुनिश्चित करता है कि आगे बढ़ने से पहले शल्यक्रिया दल ने अपना काम पूरा कर लिया है या नहीं। प्रथम चरण में मरीज के ज्ञात संक्रमणों की जांच की जाती है और अंतिम चरण में शल्यक्रिया से संबंधित सामान की गिनती की जाती है। जांच सूची का उद्देश्य मरीजों की अपेक्षाओं के अनुरूप स्तर को बढ़ाना है। अनेक अध्ययनों में यह साबित हुआ है कि विकसित देशों में बड़ी शल्यक्रिया के दौरान 5 से 10 प्रतिशत मरीजों की मौत हो जाती है। उप सहारा अफ्रीका में 150 मरीजों में से एक की मौत जनरल एनस्थीशिया के कारण होती है। व्यावसायिक देशों में तीन से 16 प्रतिशत मरीजों को बड़ी जटिलताओं से जूझना पड़ता है। वहां संक्रमण और अन्य जटिलताएं भी गंभीर विषय हैं।

गुजरात: परीक्षा में पुस्तक ले जाने को मंजूरी


Sep 08, 11:38 pm
गांधीनगर। गुजरात शिक्षा बोर्ड ने सोमवार को एक अहम फैसले में कक्षा आठवीं, नवमी तथा दसवीं की परीक्षा में पुस्तकें ले जाने को मंजूरी दे दी है। आगामी मानसून सत्र में इस प्रस्ताव पर राज्य सरकार की मुहर लगने की संभावना है। मुख्यमंत्री ने शिक्षक दिवस पर इस नीति की वकालत की थी।
गुजरात शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष आर के पाठक ने बताया कि सोमवार को शिक्षा समिति, परीक्षा समिति तथा कार्यकारी समिति की बैठक हुई जिसमें कक्षा 8, 9 तथा दसवीं की परीक्षा में पुस्तकें ले जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। बोर्ड का प्रयास है कि वर्ष 2008-09 में ही इस फैसले को लागू कर दिया जाए।
गौरतलब है कि शिक्षक दिवस पर राज्य के बच्चों को सेटेलाइट के माध्यम से संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने परीक्षा में पुस्तकें ले जाने की वकालत की थी। पाठक ने बताया कि बोर्ड की ओर से इस पर पहले से विचार किया जा रहा था। मुख्यमंत्री के बयान के बाद उनकी नीति को बल मिला। सूत्रों का मानना है कि बोर्ड की मंजूरी के बाद अब इसे सरकार से भी स्वीकृति मिलने की संभावना है।

Sunday, August 31, 2008

चींटियों की एकजुटता...


(मारवाड़ न्यूज़)चींटियों के बारे में यह कहा जाता है कि वो बड़े संगठित रूप से बस्तियों में रहती हैं. कहीं जाती हैं तो एक साथ जाती हैं लेकिन वो सीधी क़तार में कैसे चल पाती हें! यह चमत्कार होता है फ़ैरोमोंस से. चींटियों में कुछ ग्रंथियाँ होती हैं जिनसे फ़ैरोमोंस नामक रसायन निकलते हैं. इन्हीं के ज़रिए वो एक दूसरे के संपर्क में रहती हैं. चींटियों के दो स्पर्शश्रंगिकाएं या ऐंटिना होते हैं जिनसे वो सूंघने का काम करती हैं. रानी चींटी भोजन की तलाश में निकलती है तो फ़ैरोमोंस छोड़ती जाती है. दूसरी चीटियाँ अपने ऐंटिना से उसे सूंघती हुई रानी चींटी के पीछे-पीछे चली जाती हैं. जब रानी चींटी एक ख़ास फ़ैरोमोन बनाना बंद कर देती है तो चीटियाँ, नई चींटी को रानी चुन लेती हैं. फ़ैरोमोंस का प्रयोग और बहुत सी स्थितियों में होता है. जैसे अगर कोई चींटी कुचल जाए तो चेतावनी के फ़ैरोमोन का रिसाव करती है जिससे बाक़ी चींटियाँ हमले के लिए तैयार हो जाती हैं. फ़ैरोमोंस से यह भी पता चलता है कि कौन सी चींटी किस कार्यदल का हिस्सा है.

कोहिनूर हीरा कहाँ रखा है?


लंदन टॉवर, ब्रिटेन की राजधानी लंदन के केंद्र में टेम्स नदी के किनारे बना एक भव्य क़िला है जिसे सन् 1078 में विलियम द कॉंकरर ने बनवाया था. इसके लिए पत्थर फ़्रांस से मंगाए गए थे. इस परिसर में और भी कई इमारतें हैं. यह शाही महल तो था ही, साथ ही यहां राजसी बंदियों के लिए कारागार भी था और कई को यहां मृत्यु दंड भी दिया गया. हैनरी अष्टम ने अपनी रानी ऐन बोलिन का 1536 में यहीं सर क़लम कराया था और कहते हैं कि अब भी वो अपना सिर बगल में लिए क़िले में घूमती दिखाई दे जाती हैं. हां, इस क़िले की एक विशेषता और है कि यहां हमेशा से काले कौवे रहते आए हैं और यह किम्वदन्ती है कि जिस दिन ये कौवे टावर ऑफ़ लंडन छोड़ कर चले जाएंगे बस तभी राजशाही समाप्त हो जाएगी. राजपरिवार इस क़िले में नहीं रहता है लेकिन शाही जवाहरात इसमें सुरक्षित हैं जिनमें कोहिनूर हीरा भी शामिल है.

आयुर्वेदिक दवाएँ संदेह के घेरे में

(मारवाड़ न्यूज़)
हाल के वर्षों में विदेशों में आयुर्वेदिक दवाओं का प्रचलन बढ़ा है
इंटरनेट पर बेचे जाने वाली भारतीय आयुर्वेदिक दवाइयों में से हर पाँचवें में ऐसे तत्व पाए गए हैं जो स्वास्थ्य के लिए ख़तरनाक हो सकते हैं.
अमरीका की बोस्टन यूनिवर्सिटी में हुए एक शोध में यह बात सामने आई है. शोधार्थियों ने भारत और अमरीका में बनने वाली दवाओं की जाँच के बाद यह निष्कर्ष निकाला है.
शोध में इंटरनेट पर बिकने वाली 193 आयुर्वेदिक दवाओं की जाँच की गई जिनमें से क़रीब 20 प्रतिशत दवाओं में सीसा, पारा और आर्सेनिक पाया गया.
शोधार्थियों का कहना है कि कुछ दवाओं में तय सीमा से बहुत अधिक मात्रा में ऐसे पदार्थ पाए गए जो स्वास्थ्य के लिए घातक हैं.
हज़ारों वर्षों से भारत में प्रचलित आयुर्वेदिक औषधियाँ हाल के वर्षों में विदेशों में भी ख़ूब इस्तेमाल की जा रही है.
आयुर्वेदिक औषधि बनाने वालों का कहना है कि जब धातुओं और जड़ी-बूटियों का ठीक से मिश्रण कर उसे कुशलतापूर्वक तैयार किया जाता है तब वह स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित होता है.
कड़े नियम जरुरी
शोध के निर्देशक डॉक्टर रॉबर्ट सैपर का कहना है कि इस जाँच के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि इन दवाओं के सेवन को लेकर कड़े नियम बनाने की ज़रुरत है.
उन्होंने कहा कि यह भी तय किया जाना चाहिए कि कितनी मात्रा में प्रति दिन इन पदार्थों का सेवन किया जा सकता है और उत्पादकों को स्वतंत्र रुप से इन दवाओं की जाँच करनी चाहिए.
सैपर का कहना था कि पिछले 30 वर्षों में इन औषधियों के इस्तेमाल के कारण 80 ऐसे मामले सामने आए हैं जिसमें सीसा का इस्तेमाल जानलेवा साबित हुआ.
ब्रिटेन ने पंजीकरण व्यवस्था की शुरुआत कर दी है. वहाँ अगले तीन वर्षों में उन आयुर्वेदिक दवाओं को बेचने पर प्रतिबंध होगा जिन्हें लाइसेंस नहीं मिला है.
हालांकि ब्रिटेन के बाहर आयुर्वेदिक दवा बनाने वालों पर इस तरह के नियम लागू नहीं होते हैं.

Tuesday, August 19, 2008

जांगिड़ को राष्ट्रपति पुलिस पदक


चेन्नई। पुलिस आयुक्त चेन्नई (उपनगरीय) सांगाराम जांगिड़ समेत तमिलनाडु के सात पुलिस अधिकारियों को राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया गया है। राजस्थान के बाड़मेर जिले के मूल निवासी जांगिड़ ने पिछले साल कृष्णगिरि जिले में होसूर के पास आतंक के पर्याय बन चुके वेलै रवि को मार गिराने के अलावा चेन्नई शहर के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त रहते हुए दस साल से हत्या एवं लूटपाट में लिप्त बावरिया गिरोह को पकड़ने में अहम भूमिका निभाई। राजस्थान के बाड़मेर जिले के छोटे से गांव बांद्रा में जन्मे जांगिड़ ने प्रारम्भिक शिक्षा अपने गांव से सात किलोमीटर दूर कवास और उच्च शिक्षा बाड़मेर एवं जयपुर में प्राप्त की।

सुरक्षित है स्वदेशी एड्स वैक्सीन


चेन्नई। देश में ही विकसित एक एड्स वैक्सीन के चिकित्सकीय परीक्षण का पहला चरण सफल साबित हुआ है।"इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर), नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गनाइजेशन (नाको) और इंटरनेशनल एड्स वैक्सीन इनीशिएटिव (आईएवीए) ने प्रारम्भिक स्तर पर इसे मरीजों के लिए सुरक्षित बताया है।परीक्षण के दौरान स्वयंसेवियों पर मॉडिफाइड वैक्सीनिया अंकारा (एमवीए) नामक इस वैक्सीन की दो खुराकों का उपयोग किया गया। तीन इंजेक्शनों के बाद कम खुराक लेने वाले लोगों में 82 फीसदी सुधार और पूरी खुराक लेने वाले लोगों में 100 फीसदी तक का सुधार देखा गया।आईसीएमआर के अतिरिक्त महानिदेशक एस.के. भट्टाचार्य ने कहा कि चेन्नई में जिन लोगों पर एमवीए का प्रयोग किया गया उनमें अप्रत्याशित सुधार देखा गया। हालांकि हम अभी यह नहीं कह सकते कि यह वैक्सीन पूरी तरह प्रभावी सिद्ध होगी।

Thursday, August 7, 2008

गर्भनिरोधक गोलियों के प्रति बढ़ा युवतियों का रूझान


एसएनबी
नई दिल्ली। वाकई यह चौंकाने वाला तथ्य है कि दिल्ली में अनुमानत: प्रतिदिन 300 से 350 किशोरियां गर्भपात कराती हैं जबकि महीने में ऐसी लड़कियों की संख्या करीब 12 से 14 हजार है। इनमें अधिकांशत: डॉक्टर की सलाह के बिना ही किया जा रहा है। यह खुलासा परिवार कल्याण निदेशालय की देखरेख में कराए गए सहेली नामक एक सर्वे में किया गया। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि बाजार में गर्भनिरोधक गोलियों की भरमार है। मगर, असुरक्षित संबंध बनाने की चाह ने उन्हें पेट में पल रहे मासूम की हत्या का दोषी माना जा सकता है।
सर्वे से जुडे़ विशेषज्ञों का मनाना है कि आपातकालीन गोलियों ने युवा दंपतियों मे न केवल पहचान बनाई है वहीं यह युवाओं के लिए जरूरत भी बनती जा रही है। साल 2005 से पहले डॉक्टर की पैरवी पर ही इमरजेंसी कोंट्रासेप्टिव पिल्स यानी ईसी मिलती थी। मगर, इसकी जबर्दस्त मार्केटिंग के बाद तो कोई भी महिला या युवती किसी भी कैमिस्ट की दुकान से सहजता से खरीद रही है। हालांकि स्वास्थ्य मंत्रालय का मानना है कि आईपिल परिवार नियोजन में काफी मददगार साबित हो रहा है। 
देश में प्रतिवर्ष 50 लाख गर्भधारण होते हैं। इनमें से 30 फीसद मामलों में गर्भपात कराया जाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 75 प्रतिशत गर्भधारण अनिच्छा या बिना प्लान के ही हो जाते हैं। करीब 20 हजार मौंते एबार्शन के वक्त जटिलता के कारण होती है। इसलिए अनचाहा गर्भधारण और बेवजह की मौत रोकने में ईसी और आईपिल जैसी गोलियां कारगर साबित हो सकती हैं। परिवार कल्याण निदेशालय के निदेशक डॉ. एक जैना के अनुसार सर्वे में 20 से 35 साल की 20 हजार महिलाओं को शामिल किया गया था, जिसे नौ जिलों में विभाजित किया गया था। इनमें कॉलेज, कार्यालयों में कामकाजी व घरेलू महिलाओं को शामिल किया गया था जिन्होंने अनचाहे गर्भ से निजात पाने के लिए आईपिल दवाओं का मनमर्जी से इस्तेमाल करने की बात स्वीकारी। वर्ष 2005 में सरकार ने इस उत्पादन यानी ईसी पिल्स को रिप्रोडक्टिव एंड चाइल्ड हेल्थ प्रोग्राम में शामिल किया गया था। इसलिए इसकी कीमत में भी कटौती करने की मांग की गई। इसका दाम 40 रूपए से घटा कर पांच रूपए कर दी गई है। सरकार ने इस पिल्स के बारे में जागरूकता लाने के लिए जगह-जगह कैंप भी लगाने की रूपरेखा तैयार की है। इसके जरिए लोगों को आईपिल की हानियां व रोकथाम के बारे में जागरूक किया जाएगा। 
दिल्ली मेडिकल काउंसिल के सदस्य व नई दिल्ली नगर पालिका परिषद के फीजिशियन डॉ. अनिल बंसल के अनुसार आईपिल ब्रांड की गोलिया पिल-72 के नाम से बिक रही हैं। कंपनी ने इसे यही नाम दिया है। मतलब यह कि अगर परिवार नियोजन के दौरान कोई गलती हो जाए तो इसे 72 घंटे के अंदर लिया जा सकता है। अनचाहे गर्भ से मुक्ति तो मिलेगी ही मासूम की हत्या भी नहीं करनी होगी। इसके एक पैक में सिर्फ एक ही गोली होती है। इसमें लेवोनारजेलट्रान नामक हारमोन की मात्रा काफी कम होती है। अगर निर्धारित समय में यह गोली ले ली जाए तो गर्भधारण की 89 प्रतिशत संभावना कम हो जाती है। यह भी: दरअसल आईपिल्स आपातकालीन गर्भनिरोधक है, जिसे बहुत जरूरत पड़ने पर ही दंपति को प्रयोग से लाना चाहिए या दुष्कर्म की शिकार महिला को अनचाहे गर्भ से मुक्ति के लिए दिया जाना चाहिए। भ्रामक प्रचार से इसे मौज-मस्ती का साधन बना दिया है। कई यवतियां इसे मार्निंग आफ्टर पिल्स को इसलिए इस्तेमाल करते हैं ताकि उनके अवैध संबंध उजागर न हों। हैरत की बात है कि एक-साथ दो-तीन छुटि्टयां पड़ने पर आईपिल्स की मांग बढ़ जाती है। 
 
