
Tuesday, August 19, 2008
सुरक्षित है स्वदेशी एड्स वैक्सीन

चेन्नई। देश में ही विकसित एक एड्स वैक्सीन के चिकित्सकीय परीक्षण का पहला चरण सफल साबित हुआ है।"इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर), नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गनाइजेशन (नाको) और इंटरनेशनल एड्स वैक्सीन इनीशिएटिव (आईएवीए) ने प्रारम्भिक स्तर पर इसे मरीजों के लिए सुरक्षित बताया है।परीक्षण के दौरान स्वयंसेवियों पर मॉडिफाइड वैक्सीनिया अंकारा (एमवीए) नामक इस वैक्सीन की दो खुराकों का उपयोग किया गया। तीन इंजेक्शनों के बाद कम खुराक लेने वाले लोगों में 82 फीसदी सुधार और पूरी खुराक लेने वाले लोगों में 100 फीसदी तक का सुधार देखा गया।आईसीएमआर के अतिरिक्त महानिदेशक एस.के. भट्टाचार्य ने कहा कि चेन्नई में जिन लोगों पर एमवीए का प्रयोग किया गया उनमें अप्रत्याशित सुधार देखा गया। हालांकि हम अभी यह नहीं कह सकते कि यह वैक्सीन पूरी तरह प्रभावी सिद्ध होगी।
Posted on 7:45 PM
Thursday, August 7, 2008
गर्भनिरोधक गोलियों के प्रति बढ़ा युवतियों का रूझान

एसएनबी
नई दिल्ली। वाकई यह चौंकाने वाला तथ्य है कि दिल्ली में अनुमानत: प्रतिदिन 300 से 350 किशोरियां गर्भपात कराती हैं जबकि महीने में ऐसी लड़कियों की संख्या करीब 12 से 14 हजार है। इनमें अधिकांशत: डॉक्टर की सलाह के बिना ही किया जा रहा है। यह खुलासा परिवार कल्याण निदेशालय की देखरेख में कराए गए सहेली नामक एक सर्वे में किया गया। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि बाजार में गर्भनिरोधक गोलियों की भरमार है। मगर, असुरक्षित संबंध बनाने की चाह ने उन्हें पेट में पल रहे मासूम की हत्या का दोषी माना जा सकता है।
सर्वे से जुडे़ विशेषज्ञों का मनाना है कि आपातकालीन गोलियों ने युवा दंपतियों मे न केवल पहचान बनाई है वहीं यह युवाओं के लिए जरूरत भी बनती जा रही है। साल 2005 से पहले डॉक्टर की पैरवी पर ही इमरजेंसी कोंट्रासेप्टिव पिल्स यानी ईसी मिलती थी। मगर, इसकी जबर्दस्त मार्केटिंग के बाद तो कोई भी महिला या युवती किसी भी कैमिस्ट की दुकान से सहजता से खरीद रही है। हालांकि स्वास्थ्य मंत्रालय का मानना है कि आईपिल परिवार नियोजन में काफी मददगार साबित हो रहा है।
देश में प्रतिवर्ष 50 लाख गर्भधारण होते हैं। इनमें से 30 फीसद मामलों में गर्भपात कराया जाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 75 प्रतिशत गर्भधारण अनिच्छा या बिना प्लान के ही हो जाते हैं। करीब 20 हजार मौंते एबार्शन के वक्त जटिलता के कारण होती है। इसलिए अनचाहा गर्भधारण और बेवजह की मौत रोकने में ईसी और आईपिल जैसी गोलियां कारगर साबित हो सकती हैं। परिवार कल्याण निदेशालय के निदेशक डॉ. एक जैना के अनुसार सर्वे में 20 से 35 साल की 20 हजार महिलाओं को शामिल किया गया था, जिसे नौ जिलों में विभाजित किया गया था। इनमें कॉलेज, कार्यालयों में कामकाजी व घरेलू महिलाओं को शामिल किया गया था जिन्होंने अनचाहे गर्भ से निजात पाने के लिए आईपिल दवाओं का मनमर्जी से इस्तेमाल करने की बात स्वीकारी। वर्ष 2005 में सरकार ने इस उत्पादन यानी ईसी पिल्स को रिप्रोडक्टिव एंड चाइल्ड हेल्थ प्रोग्राम में शामिल किया गया था। इसलिए इसकी कीमत में भी कटौती करने की मांग की गई। इसका दाम 40 रूपए से घटा कर पांच रूपए कर दी गई है। सरकार ने इस पिल्स के बारे में जागरूकता लाने के लिए जगह-जगह कैंप भी लगाने की रूपरेखा तैयार की है। इसके जरिए लोगों को आईपिल की हानियां व रोकथाम के बारे में जागरूक किया जाएगा।