Last Updated[ 7/12/2008 1:48:05 AM] 

Sunday, July 27, 2008

तंबाकू का पौधा कैंसर में बड़े काम की चीज


वॉशिंगटन : अमेरिकी वैज्ञानिकों ने तंबाकू के पौधे से 'लिम्फोमा' के वैक्सीन का विकास किया है। लिम्फोमा एक तरह का कैंसर होता है। कैलिफोर्निया की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर तंबाकू के पौधे से लिम्फोमा के 'बी-सेल्स' के खिलाफ एक टीके का विकास कर रहे हैं। बीबीसी न्यूज ने बुधवार को बताया कि वैक्सीन को लिम्फोमा के मरीज के शरीर में प्रवेश कराया जाता है, ताकि शरीर में उन सेल्स से बचाव की क्षमता विकसित हो सके, जो लिम्फोमा की वजह बनती है। अगर यह प्रयोग सफल रहा, तो इसका मतलब यह होगा कि शरीर लिम्फोमा के सेल्स की पहचान कर उन्हें नष्ट कर सकेगा। 

शोध का नेतृत्व कर रहे रोनाल्ड लेवी ने कहा, 'यह तकनीक आश्चर्यचकित भी करती है, क्योंकि आप तंबाकू से कैंसर का इलाज़ करने का दावा कर रहे हैं।' इससे पहले पशुओं के सेल्स में यह प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने की कोशिश की गई, लेकिन उसमें मिली-जुली सफलता मिली। वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स पता लगाने के लिए इसका अभी कुछ ही मरीजों पर प्रयोग किया गया है। 

ताउम्र जवां बने रहना हो सकता है मुमकिन


पीटीआई(वॉशिंगटन)

जिंदगी भर जवां रहना आखिर कौन नहीं चाहेगा। अगर वैज्ञानिकों की मानें, तो उम्र बढ़ने के लिए जिम्मेदार जनेटिक प्रक्रिया को रोका जा सकता है।

रिसर्चर का कहना है कि बुढ़ापा की वजह शरीर में टूट-फूट नहीं, बल्कि एक जनेटिक प्रक्रिया होती है। अमेरिका की स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के रिसर्चरों ने बुढ़ापे की वजहों की अब तक कि थ्योरी को गलत बताया है। इससे उम्मीद जगी है कि साइंस के जरिए उम्र को बढ़ने से रोका या इसे उम्र को कम किया जा सकता है। डिवेलपमंट बायॉलजी एंड जनेटिक्स के प्रोफेसर स्टुअर्ट किम ने बताया कि सभी लोग मानते हैं कि बुढ़ापा जंग लगने से होता है। लेकिन फिर आप इस बात को कैसे सही ठहराओगे कि जानवर बूढ़े नहीं होते। उन्होंने कहा कि कछुए 100 साल की उम्र में अंडे देते हैं और वेल 200 साल जीती हैं। 


हमारे आंकड़े शरीर में होने वाले डैमिज़ के मौजूदा मॉडल से बिल्कुल अलग हैं। किम का कहना है कि कछुए और वेल जैसे जानवरों के डीएनए में प्रोटीन और वसा के वही ब्लॉक होते हैं जैसे कि मानवों, चूहों या दूसरे गोल कृमियों में होते हैं। स्टडी के मुताबिक बुढ़ापे का रासायनिक सिद्धांत और फ्री रेडिकल्स में टूट-फूट सभी सेल्स के लिए एक होती है। इस तरह यह बताना काफी कठिन हो जाता है कि क्यों कुछ प्रजातियों की जीवन अवधि अलग-अलग होती है। प्रोफेसर किम और उनके सहयोगियों ने गोल कृमियों का अध्ययन किया और पाया कि युवा और बूढ़े कृमियों में उम्र बढ़ने की तस्वीर अलग-अलग होती है। किम के अनुसार मानवों में भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए। 

योग से बढ़ती है एड्स से लड़ने की ताकत


एनबीटीः मेडिटेशन से एड्स के दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। अमेरिकी रिसर्चरों का अनुमान है कि इससे मरीज़ों की प्रतिरोधक क्षमता में सुधार होता है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया के शोधकर्ताओं के मुताबिक अगर बड़े स्तर पर भी ऐसे ही नतीज़े सामने आए, तो निश्चित तौर पर एड्स के खिलाफ लड़ाई में यह एक सस्ता और बिना तकलीफ वाला तरीका होगा। 

टीम ने लॉस ऐंजिलिस के 67 एचआईवी पॉज़िटिव लोगों पर एक छोटा सा टेस्ट किया था। इन मरीजों को तनाव कम करने के एक प्रोग्राम में शामिल किया गया। इसे माइंडफुलनेस मेडिटेशन का नाम दिया। इसमें जोर दिया गया कि लोग अपनी चेतना को अतीत के दुख और भविष्य की चिंताओं में लगाने की जगह वर्तमान के बारे में सोचें। मरीजों द्वारा दो महीने के इस मेडिटेशन प्रोग्राम में हिस्सा लेने से पहले और बाद में उनके सीडी4-टी सेल की गिनती कि गई थी। जैसे-जैसे वॉलंटियरों ने मेडिटेशन का समय बढ़ाया उनके शरीर में सीडी4-टी सेल की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई। इससे अंदाजा लगाया गया कि उनके शरीर का इम्यून सिस्टम या प्रतिरोधी तंत्र एड्स वायरस से आसानी से मुकाबला कर पा रहा है। 

इस स्टडी में अहम भूमिका निभाने वाले डेविड क्रेसवेल का कहना था कि स्ट्रेस मैनिजमंट प्रोग्राम और मेडिटेशन का सीधा असर एचआईवी की सक्रियता पर पड़ता है, और उसकी बढ़त धीमी पड़ जाती है। उन्होंने बताया कि ध्यान में भाग लेने वाले लगभग सभी लोग पहले तनाव से ग्रस्त थे। 

ब्रेन, बिहेवियर एंड इम्युनिटी नामके जर्नल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक इस स्टडी में भाग लेने वाले अधिकतर वॉलंटियर पुरुष, अफ्रीकन-अमेरिकन, होमोसेक्सुअल और बेरोजगार थे। इसके अलावा ये एंटी रिट्रोवायरल इलाज भी नहीं करा रहे थे। 

मेडिटेशन की क्लास में आठ हफ्तों तक हर रोज दो-दो घंटे के सेशन चलते रहे। वॉलंटियरों ने पूरी तरह इसका आनंद उठाया। केसवेल का कहना है कि मेडिटेशन का यह तरीका ग्रुप बेस्ड और बहुत सस्ता है। अगर इसके शुरुआती नतीजे आगे भी मिलते रहते हैं तो यह एड्स से लड़ने के लिए दवाइयों के कोर्स के साथ-साथ एक बढि़या तरीका साबित होगा। 

Friday, July 25, 2008

तीस सालों से अस्थियों को गंगा का इतंज़ार


हफ़ीज़ चाचड़
बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, कराची से
पाकिस्तान में कराची शहर के एक शमशान घाट में 100 से अधिक लोगों की अस्थियाँ गंगा नदी में विसर्जन के इंतज़ार में हैं. कराची में गूजर हिंदू समुदाय शमशान घाट में ये अस्थियां रखी हुई हैं. जिन लोगों की ये अस्थियाँ हैं उनकी आख़िरी इच्छा थी कि अस्थियाँ गंगा में विसर्जित की जाएँ. 

शमशान घाट के प्रबंधक महाराज महादेव ने बीबीसी को बताया, “यह अस्थियाँ कम से कम 30 वर्षों से पड़ी हैं, इन लोगों के परिजन भारतीय वीज़ा न मिलने की वजह से अस्थियों को हरिद्वार के पास गंगा में विसर्जति नहीं कर सके.” 

उन्होंने बताया कि भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों के अनुसार हरिद्वार में कोई रिश्तेदार या जान पहचान वाला हो तभी वीज़ा मिल सकता है. महाराज ने कहा, “ऐसे कई लोग हैं जिनका हरिद्वार में कोई नहीं है, ये ग़रीब लोग बार-बार वीज़ा के लिए इस्लामाबाद जाने का ख़र्च बर्दाश्त नहीं कर सकते थे.” 

इंतज़ार में...
  अस्थियाँ कम से कम 30 वर्षों से पड़ी हैं, इन लोगों के परिजन भारतीय वीज़ा न मिलने की वजह से इन अस्थियों को हरिद्वार के पास गंगा में विसर्जति नहीं कर सके
 
महाराज महादेव 



शमशान घाट प्रशासन ने एक पत्र लिख कर हिंदू समुदाय को सूचित किया है कि 100 के करीब अस्थियाँ पड़ी हैं जिनके बारे में पता नहीं है कि यह किस परिवार की हैं क्योंकि इन मटकों पर नाम मिट चुके हैं. 

महाराज महादेव का कहना है कि अस्थियाँ विसर्जित करने के लिए मरने वालों के परिजनों का उपस्थित होना ज़रूरी है, इसलिए यह पत्र लिखा गया है. 

1998 की जनसंख्या के अनुसार पाकिस्तान में करीब 24 लाख, 33 हज़ार हिंदू है और पिछले 10 सालों में हिंदुओं की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई है. हिंदू समुदाय अधिकतर सिंध प्रांत में रहते हैं. 

पाकिस्तान हिंदू परिषद के सदस्य हरी मोटवाणी ने बताया, “जो ग़रीब लोग भारत नहीं जा सकते, वह अपने परिजनों की अस्थियाँ सिंधू नदी में विसर्जित करते हैं.” 

उन्होंने कहा कि ज़रूरी नहीं है कि अस्थियों को भारत में ही विसर्जित किया जाए और यह तो परिवारजनों की मर्ज़ी पर निर्भर करता है.

पिछले कई सालों से भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में बहतरी के कारण वीज़ा नीति में नर्मी हुई है. 

इसी साल भारत से कई लोगों की अस्थियाँ ला कर सिंधू नदीं में विसर्जित की गई हैं जिनमें सिंधी साहत्यकार हरी मोटवाणी और सुप्रसिध गांधीवादी निर्मला देशपांडे शामिल हैं. 

हिंदू परिषद के सदस्य हरी मोटवाणी के अनुसार आजकल भारत सरकार आसानी से वीज़ा जारी कर रही है लेकिन कुछ दिक्कतें ज़रूर हो रही हैं.

उल्लेखनीय है कि शमशान घाट के प्रशासन ने इन अस्थियों के विसर्जन के लिए भारत सरकार से सपंर्क किया है. महाराज महादेव का कहना है कि यदि भारत सरकार की अनुमति मिल गई तो इन अस्थियों को गंगा नदी में विसर्जित किया जाएगा. 

उन्होंने पाकिस्तान सरकार से मांग की है कि वह इन अस्थियों के विसर्जन के लिए भारत सरकार से अनुरोध करे.

Wednesday, July 23, 2008

नैनो आई नहीं प्रतिबंध की मांग पहले


डीएनए
Wednesday, July 23, 2008 17:12 [IST]
मुंबई.देश में सस्ती कार के नाम से आने वाली नैनो कार भले ही अभी सड़क पर नहीं आई है, लेकिन इसकी दहशत अभी से नजर आने लगी है। महाराष्ट्र विधान परिषद में तो विपक्ष ने इस कार पर प्रतिबंध लगाने तक की मांग कर दी जिसे परिवहन राज्यमंत्री हसन मुशरिफ ने मंगलवार को खारिज कर दिया।
मुंबई में करीब 15 लाख गाड़ियां पहले से सड़कों पर दौड़ रही हैं। इनमें प्रतिदिन 15 हजार गाड़ियां और जुड़ जाती हैं। विपक्ष को अंदेशा है कि नैनो जैसी सस्ती कार के बाजार में आते ही उसे खरीदने वालों में भगदड़ मच जाएगी और प्रदूषण व वाहन संबंधी सारे नियम कायदे टूट जाएंगे। सड़कों पर जाम लग जाएगा और चलने के लिए कहीं जगह नहीं बचेगी।
भाजपा के मधु चव्हाण ने टाटा की नैनो पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। अंतरराष्ट्रीय मापदंड के अनुसार एक किलोमीटर के दायरे में करीब 300 वाहन होने चाहिए जबकि मुंबई में इतने क्षेत्र में करीब 591 गाड़ियां हैं। नैनो के आ जाने से यह संख्या बहुत बढ़ जाएगी। अपना पद संभालने के महज पांच दिन बाद आए संकट से निपटते हुए परिवहन राज्यमंत्री मुशरिफ ने कहा कि किसी भी कार पर प्रतिबंध लगाया जाना व्यावहारिक नहीं है।
अलबत्ता मंत्री ने यह माना कि राज्य के परिवहन विभाग में कई तरह की धांधलियां हैं, जिन्हें दूर किया जाना है। उन्होंने अफसरों को तो भ्रष्टाचार न करने को कह दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि पूरा आकाश ही फटा हुआ है कहां तक उसकी सिलाई करें।

भगवान राम ने खुद तोड़ा था रामसेतु


एजेंसी
Wednesday, July 23, 2008 20:44 [IST]
नई दिल्ली.रामसेतु प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा है कि भगवान राम ने अपनी पत्नी सीता को छुड़ाने के लिए श्रीलंका जाते समय रामसेतु बनवाया था लेकिन लौटते समय उसे खुद राम ने तोड़ दिया था। सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील एफएस नरीमन ने यह दलील कंबन रामायण का हवाला देते हुए दी।
नरीमन के मुताबिक, ऐसे में सरकार किसी सेतु या पुल को नहीं नष्ट कर रही क्योंकि किसी पुल का अस्तित्व नहीं था। फिर भी सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर अपनी प्रतिक्रिया में सेतुसमुद्रम शिपिंग कैनाल प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए वैकल्पिक मार्ग अपनाने पर रजामंदी जताई। इससे रामसेतु को छोड़े जाने के आसार बढ़ गए हैं।
चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन नीत बेंच ने नरीमन को सुझाव दिया कि सरकार को आस्था और जीवमंडल के बीच संतुलन के लिए कुछ करना चाहिए। बेंच में शामिल जस्टिस रवींद्रन ने यह भी सुझाव दिया कि जब कोई मुद्दा नहीं हो तो सरकार को इसे बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। 
नरीमन ने इन सुझावों से सहमति दिखाते हुए शीर्ष कोर्ट को आश्वस्त किया कि वे सरकार को सुझाव देंगे कि वह इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करे। 
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि वह इस पर विचार करे कि वैज्ञानिक, तकनीकी, आर्थिक और सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक लिहाज से क्या थोड़ा बदलाव उचित होगा। 
इससे पहले, पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. सुब्रrाण्यम स्वामी और तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता समेत याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कोर्ट से रामसेतु को राष्ट्रीय विरासत घोषित करने तथा इसे नष्ट नहीं करने की मांग करते हुए अपनी दलीलें दीं।

Saturday, July 12, 2008

बड़े-छोटे मस्त, मंझले की मुसीबत

डीएनए
Sunday, July 13, 2008 09:00 [IST]
मुंबई.बड़ा बच्चा है तो जिम्मेदार होगा और छोटा तो सबका लाडला है। आमतौर पर पेरेंट्स की अपने बड़े और छोटे बच्चे के प्रति कुछ ऐसी ही धारणा होती है इससे बीच वाला बच्चा उपेक्षित रह जाता है या खुद को उपेक्षित महसूस करता है। उसे लगता है उसका कोई वजूद ही नहीं। बर्थ ऑर्डर के हिसाब से पेरेंट्स द्वारा बच्चों से व्यवहार करने के पीछे कई सामाजिक और मनो वैज्ञानिक पहलू हैं। 

बर्थ ऑर्डर कई बार बच्चों के माइंडसेट को काफी गहरे तक प्रभावित करता है। बड़े बच्चे के पहले कदम से लेकर पहले शब्द तक मां बाप की पूरी अटेंशन रहती है, यही वजह है कि उन्हें यह सब खास लगता है। छोटा बच्चा पेरेंट्स की इस अटेंशन से बेखबर रहता है और वही करता है जो उसका दिल करता है। 

मनोचिकित्सक अंजली छाबड़िया के मुताबिक बीच के क्रम वाला बच्चा कुछ अलग ही तरह से सोचता है। 

काश मैं भी बड़ा होता: 

ज्यादातर मां बाप के पूरी तरह से ध्यान नहीं दे पाने के चलते बीच वाला बच्चा खुद को उपेक्षित महसूस करता है। वह सोचता है काश वह बड़ा बच्चा होता। पेरेंट्स को बच्चों को लेकर बैलेंस अप्रोच रखनी चाहिए। कुछ मां-बाप यह बखूबी करते हैं। बच्चों को उनकी जरूरतों और उनके टेलेंट के हिसाब से अलग-अलग तरीके से गाइड करना चाहिए। सभी बच्चों पर एक जैसा फॉमरूला अपनाना भी सही नहीं है।

कैजुअल अप्रोच :

मनोचिकित्सक सीमा हिंगोरानी के मुताबिक आमतौर पर पेरेंट्स अपने पहले बच्चे के साथ ज्यादा इन्वॉल्व होने के बाद दूसरे बच्चे के समय कैजुअल हो जाते हैं।

इसके बाद तीसरे बच्चे के प्रति वे ज्यादा भावुक हो जाते हैं क्योंकि वह इस क्रम में अंतिम होता है। पहला बच्चा आत्मनिर्भर होता है। दूसरा उसी की नकल करने लगता है जबकि तीसरा अलग रवैया अख्तियार करता है। 

बीच के कुछ बड़े नाम..

जरूरी नहीं कि उपेक्षित महसूस करने के बाद बीच वाला बच्च जिंदगी में कुछ नहीं कर पाता है। बचपन की यह धारणा बड़े होने पर खत्म हो जाती है। दुनिया के सबसे अमीर और माइक्रासॉफ्ट के पूर्व चेयरमैन बिल गेट्स, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन. एफ. कैनेडी और क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो और पॉप गायिका मैडोना कुछ ऐसे ही नाम है जिन्होंने बचपन में उपक्षित महसूस करने के बावजूद दुनिया में खूब नाम कमाया।

Saturday, June 28, 2008

बिल की ५ हिदायतें

अगर आप गड़बड़ियां करते हों तो उसके लिए अपने माता-पिता को दोष न दें। अपनी गलतियों का रोना रोने के बजाय उनसे सीखने का प्रयास करंे।
>>आपके पैदा होने से पहले आपके माता-पिता इतने नीरस नहीं थे, जितने अब हैं। वे आपके जरूरी-गैर जरूरी खर्च उठाने, आपके कपड़े साफ करने और आपकी हर बात सुनने की वजह से ऐसे हो गए हैं।
>>आपकी स्कूल में हर चीज का निर्धारण भले ही पास-फेल से होता हो, लेकिन जिंदगी में हर बार ऐसा नहीं होना जरूरी नहीं है।
>> जिंदगी की स्कूल में सेमेस्टर्स नहीं होते। इसमें आपको गर्मियों की छुट्टियां नहीं मिलेंगी।
>>अनाकर्षक व्यक्तियों के प्रति भी अच्छी राय रखें। हो सकता है आपको ऐसे ही किसी व्यक्ति के लिए काम करना पड़े।
यह भी खूब !
>> बिल गेट्स 250 डॉलर प्रति सेकेंड कमाते हैं यानी रोजाना दो करोड़ डॉलर।
>> अगर उनके हाथ से एक हजार डालर का नोट गिर जाए तो उन्हें उसे उठाने की जरूरत नहीं रहेगी। उसे उठाने में उन्हें चार सेकेंड का समय लगेगा और इतने समय में वे हजार डॉलर कमा लेंगे।
>> अमेरिका पर कुल कर्ज 5.62 ट्रिलियन डॉलर है। अगर बिल गेट्स को इस कर्ज का भुगतान करने को कहा जाए तो वे 10 साल से भी कम समय में उसे चुकता कर देंगे।
>> वे संसार के प्रत्येक व्यक्ति को 15 डॉलर दान दे सकते हैं और उसके बाद भी उनके पास 50 लाख डालर बच जाएंगे।
>> अगर गेट्स के पास कुल राशि को एक डालर के नोटों में तब्दील कर दिया जाए तो उन्हें जोड़कर धरती से चंद्रमा तक 14 बार सड़क बनाई जा सकती है। लेकिन एक व्यक्ति को यह सड़क बनाने में 1400 साल लगेंगे, वह भी लगातार 24 घंटे काम करने पर।
>> अगर माइक्रोसाफ्ट विंडो के यूजर्स हर बार कम्प्यूटर हेंग होने पर हर्जाने के तौर पर एक-एक डॉलर की मांग करने लगें तो गेट्स तीन साल में दिवालिया हो जाएंगे।

Friday, June 27, 2008

पहले फ़ील्ड मार्शल सैम बहादुर नहीं रहे

भारत के पूर्व सेना प्रमुख और 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के हीरो माने जाने वाले फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का गुरुवार रात निधन हो गया. वो 94 वर्ष के थे.
कई दिनों से उनकी हालत नाज़ुक बनी हुई थी. मानेकशॉ तमिलनाडु के वेलिंग्टन सेना अस्पताल में भर्ती थे.
समाचार एजेंसियों के अनुसार गुरुवार की सुबह डॉक्टरों ने कह दिया था उनकी हालत लगातार बिगड़ रही है.
भारत के सबसे ज़्यादा चर्चित और कुशल सैनिक कमांडर माने जाने वाले 94 वर्षीय मानेकशॉ का जीवन उपलब्धियों से भरा रहा. उन्होंने भारत के लिए कई महत्वपूर्ण जंगों में निर्णायक भूमिका निभाई.
उनकी सबसे बड़ी कामयाबी मानी जाती है- 1971 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंग में जीत.
उस समय पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में करीब 93 हज़ार पाकिस्तानी सैनिकों फ़ौज ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया था.
तब से सैम बहादुर के नाम से लोकप्रिय फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ को एक राष्ट्रीय नायक के रूप में देखा जाता रहा है.
मानेकशॉ का बचपन
फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ का पूरा नाम सैम होर्मुशजी फ़्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ है. उनका जन्म तीन अप्रैल 1914 को अमृतसर में हुआ था.
उनका परिवार पारसी है. उनके पिता डॉक्टर एचएफ मानेकशॉ एक चिकित्सक थे और पंजाब में जाकर बस गए थे. सैम मानेकशॉ ने प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में ही पाई. बाद में वो नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में दाखिल हो गए.
स्कूली शिक्षा के बाद वो उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैंड जाना चाहते थे. लेकिन उनके पिता ने उन्हें बहुत छोटा जानकर विदेश नहीं भेजा.
बाद में उन्होंने अमृतसर के हिंदू सभा कॉलेज में दाख़िला लिया. उन दिनों 'ब्रिटिश इंडियन आर्मी' में भारतीयों को सीधा कमीशन मिलने लगा था और देहरादून में 'इंडियन मिलिट्री एकेडमी' की स्थापना की गई थी.
सैम ने भी एकेडमी के पहले बैच में प्रवेश के लिए आवेदन किया और सफल हो गए.
मानेकशॉ पर डॉक्यूमेंट्री
फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ पर एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'इन वार एंड पीस: द लाइफ़ ऑफ़ फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ' भी बन चुकी है.
दिल्ली की ग़ैरसरकारी संस्था 'परज़ोर' ने इस डॉक्यूमेंट्री को तैयार किया था.
भारत-पाकिस्तान की 1971 की जंग के दौरान मानेकशॉ भारतीय सेनाध्यक्ष थे
ये फ़िल्म एक दादा द्वारा अपने पोते को बताए गए किस्सों पर आधारित थी. जिसमें दादा सैम मानेकशॉ ने अपने पोते को भारत के कुछ यादगार ऐतिहासिक पलों के बारे में बताया था.
फ़िल्म की निर्देशक जेसिका गुप्ता ने वर्ष 2003 में डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म के उदघाटन समारोह के दौरान बीबीसी को बताया था, "सैम बहादुर का जो मज़ाक करने का अंदाज़ है, जो अपनापन है, उससे आपको इस बात का एहसास हो जाता है कि आप किसी हीरो के पास बैठे हुए हैं."
इस डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म में एक जगह सैम याद करते हैं कि कैसे 1971 की लड़ाई के बाद तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें तलब किया और कहा कि ऐसी चर्चा है कि सैम तख़्ता पलटने वाले हैं.
सैम ने मज़ाक करते हुए अपने जाने-माने अंदाज़ में कहा, "क्या आप ये नहीं समझतीं कि मैं आपका सही उत्तराधिकारी साबित हो सकूँगा? क्योंकि आपकी नाक लंबी है और मेरी भी नाक लंबी ही है."
और फिर सैम ने कहा, "लेकिन मैं अपनी नाक किसी के मामले में नहीं डालता और सियासत से मेरा दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है."
फिल्म में सैम को ये भी कहते हुए दिखाया गया है कि शिमला समझौते के दौरान भारत ने कश्मीर समस्या सुलझाने का सुनहरा मौक़ा ख़ो दिया.

Wednesday, June 18, 2008

कब जागेंगे हम?