दिल्ली मेडिकल काउंसिल के सदस्य व नई दिल्ली नगर पालिका परिषद के फीजिशियन डॉ. अनिल बंसल के अनुसार आईपिल ब्रांड की गोलिया पिल-72 के नाम से बिक रही हैं। कंपनी ने इसे यही नाम दिया है। मतलब यह कि अगर परिवार नियोजन के दौरान कोई गलती हो जाए तो इसे 72 घंटे के अंदर लिया जा सकता है। अनचाहे गर्भ से मुक्ति तो मिलेगी ही मासूम की हत्या भी नहीं करनी होगी। इसके एक पैक में सिर्फ एक ही गोली होती है। इसमें लेवोनारजेलट्रान नामक हारमोन की मात्रा काफी कम होती है। अगर निर्धारित समय में यह गोली ले ली जाए तो गर्भधारण की 89 प्रतिशत संभावना कम हो जाती है। यह भी: दरअसल आईपिल्स आपातकालीन गर्भनिरोधक है, जिसे बहुत जरूरत पड़ने पर ही दंपति को प्रयोग से लाना चाहिए या दुष्कर्म की शिकार महिला को अनचाहे गर्भ से मुक्ति के लिए दिया जाना चाहिए। भ्रामक प्रचार से इसे मौज-मस्ती का साधन बना दिया है। कई यवतियां इसे मार्निंग आफ्टर पिल्स को इसलिए इस्तेमाल करते हैं ताकि उनके अवैध संबंध उजागर न हों। हैरत की बात है कि एक-साथ दो-तीन छुटि्टयां पड़ने पर आईपिल्स की मांग बढ़ जाती है।
Last Updated[ 7/12/2008 1:48:05 AM]
Posted on 8:55 AM
Sunday, July 27, 2008
तंबाकू का पौधा कैंसर में बड़े काम की चीज

वॉशिंगटन : अमेरिकी वैज्ञानिकों ने तंबाकू के पौधे से 'लिम्फोमा' के वैक्सीन का विकास किया है। लिम्फोमा एक तरह का कैंसर होता है। कैलिफोर्निया की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर तंबाकू के पौधे से लिम्फोमा के 'बी-सेल्स' के खिलाफ एक टीके का विकास कर रहे हैं। बीबीसी न्यूज ने बुधवार को बताया कि वैक्सीन को लिम्फोमा के मरीज के शरीर में प्रवेश कराया जाता है, ताकि शरीर में उन सेल्स से बचाव की क्षमता विकसित हो सके, जो लिम्फोमा की वजह बनती है। अगर यह प्रयोग सफल रहा, तो इसका मतलब यह होगा कि शरीर लिम्फोमा के सेल्स की पहचान कर उन्हें नष्ट कर सकेगा।
शोध का नेतृत्व कर रहे रोनाल्ड लेवी ने कहा, 'यह तकनीक आश्चर्यचकित भी करती है, क्योंकि आप तंबाकू से कैंसर का इलाज़ करने का दावा कर रहे हैं।' इससे पहले पशुओं के सेल्स में यह प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने की कोशिश की गई, लेकिन उसमें मिली-जुली सफलता मिली। वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स पता लगाने के लिए इसका अभी कुछ ही मरीजों पर प्रयोग किया गया है।
Posted on 9:13 AM
ताउम्र जवां बने रहना हो सकता है मुमकिन

पीटीआई(वॉशिंगटन)
जिंदगी भर जवां रहना आखिर कौन नहीं चाहेगा। अगर वैज्ञानिकों की मानें, तो उम्र बढ़ने के लिए जिम्मेदार जनेटिक प्रक्रिया को रोका जा सकता है।
रिसर्चर का कहना है कि बुढ़ापा की वजह शरीर में टूट-फूट नहीं, बल्कि एक जनेटिक प्रक्रिया होती है। अमेरिका की स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के रिसर्चरों ने बुढ़ापे की वजहों की अब तक कि थ्योरी को गलत बताया है। इससे उम्मीद जगी है कि साइंस के जरिए उम्र को बढ़ने से रोका या इसे उम्र को कम किया जा सकता है। डिवेलपमंट बायॉलजी एंड जनेटिक्स के प्रोफेसर स्टुअर्ट किम ने बताया कि सभी लोग मानते हैं कि बुढ़ापा जंग लगने से होता है। लेकिन फिर आप इस बात को कैसे सही ठहराओगे कि जानवर बूढ़े नहीं होते। उन्होंने कहा कि कछुए 100 साल की उम्र में अंडे देते हैं और वेल 200 साल जीती हैं।