जब पिछली बार हमने सत्ता के गलियारों को हिलाने की हिमाकत की थी तो हमें तीन साल तक दहकते अंगारों पर चलने का अभिशाप दिया गया. रक्षा सौदों में भष्टाचार की पोल खोलने वाला ऑपरेशन वेस्ट एंड मार्च 2001 में प्रसारित हुआ था. इसके फौरन बाद दो चीजें हुईं. पहला हमें लंबे समय तक लोगों की अपार सराहना और उनका प्यार मिला. दूसरा, हमारे काम और जिंदगी पर एक अनैतिक और असंवैधानिक हमला बोला गया. ये भी लंबे समय तक नहीं रूका—तब तक जब तक सरकार का सारा गोला-बारूद खत्म नहीं हो गया.
छह साल पहले उस वक्त हम पर एक के बाद एक कई आरोप लगाए गए. कुछ ने कहा कि हम कांग्रेस के लिए काम करते हैं. कइयों के लिए हम दाऊद के आदमी थे. कुछ का कहना था कि हमारे पीछे हिंदुजा का पैसा लगा है. कोई हमें आईएसआई से जोड़ रहा था जिसका मकसद हमारे जरिये शेयर बाजार को औंधे मुंह गिराना था. कहा जा रहा था कि इस काम के लिए हमें करोड़ों रुपये मिले हैं. यही नरेंद्र मोदी उस समय बीजेपी के महासचिव हुआ करते थे. मुझे वह टीवी इंटरव्यू नहीं भूलता जिसमें मोदी और मैं दोनों फोन पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे और मोदी चिल्लाचिल्लाकर हमारे खिलाफ झूठ उगल रहे थे. एक दिन बाद ही वह मेरे बारे में दस तथ्यों से भरा एक पर्चा भी छापने वाले थे.
मुझे वह टीवी इंटरव्यू नहीं भूलता जिसमें मोदी और मैं दोनों फोन पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे और मोदी चिल्लाचिल्लाकर हमारे खिलाफ झूठ उगल रहे थे. एक दिन बाद ही वह मेरे बारे में दस तथ्यों से भरा एक पर्चा छापने वाले थे.
इनमें पहला और सबसे अहम तथ्य ये था कि मैं एक कांट्रेक्टर का बेटा हूं जो कि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह के करीबी सहयोगी थे.
हमारे ख़िलाफ़ उछाला गया हर आरोप दिल्ली के संभ्रांत हलकों में न केवल चटखारे लगाकर सुना-सुनाया गया बल्कि एक कान से दूसरे कान तक जाने की प्रक्रिया में इसमें कई और स्वाद भी जोड़े गए. यहां तक कि दोस्तों और जानने वालों ने भी दबी जबान में बातें कीं. ये वे लोग थे जिन्होंने किसी को बिना फायदे के कभी कुछ करते हुए नहीं देखा था. उनके लिए ये मानना सही भी था कि हम भला उनसे क्योंकर अलग होंगे. और अब जब सरकार हमारे शिकार पर निकल ही चुकी थी तो सच का सामने आना बस कुछ वक्त का ही खेल था. इतना सब कहने के बाद मिलने पर हमारी तरफ एक जुमला उछाल दिया जाता कि आपने असाधारण काम किया...ऐसा काम जो न सिर्फ जरूरी था बल्कि बहुत साहसिक भी.
हकीकत ये है कि-
-मैं कभी भी किसी हिंदुजा से नहीं मिला था
-मैंने स्टॉक मार्केट में एक शेयर की भी खरीद-फरोख्त नहीं की थी.
-मेरा कांग्रेस से कभी भी कोई लेनादेना नहीं रहा. मैं तो राजनीति कवर करने वाला पत्रकार तक नहीं था. रिकार्ड के लिए बता दूं कि तहलका शायद भारत में अकेली ऐसी कंपनी होगी जिसके खिलाफ तीन सीबीआई केस चल रहे हैं. ये तीनों केस एनडीए सरकार के वक्त दर्ज किए गए थे और यूपीए के सत्ता में आने के बाद भी जारी हैं. हमें जमानत लेने के लिए नियमित रूप से कोर्ट के चक्कर काटने पड़ते हैं.
-हमारे पास कभी भी काले धन की एक पाई तक नहीं रही. अगर ऐसा होता तो हर घड़ी हमारे पीछे लगी रही एजेंसियां हमें कब का जेल में ठूंस देतीं. आखिर में ऐसा वक्त आया जब इस कंपनी में काम करने वाले लोग 120 से घटकर सिर्फ चार रह गए. साउथ एक्सटेंशन के पीछे एक किराए के कमरे में हमारा ऑफिस चल रहा था. कानूनी और जिंदगी के तमाम पचड़ों से लड़ने के लिए हम पर दसियों लाख रुपये उधार चढ़ चुके थे जो हम अब तक चुका रहे हैं.
गंभीर आरोप लगने पर चिल्लाचोट की रणनीति भले ही चतुर लेकिन निंदनीय राजनीतिक दांव हो लेकिन भारतीय संभ्रांत वर्ग की साजिश ढूंढने का शगल समझ से परे है. इससे केवल खुद के बारे में सोचने वाली संस्कृति की बू आती है जहां कोई जनहित कोई मकसद ही नहीं होता.
-और हां, अंडरवर्ल्ड को झटका देने वाले क्रिकेट मैच फिक्सिंग के खुलासे के बावजूद हमसे से कोई दाऊद इब्राहिम या किसी और भाई से कभी नहीं मिला था.
मेरे पिता को तो छोड़िये मैं भी उस समय तक अर्जुन सिंह से कभी नहीं मिला था. कांट्रेक्टर होने की बजाय मेरे पिता की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा भारतीय सेना में गुजरा था. इस दौरान उन्होंने 1965 और 1971 में पाकिस्तान से हुए दोनों युद्ध भी लड़े. फिर भी मोदी ने सार्वजनिक मंच पर ये और ऐसे दूसरे कई सफेद झूठ बोलने से पहले कुछ नहीं सोचा और सेंसेक्स से भी ज्यादा चकरायमान मीडिया ने इसके पीछे के सच को बाहर लाने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं समझी.
झूठ के पीछे के सच को अगर बाहर न लाया जाए तो झूठ खतरनाक आकार ले लेता है. सच्चाई का चेहरा विकृत हो जाता है और अराजकता घर करने लगती है. पुरानी कहावत है कि झूठ को अगर लगातार और कई तरीकों से फैलाया जाता है तो वह सच बन जाता है या फ़िर कम से कम सच को डुबो तो देता ही है. इसका उदाहरण तब देखने को मिला जब 1984 में सिक्खों की गर्दनें तलवारों पर रखी गईं. और हमने ऐसा होते 2002 में भी देखा जब गुजरात को दूषित भावनाओं के साथ गलत जानकारी की आड़ में आग के हवाले कर दिया गया. कुछ मौकों पर मीडिया ने सच की पड़ताल कर उसे दिखाया भी. लेकिन तब तक सच का महत्व ही खत्म हो चुका था. सच से बेनकाब होते लोगों की रणनीति इतना शोर मचाने की थी कि उसमें सब कुछ डूब जाए—अच्छा, बुरा, सच, झूठ सब कुछ. हमारी इस तहकीकात पर उनका शोर है कि आपने गोधरा के बारे में तो कुछ कहा ही नहीं. जबकि सच ये है कि इस अंक के 30 पन्ने गोधरा की तहकीकात को ही समर्पित हैं.
गंभीर आरोप लगने पर चिल्लाचोट की रणनीति भले ही चतुर लेकिन निंदनीय राजनीतिक दांव हो लेकिन भारतीय संभ्रांत वर्ग की साजिश ढूंढने का शगल समझ से परे है. इससे केवल खुद के बारे में सोचने वाली संस्कृति की बू आती है जहां कोई जनहित कोई मकसद ही नहीं होता. पिछले कुछ सालों में मुझे कई बार ये अजीब और कड़वा अनुभव हुआ है जब लोगों को मैंने मेधा पाटकर और अरुंधती रॉय जैसे जनता के लिए लड़ने वाले लोगों पर पैसे के लिए काम करने का आरोप लगाते देखा है. किसी की राय से सहमत न होना अलग बात है. लेकिन खुद ही ये मान लेना कि आम लोगों के मुद्दों को उठाने वाले लोग भष्ट्र हैं, हमारे बारे में कई गंभीर पहलुओं की पोल खोलता है. इस विकृति का कुछ लेना-देना हमारी गुलामी के समय से भी है--वह दौर जब हम ईर्ष्या, चालाकी, साजिश, चुगली या धोखा, किसी भी तरह से गोरे मालिकों को खुश करने के लिए बैचैन रहते थे.
इस बार जब हमने 2002 के गुजरात नरसंहार के पीछे छिपे सच का खुलासा किया तो साजिश ढूंढने वालों ने नई ऊंचाइयां नाप लीं. बीजेपी ने हम पर कांग्रेस के लिए काम करने का आरोप लगाते हुए हमला किया. उधर, कांग्रेस का कहना था कि हम बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं. इससे साफ था कि हम किसी सही काम को ही अंजाम दे रहे थे. इस सबके बीच भारत के विचार के लिए लड़ने का काम लालू यादव, मायावती और वामदलों पर छोड़ दिया गया. हालांकि आदर्श भारत का ये विचार कभी कांग्रेस के पुरोधाओं द्वारा रचा गया था लेकिन आज की कांग्रेस से जुड़े दिग्गज शायद इसका मतलब भी भूल चुके हैं.
अगर सीआईआई को थोड़ी भी बदहजमी हो जाए तो प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर देता है. और अगर इस बदहजमी पर वह एक सेमिनार भी करना चाहे तो प्रधानमंत्री उसमें मुख्य वक्ता के रूप में फौरन पहुंच जाते हैं.
ये भी अपने आप में असाधारण बात है कि गुजरात नरसंहार के खुलासे को कई दिन होने को आए लेकिन अब तक इस पर न तो प्रधानमंत्री ने ही कोई बयान दिया और न ही गृहमंत्री ने. पत्रकारिता के इतिहास में पहली बार सामूहिक हत्याकांड करने वाले कैमरे पर खुद बता रहे थे कि उन्होंने कैसे मारा, क्यों मारा और किसकी इजाजत से मारा. ये कोई छोटे-मोटे अपराधी नहीं थे. ये विचारधारा में अंधे वे उन्मादी लोग थे जो उस खतरनाक दरार की सच्चाई का खुलासा कर रहे थे जिसमें इस देश के टुकड़े करने की क्षमता है. लेकिन रेसकोर्स रोड में बैठे भद्रजनों के लिए ये काफी नहीं था. अगर सीआईआई को थोड़ी भी बदहजमी हो जाए तो प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर देता है. और अगर इस बदहजमी पर वह एक सेमिनार भी करना चाहे तो प्रधानमंत्री उसमें मुख्य वक्ता के रूप में फौरन पहुंच जाते हैं.
प्रधानमंत्री को भी कोसने का क्या फायदा. उनके पास जिम्मेदारी तो है पर शक्तियां नहीं. बेईमानी के पहाड़ की चोटी पर बैठा ईमानदार व्यक्ति. कांग्रेस के उन बड़े रणनीतिकारों पर नजर डालते हैं जो खुद तो कोई चुनाव नहीं जीत सकते मगर कईयों को चुनाव जितवाने के रहस्य जानते हैं. उनके हिसाब से देखा जाए तो हत्याओं और बलात्कारों में मोदी की भूमिका का पर्दाफाश इस तरह से डिजाइन किया गया था कि गुजराती हिंदू को ये यकीन हो जाए कि मोदी ही उनके लिए आदर्श नेतृत्व हैं. उन्हें यह नहीं सूझा कि हिंसा के इन सबूतों को वे मोदी के खिलाफ एक हिला देने वाली सार्थक बहस शुरू करने के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
वास्तविकता ये है कि कांग्रेस को आज कुछ ऐसे छुटभैये रणनीतिकार चला रहे हैं जो ये भूल चुके हैं कि सही कदम उठाना क्या होता है. उनके पास न तो इतिहास के अनुभवों का प्रकाश है और न ही भविष्य के लिए दृष्टि. वे यह देख पाने में असमर्थ हैं कि एक जमाने में महान विभूतियों ने धर्म, जाति, भाषा, नस्ल आदि जैसी खाइयों को पाटते हुए इस देश के विचार को शक्ल दी थी. मूर्खतापूर्ण तरीके से वे अब इन्हीं दरारों को फिर से उभार रहे हैं. वे उन संकटों को देख पाने में असमर्थ हैं जो इसके परिणामस्वरूप सामने आएंगे. उन्हें ये नहीं पता कि राजनीति में नैतिकता को हथियार कैसे बनाया जा सकता है और उनमें नैतिकता के रास्ते पर चलने की हिम्मत भी नहीं है. ये लोग और कुछ नहीं ज्यादा से ज्यादा बस चुनावों में वोटों की तिकड़म भिड़ाने वाले एकाउंटेंट हैं जो चुनावी लाभ और हानि के बीच झूला झूलते रहते हैं.
आज की कांग्रेस उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्र में निष्ठा रखने वाले उस भारतीय को निराश करती है जिसे भारत की आत्मा की रक्षा करने को एक राजनीतिक छाते की आवश्यकता है. सही बातें न कहकर, सही कदम न उठाकर ये उस उदार भारतीय को कमजोर करती है जिसकी विवादों में कोई रुचि नहीं और जो अपनी अच्छाई की स्वीकृति चाहता है. इससे पैदा हुए खाली स्थान पर जहरीली और विकृत विचारधाराएं काबिज हो जाती हैं.
और ये सब तब हो रहा है जब भारतीय कुलीन वर्ग ऐसा व्यवहार कर रहा है जैसा कि 1920 में चमक-दमक और शैंपेन की खुमारी में डूबा अमेरिकी कुलीन वर्ग किया करता था जबकि पैरों के नीचे की जमीन बड़ी तेज़ी से दरकती जा रही है. ताजा आंकड़े बताते हैं कि पांच मुख्य राज्यों में गरीबी से बदहाल लोगों की संख्या बढ़ रही है. भारत के 30 फीसदी जिलों में घनघोर दरिद्रता से उठता नक्सलवाद बढ़ता रहा है. आखिर कब तक आकंठ पैसे में डूबे हुए और भूख से मर रहे लोग बगैर टकराव के साथ-साथ रह सकते हैं. सच्चाई ये है कि भारत को सिर्फ आर्थिक सुधारों की नहीं बल्कि राजनीतिक दूरदृष्टि की भी जरूरत है जिसका कहीं अता-पता नहीं. गुजरात के प्रति हमारी बेपरवाही बताती है कि दुनिया के इस सबसे जटिल लोकतंत्र के सामने अब तक की सबसे पेचीदा चुनौती मुंह बाए खड़ी है.
तरुण तेजपाल
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'स्पेलिंग चैम्पियनशिप' में भारतीय दबदबा

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भारतीय मूल के कृष्ण मिश्र और अल्का मिश्र पिछले सात वर्षो से अपने बच्चों को अमरीका में होने वाली वर्तनी प्रतियोगिता- 'नेशनल स्पेलिंग बी' में भाग लेने के लिए इंडियाना से वाशिंगटन डीसी ले जाते रहे हैं.
वे दिल्ली से 15 वर्ष पहले अमरीका आए थे. इस बार उनके पुत्र 13 वर्षीय समीर ने इस प्रतियोगिता में पहला स्थान जीतकर उनका सपना पूरा कर दिया है. .
समीर को 40 हज़ार डॉलर यानी क़रीब 16 लाख रुपए से भी ज़्यादा की राशि पुरस्कार में मिली है.
सबसे पहले उनकी बड़ी पुत्री श्रुति ने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था.
अमरीका में यह प्रतियोगिता काफ़ी लोकप्रिय है. इसके लिए बच्चे महीनों तैयारी करते हैं. प्रतियोगिता के राष्ट्रीय स्तर के फ़ाइनल में पहुँचने से पहले उन्हें स्थानीय और प्रांतीय स्तर पर जीत हासिल करनी पड़ती है.
समीर ने 'guerdon' शब्द की सही स्पेलिंग बता कर यह प्रतियोगिता जीती है. इस बहुत कम प्रचलित शब्द का मतलब पुरस्कार होता है.
लाल कालीन पर चलना आपको एक सेलिब्रिटी होने का एहसास देता है. मेरी पत्नी चाहती थी कि समीर भी सेलिब्रिटी की तरह लाल कालीन पर ले चले

कृष्ण मिश्र, समीर के पिता
इस वर्ष दक्षिण एशिया के बच्चे इस प्रतियोगिता में छाए रहे. दूसरे स्थान पर इस प्रतियोगिता में मिशीगन के 12 वर्ष के सिद्धार्थ चांद रहे जबकि कैनसस की काव्या शिवशंकर को चौथा और पेन्सिलवेनिया की जाह्नवी अय्यर को आठवाँ स्थान मिला.
लगन और इच्छाशक्ति
समीर को परिवार का पूरा सहयोग मिला
न्यूयॉर्क में रहने वाले आठ वर्षीय श्रीराम हथवार ने इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाले सबसे कम उम्र का प्रत्याशी बनकर सबको चौंका दिया.
स्पेलिंग प्रतियोगिता में भारतीय परिवार के बच्चों के वर्चस्व की असली वजह उनका पारिवारिक माहौल है.
वर्ष 1985 में 'स्पेलिंग बी' प्रतियोगिता में जीतने वाले और इस वर्ष के निर्णायकों में से एक, डॉक्टर बालू नटराजन का कहना है कि जो बात सभी जीतने वाले प्रतियोगियों में दिखती है वह है उनका इस प्रतियोगिता के प्रति लगन और परिवार का सहयोग.
वे कहते हैं, "यह ऐसी प्रतियोगिता नहीं है जिसे बच्चे सिर्फ़ अपनी प्रतिभा के बूते जीत लें. मुझे लगता है कि दक्षिण एशियाई परिवारों की इच्छा और सहयोग काफ़ी मायने रखता है."
कृष्ण मिश्र कहते हैं कि 'स्पेलिंग बी' प्रतियोगिता उनके बच्चों के लिए एक अच्छा शैक्षणिक अनुभव रहा है और इससे बेहतरीन अंग्रेजी सीखने में भी मदद मिलती है.
वे हँसते हुए कहते हैं, "लाल कालीन पर चलना आपको एक सेलिब्रिटी होने का एहसास देता है. मेरी पत्नी चाहती थी कि समीर भी सेलिब्रिटी की तरह लाल कालीन पर ले चले."
समीर कहते हैं कि उन्होंने इस प्रतियोगिता के लिए काफ़ी मेहनत किया था. वे कहते हैं, "मैंने सीखा कि कैसे लगातार मेहनत किया जाए और उसे बरकरार रखा जाए."
वर्तनी प्रतियोगिता में दक्षिण एशिया मूल के लोगों की सफलता को देख कर न्यू जर्सी के राहुल वालिया 'दक्षिण एशिया स्पेलिंग बी' प्रतियोगिता का आयोजन कर रहे हैं.
वे कहते हैं इन प्रतियोगिताओं से बच्चों के अंदर विश्वास बढ़ेगा और उनकी प्रतिभा निखरेगी.