हमारे आंकड़े शरीर में होने वाले डैमिज़ के मौजूदा मॉडल से बिल्कुल अलग हैं। किम का कहना है कि कछुए और वेल जैसे जानवरों के डीएनए में प्रोटीन और वसा के वही ब्लॉक होते हैं जैसे कि मानवों, चूहों या दूसरे गोल कृमियों में होते हैं। स्टडी के मुताबिक बुढ़ापे का रासायनिक सिद्धांत और फ्री रेडिकल्स में टूट-फूट सभी सेल्स के लिए एक होती है। इस तरह यह बताना काफी कठिन हो जाता है कि क्यों कुछ प्रजातियों की जीवन अवधि अलग-अलग होती है। प्रोफेसर किम और उनके सहयोगियों ने गोल कृमियों का अध्ययन किया और पाया कि युवा और बूढ़े कृमियों में उम्र बढ़ने की तस्वीर अलग-अलग होती है। किम के अनुसार मानवों में भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए।
Posted on 9:10 AM
योग से बढ़ती है एड्स से लड़ने की ताकत

एनबीटीः मेडिटेशन से एड्स के दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। अमेरिकी रिसर्चरों का अनुमान है कि इससे मरीज़ों की प्रतिरोधक क्षमता में सुधार होता है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया के शोधकर्ताओं के मुताबिक अगर बड़े स्तर पर भी ऐसे ही नतीज़े सामने आए, तो निश्चित तौर पर एड्स के खिलाफ लड़ाई में यह एक सस्ता और बिना तकलीफ वाला तरीका होगा।
टीम ने लॉस ऐंजिलिस के 67 एचआईवी पॉज़िटिव लोगों पर एक छोटा सा टेस्ट किया था। इन मरीजों को तनाव कम करने के एक प्रोग्राम में शामिल किया गया। इसे माइंडफुलनेस मेडिटेशन का नाम दिया। इसमें जोर दिया गया कि लोग अपनी चेतना को अतीत के दुख और भविष्य की चिंताओं में लगाने की जगह वर्तमान के बारे में सोचें। मरीजों द्वारा दो महीने के इस मेडिटेशन प्रोग्राम में हिस्सा लेने से पहले और बाद में उनके सीडी4-टी सेल की गिनती कि गई थी। जैसे-जैसे वॉलंटियरों ने मेडिटेशन का समय बढ़ाया उनके शरीर में सीडी4-टी सेल की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई। इससे अंदाजा लगाया गया कि उनके शरीर का इम्यून सिस्टम या प्रतिरोधी तंत्र एड्स वायरस से आसानी से मुकाबला कर पा रहा है।
इस स्टडी में अहम भूमिका निभाने वाले डेविड क्रेसवेल का कहना था कि स्ट्रेस मैनिजमंट प्रोग्राम और मेडिटेशन का सीधा असर एचआईवी की सक्रियता पर पड़ता है, और उसकी बढ़त धीमी पड़ जाती है। उन्होंने बताया कि ध्यान में भाग लेने वाले लगभग सभी लोग पहले तनाव से ग्रस्त थे।
ब्रेन, बिहेवियर एंड इम्युनिटी नामके जर्नल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक इस स्टडी में भाग लेने वाले अधिकतर वॉलंटियर पुरुष, अफ्रीकन-अमेरिकन, होमोसेक्सुअल और बेरोजगार थे। इसके अलावा ये एंटी रिट्रोवायरल इलाज भी नहीं करा रहे थे।
मेडिटेशन की क्लास में आठ हफ्तों तक हर रोज दो-दो घंटे के सेशन चलते रहे। वॉलंटियरों ने पूरी तरह इसका आनंद उठाया। केसवेल का कहना है कि मेडिटेशन का यह तरीका ग्रुप बेस्ड और बहुत सस्ता है। अगर इसके शुरुआती नतीजे आगे भी मिलते रहते हैं तो यह एड्स से लड़ने के लिए दवाइयों के कोर्स के साथ-साथ एक बढि़या तरीका साबित होगा।
Posted on 9:07 AM
Friday, July 25, 2008
तीस सालों से अस्थियों को गंगा का इतंज़ार

हफ़ीज़ चाचड़
बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, कराची से
पाकिस्तान में कराची शहर के एक शमशान घाट में 100 से अधिक लोगों की अस्थियाँ गंगा नदी में विसर्जन के इंतज़ार में हैं. कराची में गूजर हिंदू समुदाय शमशान घाट में ये अस्थियां रखी हुई हैं. जिन लोगों की ये अस्थियाँ हैं उनकी आख़िरी इच्छा थी कि अस्थियाँ गंगा में विसर्जित की जाएँ.