Tuesday, June 17, 2008

मारे गए पत्रकारों की स्मृति में स्मारक

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने लंदन में एक स्मारक का अनावरण किया. यह उन पत्रकारों की याद में तैयार किया गया है जो रिपोर्टिंग करते मारे गए.
'ब्रीदिंग' नाम का यह स्मारक बीबीसी के मुख्यालय ब्रॉडकास्टिंग हाउस की छत पर स्थापित किया गया है.
यह एक रोशनी का एक स्तंभ है जिसकी ऊँचाई 32 फ़ुट है. इसका प्रकाश रात को आकाश में एक किलोमीटर तक चमकेगा.
हर रात आधा घंटे यह उस समय रौशन होगी जब बीबीसी का प्रमुख समाचार बुलैटिन प्रसारित होता है. यानी रात दस बजे.
यह स्मारक उन सभी पत्रकारों और उनके साथ काम करने वाले लोगों को समर्पित है, जो अपना काम करते हुए मारे गए, इनमें ड्राइवर हैं और अनुवादक भी.
पिछले दस सालों में औसतन हर हफ़्ते दो ऐसे पत्रकार मारे गए हैं जो युद्ध की रिपोर्टिंग करते हैं, कई अन्य पत्रकार भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग करते हुए मारे गए हैं.
श्रद्धांजलि
संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने उन पत्रकारों को श्रद्धांजलि अर्पित की है जो रिपोर्टिंग करते हुए मारे गए.
बीबीसी के पत्रकार अब्दुल रोहानी और नासेह दाहिर फ़राह की मौत हाल ही में हुई है
बान की मून ने कहा, "यह स्मारक उन लोगों की याद में खड़ा किया गया है जिन्होने अपनी जान गवाँ दी जिससे हम तक ख़बर पहुंच सके. लेकिन यह उन पत्रकारों के लिए भी है जो इस समय ख़तरों का सामना कर रहे हैं और रिपोर्टें भेजने के लिए अपनी जान को जोख़िम में डाल रहे हैं."
इस स्मारक के अनावरण के अवसर पर बीबीसी के महानिदेशक मार्क टॉमसन ने कहा कि समाचार जुटाने का काम दिन पर दिन ख़तरनाक होता जा रहा है. पिछले दस सालों में औसतन हर सप्ताह दो पत्रकार मारे जाते रहे हैं और 90 प्रतिशत मामलों में किसी पर मुक़दमा नहीं चला है.
अनावरण समारोह में उन पत्रकारों के परिजन भी आए थे जो या तो मारे गए या जिनकी हत्या हुई.
इनमें बीबीसी की प्रोड्यूसर केट पेटन के परिवार वाले थे जो 2005 में सोमालिया में मारी गई थीं और कैमरामैन साइमन कम्बर्स के सगे संबंधी भी जो सउदी अरब में मारे गए थे.
इस अवसर पर बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार जॉन सिम्पसन जो वर्ष 2003 में स्वयं एक अमरीकी मिसाइल हमले में मरते-मरते बचे थे उन्होंने जेम्स फ़ैंटन की एक कविता पढ़कर सुनाई.
पूर्व युद्ध रिपोर्टर और कवि जेम्स फ़ैंटन ने यह कविता विशेष तौर पर बीबीसी के लिए लिखी है.

Monday, June 9, 2008

ये ब्लॉग सिर्फ बेटियों के लिए है

Tuesday, April 01, 2008 05:38 [IST]
नई दिल्ली तकनीकी क्रांति के युग में नेट यूजर्स की संख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है। ब्लॉगिंग कल्चर इन दिनों सर्वाधिक लोकप्रिय है। अब एक ऐसा ब्लॉग आया है जो सिर्फ लड़कियों के लिए ही है। ‘बेटियों का ब्लॉग’ एक ऐसा ही ब्लॉग है, जिसमें माता-पिता अपनी बेटियों के बारे में बातें लिखते हैं।
यह एक सामुदायिक ब्लॉग है। जिसमें एक ही छत के नीचे कई ब्लॉगर माता-पिता इकट्ठा होकर अपनी बेटियों के बारे में बातें लिखते हैं। फिलहाल इस ब्लॉग के ग्यारह सदस्य हैं। इस ब्लॉग को शुरू करने वाले अविनाश दास ने अपने पहले पोस्ट में लिखा, ‘‘ये ब्लॉग बेटियों के लिए है। हम सब, जो सिर्फ बेटियों के बाप होना चाहते थे, ये ब्लॉग उनकी तरफ से बेटियों की शरारतें, बातें साझा करने के लिए है।’’
उन्होंने अपने इस पोस्ट का टाइटल रखा- ‘आइए बेटियों के बारे में बात करें।’ इस ब्लॉग पर लिखने वाले सभी ब्लॉगर अपनी बेटियों के बारे में सामान्य, लेकिन रोचक रिपोर्ट प्रकाशित कर रहे हैं। इसमें शामिल एक ब्लॉगर जितेन्द्र चौधरी का कहना है कि इसमें बेटियों के रोचक क्रियाकलापों को भी शामिल किया जाएगा। वहीं रविश कुमार ने ‘बाबा तुम बांग्ला बोलो तो’ में काफी रोचक अंदाज में बताते हैं कि चार साल की बेटी ‘तिन्नी’ उन्हें किस प्रकार बंगाली भाषा का ज्ञान दे रही हैं।
एक ब्लॉगर पुनीता ने ‘क्या बेटियां पराई होती हंै’ के शीर्षक से अपनी बात कहने की कोशिश की है। शादी के बाद पिता के साथ एक भेंट को उन्होंने काफी अलग अंदाज में बयां किया है।

ओबामा के लकी हनुमान

Monday, June 09, 2008 15:30 [IST]
न्यूयॉर्क. बात है तो अजीब लेकिन सच है! अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए संभावित डेमोक्रेटिक उम्मीदवार बैरेक ओबामा व्हाइट हाउस की जंग जीतने के लिए हिंदू भगवान हनुमान का आशीर्वाद ले रहे हैं।
डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से उम्मीदवारी हासिल करने के लिए 17 महीने की जद्दोजहद के बाद हिलेरी क्लिंटन को मात देने वाले ओबामा खुशकिस्मती के लिए अपने साथ छोटे से हनुमान को साथ लेकर चलते हैं।
टाइम्स के व्हाइट हाउस फोटो ऑफ द डे में प्रकाशित एक फोटो में पहली बार अश्वेत अमेरिकी प्रत्याशी का हुनमान प्रेम सामने आया है। ओबामा के पास एक ब्रेसलेट है जिसमें इराक में तैनात एक अमेरिकी सैनिक की यादें हैं, एक जुआरी की लकी चिट, एक छोटा सा वानर भगवान और छोटी सी मैडोना व एक बच्चे की आकृति है।
इस ब्रेसलेट में जो छोटे से वानर भगवान की आकृति है, वह बेशक हिंदू भगवान हनुमान की तरह ही है। प्रकाशित फोटो के साथ भी यह बात लिखी गई है लेकिन फोटोग्राफर ने इसकी पहचान का जिक्र नहीं किया है। केन्याई पिता और कैंसासी माता की संतान ओबामा ने अपना शुरुआती जीवन इंडोनेशिया में बिताया था जहां हिंदू धर्म काफी प्रचारित है।
लकी फैक्टर :इस फोटो के कैप्शन में यह भी लिखा गया है कि रिपब्लिक पार्टी के उम्मीदवार जॉन मैक्केन भी भाग्य में विश्वास करते हुए अपने लकी फैक्टर के रूप में अपनी कलाई पर एक रबर बैंड और एक निकेल बांधते हैं। एक स्वेटर और हैंपशायर में एक होटल रूम को भी वे लकी करार देते हैं।
दूसरी तरफ, हिलेरी क्लिंटन अपने लकी फैक्टर के रूप में अवाम द्वारा दिए गए तोहफों को तरजीह देती हैं। उनके प्रवक्ता के मुताबिक उन्हें टैक्सास में एक महिला ने एक लकी सिक्का व एक रूमाल दिया जिसे वे अक्सर अपनी जेब में रखे रहती हैं। इसी तरह ओहियो में एक महिला द्वारा दिए गए ब्रेसलेट को भी वे हमेशा पहने रहती हैं।

Sunday, June 8, 2008

अपहृत बीबीसी संवाददाता की हत्या

अफ़ग़ानिस्तान में बीबीसी के एक युवा संवाददाता की दक्षिणी हेलमंद प्रांत में गोली मारकर हत्या कर दी गई है.
अब्दुल समद रोहानी का शनिवार को अपहरण कर लिया गया था और रविवार को लश्कर गाह नाम के स्थान पर उनकी लाश पाई गई है.
बीबीसी ने रोहानी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा, "रोहानी की हिम्मत और लगन अफ़ग़ानिस्तान में बीबीसी की रिपोर्टिंग का अहम हिस्सा रही है."
रोहानी बीबीसी के काबुल स्थित ब्यूरो ऑफ़िस के लिए काम करते थे और बीबीसी की पश्तो सेवा के हेलमंद संवाददाता थे.
हेलमंद प्रांत में पिछले कुछ समय से तालेबान के छापामार लगातार हमले कर रहे हैं.
बीबीसी की ओर से जारी बयान में कहा गया है, "रोहानी और उनके साथियों की साहसिक रिपोर्टिंग की ही बदौलत बीबीसी अफ़ग़ानिस्तान का सच दुनिया के सामने ला पाती है."
इस बयान में कहा गया है, "उनकी मौत से हमें एक भारी सदमा लगा है और इस दुखद घड़ी में हमारी संवेदना उनके परिवार के साथ है."
इस वर्ष अफ़ग़ानिस्तान में पत्रकारों पर कई हमले हुए हैं, पिछले वर्ष भी अफ़ग़ानिस्तान में पाँच पत्रकार मारे गए थे.
यह सप्ताहांत बीबीसी के लिए ख़ासा बुरा रहा, इससे पहले सोमालिया में किसमायो में पत्रकार नश्ते दहीर की हत्या कर दी गई, दहीर बीबीसी और समाचार एजेंसी एपी के लिए रिपोर्टिंग किया करते थे.

Gmail - इनबॉक्स

‘हनुमान’ है इंजीनियरिंग कालेज के अध्यक्ष

06 जून 2008 आईबीएन-7 लखनऊ (उत्तर प्रदेश)। लखनऊ के एक तकनीकि संस्थान में एक मजेदार वाक्या सामने आया है। लखनऊ के ‘सरदार भगत सिंह टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट’ के चेयरमैन के पद पर बजरंगबली को बिठाया गया है और यह फैसला इसके ट्रस्टियों ने लिया है।दरअसल, ट्रस्टियों के बीच चेयरमैन के पद को लेकर आपस में किसी तरह का समझौता नहीं हो पा रहा था। इसीलिए यहां के ट्रस्टियों ने अपने आराध्य देव हनुमान को ही इस महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी सौंप दी। अब इस कालेज की पूरी जिम्मेदारी हनुमान जी की देख-रेख में हो रही है।मजे की बात तो यह है कि इस कालेज में चेयरमैन का एक बड़ा कमरा है। कमरे के बाहर हनुमान जी के नाम का बोर्ड लगा हुआ है और चेयरमैन की कुर्सी पर हनुमान जी की प्रतिमा को बिठा दिया गया है। ट्रस्टियों ने चेयरमैन की सहायता के लिए एक वाइस-चेयरमैन (उपाध्यक्ष) भी नियुक्त किया है।उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी है कि वो सुबह कालेज के चेयरमैन हनुमान जी के कमरे में जाकर उनका दर्शन करें और उसके बाद अपने काम की शुरुआत करें। ‘सरदार भगत सिंह टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट’ के ट्रस्टी पंकज सिंह भदौरिया का कहना है कि, “हनुमान जी में हमारी अटूट श्रद्धा रही है, हम जो भी काम करते हैं उसकी शुरुआत हनुमान जी से ही करते हैं। इसलिए हम लोगों ने हनुमान जी को ही ये जिम्मेदारी सौंप दी।”ट्रस्टियों का यह तर्क भी है कि “हनुमान जी हर तरह का ज्ञान रखते हैं। इसलिए उनके लिए ये जिम्मेदारी तो बहुत ही छोटी है। लंकापति रावण के साथ हुए युद्ध में भगवान राम ने युद्ध के प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी हनुमान जी को ही दी थी। इसलिए हम लोगों ने उन्हें ये जिम्मेदारी सौंपी है।”वहीं, कालेज से जुड़े लोगों का मानना है कि जब से हनुमान जी ने इस कालेज के चेयरमैन पद की जिम्मेदारी संभाली है, कालेज में काफी सुधार देखने को मिल रहा है।

http://www.josh18.com/showvideo.php?id=220531

कम्प्यूटर से चलती पान की दुकान

7 जून 2008इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
इंदौर। अभी तक आपने हजारों पान की दुकानें देखी होंगी मगर आज हम एक ऐसी पान की दुकान के बारे में आपको बताने जा रहे है जो औरों से अलग है। इसकी खासियत यह है कि यहां आपको सिर्फ एक बार अपना मीनू बताना पड़ता है क्योंकि यह पान की दुकान अत्याधुनिक है। दोबारा आने पर आपको मीनू नहीं अपना नाम बताना होता है और आपकी पसंद का पान हाजिर हो जाता है।इंदौर के बड़ा गणपति चौराहे पर स्थित ‘अप्सरा पान शॉप’ औरों से अलग है। इस दुकान में अन्य पान की दुकानों की तरह चमक-दमक तो है ही साथ ही ग्राहकों का ब्यौरा दर्ज करने के लिए कम्प्यूटर भी लगा है।यहां जो भी पान के शौकीन आते हैं उन्हें सिर्फ एक बार ही आपना मसाला बताना पड़ता है। दुकान के संचालक राम कृष्ण वर्मा बताते हैं उनके यहां जो ग्राहक आता है उसका मसाला कम्प्यूटर में दर्ज कर दिया जाता है साथ ही उसे एक ‘ग्राहक नम्बर’ भी दिया जाता है।पढ़ें
: ताज को वोट दें और मुफ्त में पान खाएं अगली दफा जब वही ग्राहक पुन: दुकान पर पहुंचता है तो उसे सिर्फ अपना नाम और ‘ग्राहक नम्बर’ बताना होता है और कुछ ही देर में उसकी पसंद का पान हाजिर हो जाता है। इससे राम कृष्ण को तो लाभ हो ही रहा है साथ में ग्राहकों का भी समय बच जाता है।राम कृष्ण बताते कि उनके नियमित ग्राहक अपने घर अथवा दफ्तर से निकलने से पहले ही फोन करके अपना ग्राहक नम्बर बता देते हैं और उन्हें आते ही पान तैयार मिल जाता है। इतना ही नहीं घर और दफ्तर तक उन्होंने पान भेजने की भी व्यवस्था कर रखी है। इसके लिए उनकी दुकान पर 40 कर्मचारियों को रखा गया है।राम कृष्ण की दुकान का पान खाने वाले देश और विदेश में भी है। उन तक भी पान पहुंचाने का इंतजाम उनके पास है। राम कृष्ण के कम्प्यूटर में 4,000 से अधिक ग्राहकों के रिकॉर्ड दर्ज हैं, जिसकी पसंद कम्प्यूटर बता देता है।वे जल्दी ही ऑनलाइन सुविधा शुरू करने वाले हैं।