शमशान घाट के प्रबंधक महाराज महादेव ने बीबीसी को बताया, “यह अस्थियाँ कम से कम 30 वर्षों से पड़ी हैं, इन लोगों के परिजन भारतीय वीज़ा न मिलने की वजह से अस्थियों को हरिद्वार के पास गंगा में विसर्जति नहीं कर सके.”
उन्होंने बताया कि भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों के अनुसार हरिद्वार में कोई रिश्तेदार या जान पहचान वाला हो तभी वीज़ा मिल सकता है. महाराज ने कहा, “ऐसे कई लोग हैं जिनका हरिद्वार में कोई नहीं है, ये ग़रीब लोग बार-बार वीज़ा के लिए इस्लामाबाद जाने का ख़र्च बर्दाश्त नहीं कर सकते थे.”
इंतज़ार में...
अस्थियाँ कम से कम 30 वर्षों से पड़ी हैं, इन लोगों के परिजन भारतीय वीज़ा न मिलने की वजह से इन अस्थियों को हरिद्वार के पास गंगा में विसर्जति नहीं कर सके
महाराज महादेव
शमशान घाट प्रशासन ने एक पत्र लिख कर हिंदू समुदाय को सूचित किया है कि 100 के करीब अस्थियाँ पड़ी हैं जिनके बारे में पता नहीं है कि यह किस परिवार की हैं क्योंकि इन मटकों पर नाम मिट चुके हैं.
महाराज महादेव का कहना है कि अस्थियाँ विसर्जित करने के लिए मरने वालों के परिजनों का उपस्थित होना ज़रूरी है, इसलिए यह पत्र लिखा गया है.
1998 की जनसंख्या के अनुसार पाकिस्तान में करीब 24 लाख, 33 हज़ार हिंदू है और पिछले 10 सालों में हिंदुओं की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई है. हिंदू समुदाय अधिकतर सिंध प्रांत में रहते हैं.
पाकिस्तान हिंदू परिषद के सदस्य हरी मोटवाणी ने बताया, “जो ग़रीब लोग भारत नहीं जा सकते, वह अपने परिजनों की अस्थियाँ सिंधू नदी में विसर्जित करते हैं.”
उन्होंने कहा कि ज़रूरी नहीं है कि अस्थियों को भारत में ही विसर्जित किया जाए और यह तो परिवारजनों की मर्ज़ी पर निर्भर करता है.
पिछले कई सालों से भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में बहतरी के कारण वीज़ा नीति में नर्मी हुई है.
इसी साल भारत से कई लोगों की अस्थियाँ ला कर सिंधू नदीं में विसर्जित की गई हैं जिनमें सिंधी साहत्यकार हरी मोटवाणी और सुप्रसिध गांधीवादी निर्मला देशपांडे शामिल हैं.
हिंदू परिषद के सदस्य हरी मोटवाणी के अनुसार आजकल भारत सरकार आसानी से वीज़ा जारी कर रही है लेकिन कुछ दिक्कतें ज़रूर हो रही हैं.