Saturday, June 7, 2008

जालौरः पंकज मुनि की अनोखी तपस्या

07 जून 2008 आईबीएन-7जालौर(राजस्थान)। तपती दुपहरी और आग के बीच भी इस समय एक साधु परमात्मा का सच जानने के लिए साधना कर रहे हैं। ये साधना जालौर के मालवाड़ गांव में हो रही है। साधना में लीन होनेवाले इस साधु का नाम पंकज मुनि है। पंकज मुनि की ये साधना कुल 41 दिनों तक चलेगी।अपनी इस साधना के बारे में खुद पंकज मुनि बताते हैं कि, “मेरी ये साधना अंधविश्वास से छुटकारा और भगवान की तलाश के लिए है।”पंकज मुनि इस समय खुले आसमान में रेगिस्तान की तपती गर्मी के बीच चारों तरफ जलते हुए उपलों के बीच में बैठकर अपनी साधना में मग्न हैं। इस अग्निसाधक के दर्शन के लिए यहां आस-पास के काफी लोग आने लगे हैं। पंकज मुनि दिन के 11 बजे से शाम 5 बजे तक ये साधना कर हैं। वैसे तो पंकज मुनि की चमड़ी अब झुलसने लगी है, लेकिन उनकी साधना पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है।उनकी ये साधना को देखकर यहां के लोग अब पंकज मुनि को भगवान शिव का अवतार मानने लगे हैं। उनका आर्शीवाद लेने के लिए हजारों की संख्या में लोग साधना स्थल पर जुटने लगे हैं। साधना स्थल से उठने के बाद रोज शाम पांच बजे पंकज मुनि भक्तों को प्रवचन देते हैं।

Friday, June 6, 2008

उमर अब्दुल्लाह नज़र आएंगे फ़िल्म में

जुलाई में भारत के सिनेमाघरों में एक फ़िल्म दिखाई जाएगी जिसका नाम है - मिशन इस्तांबूल. आप समझ सकते हैं कि इसमें ख़ास क्या बात है, हर महीने बहुत सी फ़िल्में सिनेमाघरों में दिखाई जाती हैं.
ख़ास बात ये है कि इस फ़िल्म में भारत प्रशासित कश्मीर के नेता उमर अब्दुल्लाह भी नज़र आएंगे. उमर अब्दुल्लाह नेशनल कान्फ्रेंस के मौजूदा अध्यक्ष हैं.
वह पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्लाह के बेटे और कश्मीर में एक बड़ा नाम माने जाने वाले शेख़ अब्दुल्लाह के पोते हैं. उमर अब्दुल्लाह केंद्र में मंत्री भी रह चुके हैं.
मिशन कश्मीर की ही तरह मिशन इस्तांबूल भी आतंकवाद के बारे में एक फ़िल्म है. मिशन इस्तांबूल में ख़ुद उमर अब्दुल्लाह एक विशेष भूमिका में नज़र आते हैं.
यह भूमिका कोई अभिनय की तो नहीं है मगर फ़िल्म में अभिनेत्री ने कश्मीर की स्थिति और मीडिया की भूमिका के बारे में उमर अब्दुल्लाह का इंटरव्यू किया है.
उमर अब्दुल्लाह इस इंटरव्यू में कश्मीर की स्थिति के बारे में मीडिया की भूमिका की आलोचना करते नज़र आते हैं, "कश्मीर में अच्छी बातों को मीडिया ख़बरें नहीं बनाता है. जब तक कोई बम धमाका ना हो, कोई मारा ना जाए, तब तक यहाँ कोई ख़बर नहीं बनती है."
उमर अब्दुल्लाह कहते हैं, "कश्मीर में इतनी सारी अच्छी बातें हो रही हैं मसलन, बहुत से सैलानी आ रहे हैं, लेकिन यह सबकुछ मीडिया में उस तरह से जगह नहीं पाता है जैसा कि हिंसक घटनाओं को ख़ूब ज़ोरशोर से रिपोर्ट किया जाता है."
'राजनीति से फ़िल्में'
अलबत्ता उमर अब्दुल्लाह ये डायलॉग स्क्रिप्ट से बोलते हैं लेकिन उनका कहना है कि जो कुछ भी उन्होंने इस फ़िल्म में कहा है वह उनका ख़ुद का अनुभव भी है.
एक ही बात कई बार...
वह जो ख़ुद समझते और सोचते हैं वही बोलते हैं लेकिन फ़िल्म में उन्होंने यह बात स्क्रिप्ट देखकर कही है और वो भी अलग-अलग अंदाज़ से. एक ही बात को कई बार कहना पड़ा.

उमर अब्दुल्लाह
हालाँकि पटकथा को देखकर डॉयलॉग बोलते हुए उन्हें कुछ अटपटा लगा और उनका कहना है, "वह जो ख़ुद समझते और सोचते हैं वही बोलते हैं लेकिन फ़िल्म में उन्होंने यह बात स्क्रिप्ट देखकर कही है और वो भी अलग-अलग अंदाज़ से. एक ही बात को कई बार कहना पड़ा."
उमर अब्दुल्लाह ने बताया कि उन्हें क़रीब एक सप्ताह पहले स्क्रिप्ट दे दी गई थी और उसे ज़ुबानी याद करने के लिए कहा गया था.
उमर अब्दुल्लाह के लिए मीडिया को इंटरव्यू देना एक आम बात है लेकिन फ़िल्म में यह इंटरव्यू देने के लिए उन्हें कुछ रीटेक करने पड़े यानी एक ही दृश्य को कई बार दोहराना पड़ा.
उमर अब्दुल्लाह को उस अभिनेत्री का नाम तो याद नहीं है जिन्होंने फ़िल्म में उनका इंटरव्यू किया है लेकिन फ़िल्म में विवेक ओबेरॉय और ज़ायद ख़ान जैसे अभिनेताओं ने काम किया है.
उमर अब्दुल्लाह का इंटरव्यू इस फ़िल्म में राजस्थान की राजधानी जयपुर के एक बाग में दर्शाया गया है. हालाँकि उमर अब्दुल्लाह ने यह फ़रमाइश रखी थी कि यह इंटरव्यू कश्मीर में उनके घर में होना चाहिए था लेकिन इतनी बड़ी फ़िल्म यूनिट को वहाँ नहीं ले जाया जा सकता था.
उमर कहते हैं कि उन्होंने अपने स्कूल के एक साथी की गुज़ारिश पर इस फ़िल्म में यह इंटरव्यू दिया है, वैसे उनका राजनीति छोड़कर फ़िल्मी दुनिया में जाने का कोई इरादा नहीं है.

Tuesday, June 3, 2008

गंजेपन का इलाज़ हो सकता है आसान

जो लोग गंजेपन से परेशान हैं उनके लिए एक अच्छी ख़बर है. आरंभिक जाँच में यह बात सामने आई है कि प्रयोगशालाओं में विकसित बालों की कोशिकाओँ के ज़रिए गंजेपन का इलाज़ संभव है.
इस तकनीक में आदमी के सिर के बचे बालों की कुछ कोशिकाओं को लेकर उसे प्रयोगशाला में कई गुणा बढ़ाया जाता है और फिर उसे सिर के उन हिस्सों मे प्रतिरोपित किया जाता है जहाँ बाल झड़ चुके होते हैं.
ब्रिटेन के शोधार्थियों का कहना है कि छह महीने के इस इलाज के बाद 19 में से 11 लोगों के सिर में नए बाल उग आए.
हालाँकि ब्रिटेन के एक विशेषज्ञ का कहना है कि इस प्रयोग में अभी और काम बाकी है जिससे नए बाल अच्छे नज़र आएँ.
आदमी में गंजापन अर्थात बालों का झड़ना (एंड्रोजेनेटिक एलोपेसिया) एक आनुवांशिक बीमारी है. पचास वर्ष की आयु के बाद क़रीब चालीस प्रतिशत लोग दुनिया में गंजेपन से पीड़ित हैं.
नई विधि
बालों के प्रतिरोपण की अभी जो विधि अपनाई जाती है उसमें सिर के बचे हुए बालों के बड़े गुच्छों को एनेस्थीज़िया यानी चेतनाशून्य करने वाली दवा की सहायता से मनचाहे हिस्सों में प्रतिरोपित कर दिया जाता है.
मुझे लगता है कि इससे बालों की देख भाल में क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाएगा. जैसे ही लोगों को पता लगेगा कि वे गंजे हो रहे हैं वे इस विधि को अपना सकते हैं

कंपनी के वैज्ञानिक, डॉक्टर पॉल केंप
इस विधि की पूरी सफलता सिर के बचे हुए बालों पर निर्भर करती है. इसमें कोई नए बाल नहीं उगाए जा सकते हैं.
इस नई विधि को तैयार करने वाली ब्रिटेन की कंपनी इंटरसाइटेक्स का कहना है कि इसके सहारे प्रतिरोपण के लिए बालों की असंख्य कोशिकाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं.
कंपनी का कहना है कि यदि अन्य जाँच भी सफ़ल रहे तो पाँच वर्षों में इस तकनीक को बाज़ार में लाया जा सकता है.
कंपनी के वैज्ञानिक डॉक्टर पॉल केंप ने कहा, "मुझे लगता है कि इससे बालों की देख भाल में क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाएगा. जैसे ही लोगों को पता लगेगा कि वे गंजे हो रहे हैं, वे इस विधि को अपना सकते हैं."

Saturday, May 24, 2008

कार के साथ पिस्तौल मुफ़्त!

Marwar News!
अमेरिका में एक कार डीलर ने अपने ग्राहकों को हर कार के साथ मुफ़्त में पिस्तौल देने की पेशकश की है.
मसूरी के 'मैक्स मोटर' का कहना है कि जबसे ये ऑफ़र रखा गया तब से कार बिक्री में चौगुनी वृद्धि हो गई है.
इस ऑफ़र में ग्राहकों को पिस्तौल या 250 डॉलर के गैस कार्ड में से एक को चुनने की सहूलियत है लेकिन अभी तक अधिकतर ग्राहकों को कार के साथ पिस्तौल ही पसंद आ रही है.
कंपनी के मालिक मार्क मलर का कहना है “हमें इस बात की बेहद ख़ुशी है कि हम एक ऐसे स्वतंत्र देश में रहते हैं जहाँ आप ज़रूरत पड़ने पर अपने साथ पिस्तौल रख सकते हैं.”
ये डीलर नई और पुरानी वाहन बेचता है जिसमें जनरल मोटर्स और फ़ोर्ड की कारें और ट्रकें शामिल हैं.
इस डीलर ने अपनी दुकान का जो लोगो बनवाया है उसमें भी एक काउब्वाय को पिस्तौल लिए दिखाया गया है.
डीलर ने तीन दिनों में ही 30 ट्रकें और कारें बेची हैं और इसका श्रेय वह इस ऑफ़र को ही देते हैं.
मलर का कहना है, "कनाडा के एक ग्राहक और एक बूढ़े व्यक्ति को छोड़कर अब तक सभी ने पिस्तौल को ही चुना है. इन दोनों ग्राहकों ने गैस कार्ड लेना पसंद किया था."
वे अपने ग्राहकों को एक ऐसी पिस्तौल का मॉडल चुनने की सलाह देते हैं जो जेब में आसानी से रखी जा सकती है.
डीलर का कहना है कि इस ऑफ़र का आइडिया उन्हें डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवार बराक ओबामा के एक भाषण से मिला.
वे बताते हैं कि इस भाषण में ओबामा ने सहानुभूति जताते हुए ज़िक्र किया था कि लोग बाइबल ओर पिस्तौल को बराबर अहमियत देने लगे हैं. उनका कहना था कि लोग रविवार को पिस्तौल लेकर चर्च जाने लगे हैं.
इस ऑफ़र का विज्ञापन वेबसाइट पर है और यह इस महीने के अंत तक जारी रहेगा.
इस विज्ञापन में ज़िक्र किया गया है कि पिस्तौल रखने के लिए किसी भी व्यक्ति की पृष्ठभूमि की जाँच-परख आवश्यक होती है.

Monday, May 19, 2008

बांग्लादेशियों की धरपकड़ शुरु


Marwar News!
राजस्थान की राजधानी जयपुर मे हुए बम धमाकों में कथित तौर पर बांग्लादेश के एक गुट का नाम सामने आने के बाद पुलिस ने राज्य भर में बांग्लादेशी नागरिकों की धरपकड़ शुरु कर दी है.
हालांकि राज्य मे कितने बांग्लादेशी है इसे लेकर ख़ुद भारतीय जनता पार्टी सरकार भ्रम में है.
कांग्रेस विधायक डॉक्टर चन्द्रशेखर बेद आंकड़ो का हवाला देकर कहते हैं, "बीजेपी सरकार जानकारी होने के बाद भी कार्रवाई नही कर पाई. क्योंकि इस सरकार के पास इच्छाशक्ति है ही नही."
वामपंथी संगठन कह रहे हैं कि अगर बांग्ला जुबान बोलने वाले भारतीयों को निशाना बनाया गया तो वो विरोध करेंगे.
पुलिस धरपकड़ मे अब तक क़रीब 12 बांग्लादेशियों को गिरफ़्तार किया गया है. इनमें से आठ को अजमेर मे गिरफ़्तार किया गया है.
''यहाँ पश्चिम बंगाल से ग़रीब मज़दूर सोने-चांदी और जवाहरात का काम करने आते रहे है. ऐसे लोगों को बांग्लादेशी बता कर अगर सताया गया तो हम इसे सहन नही करेंगे. क्योंकि पहले भी ऐसा हो चुका है.

वामपंथी नेता वकार उल अहद
पुलिस के अनुसार राज्य भर मे बांग्लादेशियों की जाँच का अभियान चलाया जा रहा है जो एक महीने तक चलेगा.
राज्य के संसदीय कार्य मंत्री राजेंद्र राठौर के मुताबिक जयपुर में पहले सर्वेक्षण मे बांग्लादेशियों की तादाद ढाई हज़ार पाई गई थी लेकिन अब इनकी संख्या दस हज़ार से कम नही है.
उधर, डेढ़ साल पहले गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया ने राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की मौजूदगी में अपने भाषण मे कहा था कि राजस्थान में पचास हज़ार बांग्लादेशी रह रहे है.
लेकिन दूसरी ओर, कांग्रेस विधायक बेद ने सरकार से सवाल पूछा तो जवाब आया कि जयपुर शहर में 916 और ग्रामीण जयपुर मे 345 बांग्लादेशी हैं. भरतपुर मे आठ बांग्लादेशी रह रहे हैं.
सरकार ने माना कि इनमें से कुछ बांग्लादेशियों को राशन कार्ड मिल चुके है, कुछ का नाम मतदाता सूची में शामिल हो चुका है और कुछ ऐसे भी हैं जो ड्राइविंग लाइसेंस ले चुके है.
ये तथ्य सामने आने बाद भी सरकार इन दस्तावेज़ों को ख़ारिज नहीं कर सकी है.
अदालत की टिप्पणी
पिछले वर्ष जयपुर की एक अदालत ने बांग्लादेशियों के बारे में सरकार पर तीखी टिप्पणी की थी.
अदालत ने कहा की सरकार ऐसे गंभीर मामले पर ध्यान नही दे रही है. अदालत ने मुख्य सचिव को भी इस बारे मे सूचित किया था.
विपक्ष के विधायक बेद कहते हैं, "इन प्रमाणों से साफ़ है की सरकार ऐसे ज्वलंत मुद्दों के लिए समय नही निकल पा रही है और बांग्लादेशियों पर उसकी चिल्ल-पो महज सियासी है."
वामपंथी नेता वक़ार उल अहद ने बीबीसी से कहा, "बांग्लादेशी क्या किसी भी विदेशी को हमारी सर जमीं पर रहने का हक़ नही है. आख़िर बांग्लादेशी यहाँ तक कैसे चले आते है."
बीजेपी सरकार जानकारी होने के बाद भी कार्रवाई नही कर पाई. क्योंकि इस सरकार के पास इच्छाशक्ति है ही नही

कांग्रेस के विधायक, चंद्रशेखर बेद
लेकिन वक़ार ये भी कहते हैं कि यदि बांग्ला भाषा बोलने वाले पश्चिम बंगाल के लोगों को निशाना बनाया तो वे विरोध करेंगे.
वे कहते हैं, ''यहाँ पश्चिम बंगाल से ग़रीब मज़दूर सोने-चांदी और जवाहरात का काम करने आते रहे है. ऐसे लोगों को बांग्लादेशी बता कर अगर सताया गया तो हम इसे सहन नही करेंगे. क्योंकि पहले भी ऐसा हो चुका है."
संसदीय कार्य मंत्री राठौर कहते हैं, "इनमें से ज्यादातर बांग्लादेशी अपना पता-ठिकाना पश्चिम बंगाल के कूच बिहार और चौबीस परगना जैसे ज़िलों का बताते है. लेकिन हम इनकी गहराई से जाँच करेंगे. पुलिस को जाँच का काम एक महीने मे पूरा करने को कहा गया है."
उधर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनो ने बांग्लादेशियों के विरुद्ध जनजागरण अभियान चलाने का ऐलान किया है.
बहरहाल बांग्लादेशी नागरिकों का मुद्दा सरकार के गले की फांस बन गया है.

Monday, May 12, 2008

नैनो के बाद अब सबसे सस्ता लैपटाप

Marwar News!
नई दिल्ली। अभी दुनिया की सबसे सस्ती कार (टाटा की नैनो) की चर्चा खत्म भी नहीं हुई है कि एक अन्य भारतीय कंपनी ने दुनिया का सबसे सस्ता लैपटाप बाजार में उतारने का ऐलान कर दिया है।
आईटी क्षेत्र में दुनिया भर में अपनी धाक जमा चुकी एचसीएल इन्फोसिस्टम्स लिमिटेड 'माइलीप' के ब्रांड नाम से दो तरह के लैपटाप उतारने जा रही है। इनमें एक्स सीरीज के तहत लैपटाप की कीमत केवल 13 हजार 990 रुपये रखी गई है। ज्यादा सुविधाओं वाले वाई सीरीज के लैपटाप की कीमत 29 हजार 990 रुपये तय की गई है। 26 जनवरी 2008 से ये लैपटाप देश भर में मिलने शुरू हो जाएंगे।
एचसीएल के चेयरमैन एवं सीईओ अजय चौधरी ने एक संवाददाता सम्मेलन में इन उत्पादों को सार्वजनिक तौर पर पेश किया। टाटा की लखटकिया नैनौ कार के आने के महज पांच दिन बाद सबसे सस्ते लैपटाप की लांचिंग को उन्होंने महज एक इत्तेफाक बताया। चौधरी के मुताबिक जिस तरह नैनो के आने के बाद एक दूधवाला या छोटा-मोटा व्यवसाय करने वाला व्यक्ति भी कार खरीदने का सपना सच कर सकेगा, उसी तरह माइलीप भी आईटी को अब समाज के कमजोर तबके तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाएगा। उन्होंने बताया कि खास तौर पर विद्यार्थियों, बिक्री व बीमा एजेंटों और काम के सिलसिले में अक्सर यात्रा करने वाले प्रोफेशनल्स के लिए यह एक उपयोगी उत्पाद साबित हो सकता है।
दोनों कंप्यूटरों का वजन बेहद हल्का है। इसमें सात इंच की स्क्रीन है। बेहद छोटा होने की वजह से इसे पार्को, ट्रेन, बस, विमान या मेट्रो ट्रेन में ले जाने में किसी प्रकार की दिक्कत आने की संभावना नहीं है। इनमें इंटेल का प्रोसेसर लगा हुआ है। एक्स सीरीज लाइनेक्स और विंडोज दोनों से ही चलने वाले आपरेटिंग सिस्टम से लैस है। इनमें वाई-फाई की भी सुविधा है। इसके अलावा वायरलेस कनेक्टिविटी, 80 जीबी का हार्ड डिस्क एवं ब्लूटूथ जैसी सुविधाएं तो हैं ही। वाई सीरीज में माइक्रोसाफ्ट विस्टा होम प्रीमियम लगा हुआ है। इसकी डिस्पले स्क्रीन 360 डिग्री तक घूम सकती है। यही नहीं, इसका डिजाइन इस तरह से तैयार किया गया है कि धूल, धूप व पानी का इस पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा।
दूसरे शब्दों में कहें तो एक सामान्य पर्सनल कंप्यूटर से आप जितने भी काम करना चाहते हैं वे सभी इस छोटे से लैपटाप के जरिए संभव हैं। शायद इसे ही ध्यान में रखकर चौधरी ने उम्मीद जताई है कि इसे बेचने के लिए ग्राहकों की प्रतीक्षा सूची बनानी पड़ेगी।

Sunday, May 11, 2008

एक दशक बाद नहीं दिखेंगे गिद्ध!

MarwarNews!
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगले दस सालों में एशियाई गिद्ध विलुप्त हो सकते हैं.
इसके लिए जानवरों को दी जाने वाली एक दवा को दोषी ठहराया गया है.
सर्वेक्षण करने वाली टीम का कहना है कि हालांकि सरकार ने जानवरों को दर्द के लिए दी जाने वाली दवा डाइक्लोफ़ेनाक पर प्रतिबंध लगा दिया है लेकिन इसे अभी भी किसानों को बेचा जा रहा है.
यह नया सर्वेक्षण बॉम्बे नेचरल हिस्ट्री सोसायटी के जर्नल में प्रकाशित किया गया है.
सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि सफ़ेद पूँछ वाले एशियाई गिद्धों की संख्या 1992 की तुलना में 99.9 प्रतिशत तक कम हो गई है.
इसके अनुसार लंबे चोंच वाले और पतले चोंच वाले गिद्धों की संख्या में भी इसी अवधि में 97 प्रतिशत की कमी आई है.
ज़ूलॉजिकल सोसायटी ऑफ़ लंदन के एंड्र्यू कनिंघम इस रिपोर्ट के सहलेखक भी हैं. वे कहते हैं, "इन दो प्रजातियों के गिद्ध तो 16 प्रतिशत, प्रतिवर्ष की दर से कम होते जा रहे हैं."
उनका कहना है, "यह तथ्य अपने आपमें डरावना और विचलित करने वाला है कि सफ़ेद पूँछ वाले गिद्ध हर साल 40 से 45 प्रतिशत की दर से कम होते जा रहे हैं."
ख़तरनाक दवा
इससे पहले भी वैज्ञानिकों ने कहा था कि यदि भारत में लगातार विलुप्त हो रहे गिद्धों को बचाना है तो जानवरों को दी जाने वाली दवा को बदलना होगा.
इससे पहले प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया था कि इस दवा को खाने वाले जानवरों का मांस खाकर पिछले सालों में गिद्ध की प्रजाति लगातार ख़त्म हुई है.
शोधकर्ताओं ने सलाह दी थी कि जानवरों को डाइक्लोफ़ेनाक नाम की दर्दनाशक दवा को बंद कर देना चाहिए.
भारत सरकार ने इसे वर्ष 2006 में प्रतिबंधित भी कर दिया गया था लेकिन भारतीय और ब्रिटिश शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रतिबंध का कोई ख़ास असर नहीं हुआ है.
उनका कहना है कि जानवरों के लिए डाइक्लोफ़ेनाक दवा के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया गया है लेकिन अब लोग मनुष्यों के लिए बन रही दवा का उपयोग जानवरों के लिए कर रहे हैं.
उनका कहना है कि दवा का आयात किया जा रहा है और इसका उपयोग हो रहा है.
इससे पहले शोधकर्ताओं ने डाइक्लोफ़ेनाक की जगह मेलोक्सिकैम नाम की दवा के उपयोग की सलाह दी थी लेकिन चूँकि वह डाइक्लोफ़ेनाक की तुलना में दोगुनी महंगी है इसलिए इसका उपयोग नहीं हो रहा है.
उपयोगी गिद्ध
हर साल आधी होती जा रही है गिद्धों की जनसंख्या
वैसे तो गिद्ध भारतीय समाज में एक उपेक्षित सा पक्षी है लेकिन साफ़-सफ़ाई में इसका सामाजिक योगदान बहुत महत्वपूर्ण है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गिद्धों के विलुप्त होने की रफ़्तार यही रही तो एक दिन ये सफ़ाई सहायक भी नहीं रहेंगे.
जैसा कि वे बताते हैं 90 के दशक के शुरुआत में भारतीय उपमहाद्वीप में करोड़ों की संख्या में गिद्ध थे लेकिन अब उनमें से कुछ लाख ही बचे हैं.
वैज्ञानिकों का कहना है कि गिद्धों को न केवल एक प्रजाति की तरह बचाया जाना ज़रुरी है बल्कि यह पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी ज़रुरी है.
वे चेतावनी देते रहे हैं कि गिद्ध नहीं रहे तो आवारा कुत्तों से लेकर कई जानवरों तक मरने के बाद सड़ते पड़े रहेंगे और उनकी सफ़ाई करने वाला कोई नहीं होगा और इससे संक्रामक रोगों का ख़तरा बढ़ेगा.

भजन गाओ और तनाव दूर भगाओ

MarwarNews!
लंदन. यदि आप उच्च रक्तचाप और तनाव से पीड़ित हैं तो दवाओं पर पैसा बहाने की बजाए किसी मंदिर में जाकर भजन-कीर्तन में हिस्सा लें।
डेली मेल में प्रकाशित रिपोर्ट में ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि लोगों को प्राणायाम की शिक्षा देने तथा भजन-कीर्तन या मंत्रोच्चर जैसी धुन का प्रयोग करने पर उनमें तनाव का स्तर कम हुआ और उनकी भावनात्मक स्थिति सकारात्मक हुई। शोधकर्ताओं ने इस तथ्य की पुष्टि के लिए कि चर्च में पुरुष गान समूहों में गाए जाने वाले ग्रेगोरियन पद्धति के भजन से तनाव कम होता है, वियना के प्राचीन ईसाई मठ के भिक्षुओं के दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर पर 24 घंटे तक निगाह रखी। भजन के दौरान दोनों न्यूनतम स्तर पर पाए गए।
* ग्रेगोरियन पद्धति के भजन का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह तनाव घटाकर व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ़ा सकता है।- डॉ. एलैन वाटकिंस, वरिष्ठ व्याख्याता, न्यूरोसाइंस, इंपीरियल कालेज लंदन

माँ का दूध पीने वाले ज्यादा स्मार्ट!

Good News!
लंदन.माँ का दूध पीकर बड़े होने वाले बच्चे बोतल या डिब्बा बंद दूध पीने वाले बच्चों की तुलना में अधिक स्मार्ट होते हैं।
लंदन स्थित मेकगिल विश्वविद्यालय के प्रो. मिशेल क्रेमर द्वारा हाल ही में किए गए शोध में यह बात सामने आई है। उन्होंने बताया कि नैसर्गिक रूप से दुग्धपान करने वाले बच्चे बड़े होकर अधिक कुशाग्र बुद्धि के होते हैं और ऐसे बच्चे न सिर्फ पढ़ाई-लिखाई में तेज होते हैं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारियों को भी अधिक कुशलता से निभाते हैं।
प्रो. क्रेमर ने कहा कि उनके इस शोध से दुग्धपान को बढ़ावा देने के लिए चल रही विश्वव्यापी मुहिम को प्रभावी बनाने में सहयोग मिलेगा। उन्होंने बताया कि 14 हजार बच्चों पर किए गए शोध में पाया गया कि दुग्धपान करने वाले बच्चों की बुद्धिमत्ता का स्तर (आईक्यू) कृत्रिम दूध पीने वाले बच्चों की तुलना में अधिक होता है।

कश्मीर में मुठभेड़ ख़त्म, आठ की मौत

Good News!
भारत प्रशासित कश्मीर के सांबा इलाक़े में सेना के साथ मुठभेड़ मे दो चरमपंथियों समेत आठ लोग मारे गए है.
मुठभेड़ में 11 लोग घायल भी हुए हैं. मारे गए लोगों में सेना के दो जवान भी शामिल हैं.
डीआईजी पुलिस फ़ारुख खान का कहना है कि कि मुठभेड़ ख़त्म हो गई है और दो चरमपंथी मारे गए हैं. मारे गए लोगों में दो महिलाएँ और एक स्थानीय अख़बार का वरिष्ठ फ़ोटो पत्रकार शामिल है.
घायलों में एक मेजर, पुलिस अधिक्षक (ऑपरेशन्स) और टीवी चैनल आईबीएन सेवन का वीडियोग्राफ़र शामिल है.
जम्मू के क़रीब सांबा के केलीमंडी इलाक़े में रविवार सुबह चरमपंथियों ने अचानक फ़ायरिंग शुरू कर दी. हमला करने के बाद चरमपंथी क़रीब के ही मकानों में छिप गए.
सुरक्षाबलों ने इस मकान को घेर लिया. चरमपंथियों ने इस दौरान कुछ ग्रेनेड भी इस्तेमाल किए और कुछ लोगों को मकानों के अंदर ही बंदी बना लिया.
मुठभेड़
चरमपंथी दो घरों में छिपे गए. सुरक्षाबलों और चरमपंथियों के बीच रुक रुक कर गोलियाँ चलती रहीं. एक महिला जो उस घर में छुपी हुई थी, उसकी इस गोलीबारी में मौत हो गई.
मुठभेड़ में फोटो पत्रकार अशोक सोढ़ी की मौत हो गई
घर में फंसी एक अन्य महिला और दो बच्चों को सुरक्षाबलों ने बचा लिया. इस मुठभेड़ में एक स्थानीय अख़बार के वरिष्ठ फ़ोटो पत्रकार अशोक सोढी भी मारे गए हैं.
साथ ही एक जवान अतुल कुमार की भी मृत्यु हो गई. गोलीबारी में होशियार सिंह और उनकी पत्नी की भी मौत हो गई.
इस चरमपंथी हमले में होशियार सिंह की बेटी और उनके घर पर आए एक मेहमान भी घायल हो गए.
मुठभेड़ में दो जवान गंभीर रूप से घायल हो गए. आसपास रहने वाले लोगों का कहना है कि मुठभेड़ में कई अन्य पत्रकार भी घिर गए थे.
सुरक्षा बलों ने फ़िलहाल सैलानियों को इस इलाक़े में जाने से रोक दिया है. सुरक्षा बलों का मानना है कि गुरुवार को हुई घुसपैठ में ये चरमपंथी भारत प्रशासित कश्मीर में दाखिल हुए होंगे.
हालांकि पहले सुरक्षा एजेंसियों ने इस बात से इनकार किया था कि गुरुवार को भारत और पाकिस्तान की तरफ़ से हुई गोलीबारी में कोई चरमपंथी भारत प्रशासित कश्मीर में दाखिल हुआ था.