उल्लेखनीय है कि शमशान घाट के प्रशासन ने इन अस्थियों के विसर्जन के लिए भारत सरकार से सपंर्क किया है. महाराज महादेव का कहना है कि यदि भारत सरकार की अनुमति मिल गई तो इन अस्थियों को गंगा नदी में विसर्जित किया जाएगा.
उन्होंने पाकिस्तान सरकार से मांग की है कि वह इन अस्थियों के विसर्जन के लिए भारत सरकार से अनुरोध करे.
Posted on 9:31 AM
Wednesday, July 23, 2008
नैनो आई नहीं प्रतिबंध की मांग पहले

डीएनए
Wednesday, July 23, 2008 17:12 [IST]
मुंबई.देश में सस्ती कार के नाम से आने वाली नैनो कार भले ही अभी सड़क पर नहीं आई है, लेकिन इसकी दहशत अभी से नजर आने लगी है। महाराष्ट्र विधान परिषद में तो विपक्ष ने इस कार पर प्रतिबंध लगाने तक की मांग कर दी जिसे परिवहन राज्यमंत्री हसन मुशरिफ ने मंगलवार को खारिज कर दिया।
मुंबई में करीब 15 लाख गाड़ियां पहले से सड़कों पर दौड़ रही हैं। इनमें प्रतिदिन 15 हजार गाड़ियां और जुड़ जाती हैं। विपक्ष को अंदेशा है कि नैनो जैसी सस्ती कार के बाजार में आते ही उसे खरीदने वालों में भगदड़ मच जाएगी और प्रदूषण व वाहन संबंधी सारे नियम कायदे टूट जाएंगे। सड़कों पर जाम लग जाएगा और चलने के लिए कहीं जगह नहीं बचेगी।
भाजपा के मधु चव्हाण ने टाटा की नैनो पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। अंतरराष्ट्रीय मापदंड के अनुसार एक किलोमीटर के दायरे में करीब 300 वाहन होने चाहिए जबकि मुंबई में इतने क्षेत्र में करीब 591 गाड़ियां हैं। नैनो के आ जाने से यह संख्या बहुत बढ़ जाएगी। अपना पद संभालने के महज पांच दिन बाद आए संकट से निपटते हुए परिवहन राज्यमंत्री मुशरिफ ने कहा कि किसी भी कार पर प्रतिबंध लगाया जाना व्यावहारिक नहीं है।
अलबत्ता मंत्री ने यह माना कि राज्य के परिवहन विभाग में कई तरह की धांधलियां हैं, जिन्हें दूर किया जाना है। उन्होंने अफसरों को तो भ्रष्टाचार न करने को कह दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि पूरा आकाश ही फटा हुआ है कहां तक उसकी सिलाई करें।
Posted on 10:52 AM
भगवान राम ने खुद तोड़ा था रामसेतु

एजेंसी
Wednesday, July 23, 2008 20:44 [IST]
नई दिल्ली.रामसेतु प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा है कि भगवान राम ने अपनी पत्नी सीता को छुड़ाने के लिए श्रीलंका जाते समय रामसेतु बनवाया था लेकिन लौटते समय उसे खुद राम ने तोड़ दिया था। सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील एफएस नरीमन ने यह दलील कंबन रामायण का हवाला देते हुए दी।
नरीमन के मुताबिक, ऐसे में सरकार किसी सेतु या पुल को नहीं नष्ट कर रही क्योंकि किसी पुल का अस्तित्व नहीं था। फिर भी सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर अपनी प्रतिक्रिया में सेतुसमुद्रम शिपिंग कैनाल प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए वैकल्पिक मार्ग अपनाने पर रजामंदी जताई। इससे रामसेतु को छोड़े जाने के आसार बढ़ गए हैं।
चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन नीत बेंच ने नरीमन को सुझाव दिया कि सरकार को आस्था और जीवमंडल के बीच संतुलन के लिए कुछ करना चाहिए। बेंच में शामिल जस्टिस रवींद्रन ने यह भी सुझाव दिया कि जब कोई मुद्दा नहीं हो तो सरकार को इसे बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