Friday, May 9, 2008

एचआईवी ग्रस्त माँग रहे है 'इच्छा मृत्यु'


राजस्थान में एचआईवी पॉज़िटिव लोगों ने सरकार पर उपेक्षा का आरोप लगाया है. उन्होंने 'इच्छा मृत्यु' की इजाज़त मांगी है.
ये लोग अपनी माँगों को पूरा करवाने के लिए जयपुर में धरने पर बैठ गए हैं.
इनका आरोप है की सरकार ज़रूरी दवाओं की व्यवस्था नहीं कर रही है. वहीं सरकार ने इन आरोपों को ग़लत बताया है.
राज्यपाल को ज्ञापन
एचआईवी पॉज़िटिव पीड़ितों की संस्था के अध्यक्ष ब्रजेश दुबे ने बीबीसी को बताया की 20 पीड़ितों ने राज्यपाल को एक ज्ञापन भेजकर 'इच्छा मृत्यु' की अनुमति मांगी है.
दुबे कहते है, "हम अभाव और उपेक्षा की इस ज़िन्दगी से परेशान हो गए हैं. इस तरह की जिंदगी से अब हम तंग आ चुके हैं. कदम-कदम पर हमे अपमानित किया जा रहा है."
हम अभाव और उपेक्षा की इस ज़िंदगी से परेशान हो गए हैं. इस तरह की जिंदगी से अब हम तंग आ चुके हैं. कदम-कदम पर हमे अपमानित किया जा रहा है

एचआईवी ग्रस्त लोगों की संस्था
उधर एड्स नियंत्रण के लिए ज़िम्मेदार एक वरिष्ठ अधिकारी डॉक्टर अरुण बजाज कहते हैं, "सरकार ने अपने स्तर पर सभी व्यवस्था कर रखी है. हमने दवाओं और ज़रूरी चिकित्सा की माकूल व्यवस्था कर रखी है."
बजाज कहते हैं, "मेरे ख़्याल में दवाओं की कोई कमी नहीं है. जयपुर के अलावा ज़िला स्तर पर भी दवाओं की पर्याप्त व्यवस्था है."
राजस्थान नेटवर्क फ़ॉर पॉजिटिव पीपुल के मुताबिक, राजस्थान में कोई दो लाख लोग एड्स पीड़ित हैं.
सरकार ने अपने स्तर पर सभी व्यवस्था कर रखी है. हमने दवाओं और जरूरी चिकित्सा की माकूल व्यवस्था कर रखी है

एड्स नियंत्रण के उपनिदेशक
नहीं मिलता है काम
प्रकाश एक एड्स पीड़ित हैं. वह अपना दर्द बताते-बताते रो पड़ते हैं.
उन्होंने कहा, "मेरे चार बच्चे है. हम बड़ी मुश्किल में हैं. कही रोज़गार नहीं मिलता हैं. अगर सरकार हमे ग़रीबी रेखा की सूची में शामिल कर ले तो थोडी मदद हो जाएगी. वरना ऐसे घुट-घुट कर कैसे जिएँगे?."
सुरभी (बदला हुआ नाम) कहती हैं, "मेरी बेटी भी इस रोग से ग्रस्त है. समाज जब उपेक्षा करे तो सरकार का बड़ा सहारा होता है. मगर अब सरकार ही ध्यान नही दे रही है. हम माथे पर लगे इस दाग के साथ समाज में कहाँ जाकर खडे होंगे?"
इन पीडितों का कहना है की अगर सरकार सहारा दे तो उनकी ज़िंदगी की राह कुछ आसन हो जाएगी.

नारायण बारेठ

बीबीसी संवाददाता, जयपुर

Thursday, May 8, 2008

भारत के खली ने मचाई खलबली

GooD News !
एक भीमकाय इंसान जो कभी हिमाचल प्रदेश के खेतों में काम करता था और अब अंतरराष्ट्रीय कुश्ती का चमकता सितारा है. जी हाँ, हम बात कर रहे हैं खली की.
अमरीका के अटलांटा शहर में रहने वाले खली का असली नाम दलीप सिंह राणा है.
खली कुछ हॉलीवुड फ़िल्मों में काम कर चुके हैं और अब उन्हें बॉलीवुड से भी काम के प्रस्ताव आ रहे हैं.
उन्होंने वर्ष 2005 की फ़िल्म 'द लॉंगेस्ट यार्ड' और 'गेट स्मार्ट' जैसी फ़िल्मों में काम किया.
पंजाबी मुंडा
छत्तीस वर्षीय राणा आजकल भारत में हैं. वो अपना कुछ समय घर में बिताएंगे और अपने जीवन पर बनने वाली वृत्तचित्र के लिए शूटिंग भी करेंगे.
दलीप सिंह राणा अमरीका में डब्ल्यूडब्ल्यूई में लड़ने वाले पहले भारतीय हैं. वो दुनियाभर में मशहूर डब्ल्यूडब्ल्यूई योद्धा हल्क होगन और द रॉक के साथ काम करते हैं.
खली सात फ़ीट तीन इंच लंबे हैं और उनका वज़न 420 पाउंड है
खली के बारे में डब्ल्यूडब्ल्यूई की वेबसाइट कहती है कि वो भारत के रहने वाले हैं, सात फ़ीट तीन इंच लंबे हैं और उनका वज़न 420 पाउंड है.
वेबसाइट का कहना है कि खली भारत के जंगल में घूमते हैं और उन्हें अजगरों से डर नहीं लगता. वेबसाइट की माने तो 'महान खली' पश्चिम बंगाल के बाघों से भी दो-दो हाथ कर चुके हैं.
खली कहते हैं कि अमरीका के लोगों ने कभी सोचा भी नहीं था कि डब्ल्यूडब्ल्यूई में कभी कोई भारतीय भाग लेगा, लेकिन वे इसका मज़ा लूट रहे हैं.
बढ़ती लोकप्रियता
दो वर्ष पहले अमरीका की सरकार डब्ल्यूडब्ल्यूई के पहलवानों को इराक में सैनिकों के मनोरंजन के लिए ले जाना चाहती थी.
इन पहलवानों की एक शुरुआती सूची बनाई. इस शुरुआती सूची में खली का भी नाम था. हालांकि अंतिम सूची में उनका नाम नहीं था.
उनका हाथ इतना विशाल है कि अगर आप उनसे हाथ मिलाएँ तो आपका हाथ कहीं खो जाता है और वो चाहें तो अपने हाथ से आपका सर मसलकर रख दें

स्टीन कैरेल, हॉलीवुड कलाकार
खली के प्रवक्ता अमित स्वामी हैं, वो उत्तरी राज्य हरियाणा के रहने वाले हैं और ख़ुद एक बॉडीबिल्डर हैं.
अमरीका के फ़िल्म कलाकार स्टीन कैरेल ने खली के साथ ‘गेट स्मार्ट’ फ़िल्म में काम किया था.
वो कहते हैं,'' उनका हाथ इतना विशाल है कि अगर आप उनसे हाथ मिलाएँ तो आपका हाथ कहीं खो जाता है और वो चाहें तो अपने हाथ से आपका सर मसलकर रख दें.''
कैरेल कहते हैं कि खली बेहद मधुर स्वभाव के हैं और ‘मुझे नहीं लगता कि उन्हें पता था कि वो एक फ़िल्म में काम कर रहे हैं.’
उधर खली उर्फ़ राणा का कहना है कि वो सिर्फ़ चुनी हुई भारतीय फ़िल्में ही करेंगे.
खली के शुरुआती दिनों की बात करें तो वो रोड परियोजनाओं के लिए पत्थर तोड़ने का काम करते थे.
उनके गाँव धिराना की महिलाएं उन्हें भारी भरकम काम, जैसे जानवर को उठाकर एक जगह से दूसरी जगह रखना जैसे काम करवाती थीं.
मुश्किलें
खली का जीवन उस वक्त बदला जब वो अपने दोस्त स्वामी के साथ दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अपने पसंदीदा पहलवान डोरियन येट्स से मिलने गए.
खली का कहना है कि जिस मुक़ाम पर हैं, वहाँ पहुंचना बेहद मुश्किल था
येट्स खली का डीलडौल देखकर बेहद प्रभावित हुए.
जल्द ही खली अपनी किस्मत आज़माने जापान रवाना हो गए. वहाँ बिताए एक साल में उन्होंने कई ‘झूठी’ लड़ाइयाँ लड़ी.
उसके बाद वह अमरीका चले गए जहाँ उन्होंने ऐसी लड़ाइयों को पेशा बना लिया.
खली का कहना है कि जिस मुक़ाम पर हैं, वहाँ पहुंचना बेहद मुश्किल था.
आराम की ज़िंदगी
डब्ल्यूडब्ल्यूई कार्यक्रम वालों को राणा का नया नाम ढूढ़ने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी. किसी ने उसे जायंट सिंह कहा तो तो किसी ने उसे भीम नाम से संबोधित किया.
किसी ने कहा कि राणा का नाम भगवान शिव रखा जाए, लेकिन इस नाम को भी ख़ारिज कर दिया गया क्योंकि इससे भारत में रहने वाले लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँच सकती थी.
फिर राणा ने माँ काली का नाम सुझाया और उनकी विनाशकारी शक्तियों के बारे में बताया. सबको यह नाम बेहद पसंद आया. लेकिन विदेशियों ने उनका नाम खली कर दिया.
राणा का कहना है कि वो शाकाहारी हैं और तंबाकू और शराब से दूर रहते हैं.
वो कहते हैं कि वह अपनी पत्नी हरमिंदर कौर के साथ एक साधारण ज़िंदगी व्यतीत करते हैं.
राणा यानि खली का कहना है कि वह डब्ल्यूडब्ल्यूई से कुछ और वर्ष जुड़े रहेंगे.

Friday, May 2, 2008

पाक में एसएमएस भेज मांगते हैं भीख

Go od News!
इस्लामाबाद। मोबाइल फोन आज हर किसी के काम आ रहा है। अपहर्ताओं ही नहीं, भिखारियों के भी। अपहर्ता फोन के जरिए फिरौती मांगते हैं तो भिखारी भीख मांगने के लिए लोगों को एसएमएस भेजते हैं। पाकिस्तान में भिखारियों ने मोबाइल फोन को अपने धंधे का हथियार बना लिया है।
पाकिस्तान के भिखारी हाईटेक जरूर हो गए हैं, लेकिन भीख मांगने का उनका अंदाज वही पुराना है। एसएमएस के जरिए भीख मांगते हुए भी वे अल्लाह को नहीं भूलते। उन्हीं के नाम पर भीख देने को कहते हैं। मसलन, लोगों के पास इस तरह के एसएमएस पहुंचते हैं, 'मैं एक गरीब आदमी हूं। मेरी बेटी अस्पताल में भर्ती है। यदि आप अल्लाह में यकीन रखते हैं तो कृपया मुझे दस रुपये देने का कष्ट करें। अल्लाह आपको बरकत देगा और हर तरह की परेशानियों से दूर रखेगा।'
हाईटेक भिखारियों ने अपनी औकात भी ज्यादा नहीं बढ़ाई है। वे एसएमएस भेज कर ज्यादा से ज्यादा सौ रुपये की ही मांग रखते हैं। व्यवसायी मुहम्मद उस्मान का दावा है कि उन्हें हर दिन ऐसे दस मैसेज मिलते हैं। अखबार 'डेली टाइम्स' ने उस्मान के हवाले से लिखा है, 'इन मैसेज को नजरअंदाज करना मुश्किल है।'
दरअसल, अल्लाह के नाम पर मांगे जाने पर कई लोग असमंजस में पड़ जाते हैं। यूनुस नाम के एक शख्स ने तो इन अनाम संदेशवाहकों को पैसे भेजना भी शुरू कर दिया है। उनका कहना है, 'यह जाने बिना कि मैसेज किसने भेजा है, मैं अल्लाह के नाम पर पैसे दे देता हूं।' हालांकि उनका मानना है कि भिखारियों को लोगों को ब्लैकमेल नहीं करना चाहिए।

क्लास में सिखाते है डेटिंग व रोमांस के गुर

Good News!
सिंगापुर। क्या आप किसी ऐसी क्लास के बारे में यकीन करेंगे जिसमें बैठे युवा छात्र-छात्राएं बाकायदा रोमांस करने, डेट पर जाने और मौज-मस्ती करने के गुर सीख रहे हैं। जी हां, सिंगापुर में इन दिनों ऐसी भी क्लास लग रही हैं।
'लव रिलेशंस फार लाइफ : ए जर्नी आफ रोमांस, लव एंड सेक्सुअलिटी' की इस क्लास में बैठे युवा जोड़े आपस में हंसी-ठिठोली करते हुए पढ़ाई पूरी कर रहे हैं। उनके टीचर सुकी तोंग उन्हें बाकायदा रोमांस करने और डेट पर जाने के नुस्खे बताते हैं।
यहां के दो पालीटेक्निक संस्थानों में इस कोर्स का यह दूसरा साल है। और यह बेहद लोकप्रिय भी हो रहा है। वैसे यह सब सिंगापुर सरकार की देश में गिरती जनसंख्या दर पर लगाम कसने की कवायद के तहत हो रहा है। सरकार गिरती जनसंख्या दर से चिंतित है। पिछले वर्ष सिंगापुर में प्रति महिला जन्मदर गिरकर सबसे कम [1.24] रह गई। यह दुनिया भर में सबसे कम है। सिंगापुर में यह लगातार 28वां साल था जब जनसंख्या के मौजूदा स्तर को बरकरार रखने के लिए जरूरी जन्मदर 2.5 के औसत से कम रही।
पिछले 25 वर्षो से सिंगापुर सरकार युवा जोड़ों को मिलने-जुलने के मौके देने के लिए टी डांस, वाइन टेस्टिंग, कुकिंग क्लास और रोमांटिक फिल्मों की स्क्रीनिंग जैसे सामूहिक आयोजन करती रही है। डेटिंग व रोमांस की ये नई क्लास इसी कड़ी का हिस्सा हैं।
सामुदायिक विकास, युवा मामले व खेल विभाग के मंत्री यू फो यी शून का इस बारे में कहना है, 'हम छात्रों को बताना चाहते हैं कि बच्चे पैदा करने के लिए करियर संवरने तक इंतजार मत करो। इसमें कभी-कभी काफी देर हो जाती है, खास तौर पर लड़कियों के मामले में।'