नरीमन ने इन सुझावों से सहमति दिखाते हुए शीर्ष कोर्ट को आश्वस्त किया कि वे सरकार को सुझाव देंगे कि वह इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करे।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि वह इस पर विचार करे कि वैज्ञानिक, तकनीकी, आर्थिक और सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक लिहाज से क्या थोड़ा बदलाव उचित होगा।
इससे पहले, पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. सुब्रrाण्यम स्वामी और तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता समेत याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कोर्ट से रामसेतु को राष्ट्रीय विरासत घोषित करने तथा इसे नष्ट नहीं करने की मांग करते हुए अपनी दलीलें दीं।
Posted on 10:07 AM
Saturday, July 12, 2008
बड़े-छोटे मस्त, मंझले की मुसीबत
डीएनए
Sunday, July 13, 2008 09:00 [IST]
मुंबई.बड़ा बच्चा है तो जिम्मेदार होगा और छोटा तो सबका लाडला है। आमतौर पर पेरेंट्स की अपने बड़े और छोटे बच्चे के प्रति कुछ ऐसी ही धारणा होती है इससे बीच वाला बच्चा उपेक्षित रह जाता है या खुद को उपेक्षित महसूस करता है। उसे लगता है उसका कोई वजूद ही नहीं। बर्थ ऑर्डर के हिसाब से पेरेंट्स द्वारा बच्चों से व्यवहार करने के पीछे कई सामाजिक और मनो वैज्ञानिक पहलू हैं।
बर्थ ऑर्डर कई बार बच्चों के माइंडसेट को काफी गहरे तक प्रभावित करता है। बड़े बच्चे के पहले कदम से लेकर पहले शब्द तक मां बाप की पूरी अटेंशन रहती है, यही वजह है कि उन्हें यह सब खास लगता है। छोटा बच्चा पेरेंट्स की इस अटेंशन से बेखबर रहता है और वही करता है जो उसका दिल करता है।
मनोचिकित्सक अंजली छाबड़िया के मुताबिक बीच के क्रम वाला बच्चा कुछ अलग ही तरह से सोचता है।
काश मैं भी बड़ा होता:
ज्यादातर मां बाप के पूरी तरह से ध्यान नहीं दे पाने के चलते बीच वाला बच्चा खुद को उपेक्षित महसूस करता है। वह सोचता है काश वह बड़ा बच्चा होता। पेरेंट्स को बच्चों को लेकर बैलेंस अप्रोच रखनी चाहिए। कुछ मां-बाप यह बखूबी करते हैं। बच्चों को उनकी जरूरतों और उनके टेलेंट के हिसाब से अलग-अलग तरीके से गाइड करना चाहिए। सभी बच्चों पर एक जैसा फॉमरूला अपनाना भी सही नहीं है।
कैजुअल अप्रोच :
मनोचिकित्सक सीमा हिंगोरानी के मुताबिक आमतौर पर पेरेंट्स अपने पहले बच्चे के साथ ज्यादा इन्वॉल्व होने के बाद दूसरे बच्चे के समय कैजुअल हो जाते हैं।
इसके बाद तीसरे बच्चे के प्रति वे ज्यादा भावुक हो जाते हैं क्योंकि वह इस क्रम में अंतिम होता है। पहला बच्चा आत्मनिर्भर होता है। दूसरा उसी की नकल करने लगता है जबकि तीसरा अलग रवैया अख्तियार करता है।
बीच के कुछ बड़े नाम..
जरूरी नहीं कि उपेक्षित महसूस करने के बाद बीच वाला बच्च जिंदगी में कुछ नहीं कर पाता है। बचपन की यह धारणा बड़े होने पर खत्म हो जाती है। दुनिया के सबसे अमीर और माइक्रासॉफ्ट के पूर्व चेयरमैन बिल गेट्स, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन. एफ. कैनेडी और क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो और पॉप गायिका मैडोना कुछ ऐसे ही नाम है जिन्होंने बचपन में उपक्षित महसूस करने के बावजूद दुनिया में खूब नाम कमाया।
Sunday, July 13, 2008 09:00 [IST]
मुंबई.बड़ा बच्चा है तो जिम्मेदार होगा और छोटा तो सबका लाडला है। आमतौर पर पेरेंट्स की अपने बड़े और छोटे बच्चे के प्रति कुछ ऐसी ही धारणा होती है इससे बीच वाला बच्चा उपेक्षित रह जाता है या खुद को उपेक्षित महसूस करता है। उसे लगता है उसका कोई वजूद ही नहीं। बर्थ ऑर्डर के हिसाब से पेरेंट्स द्वारा बच्चों से व्यवहार करने के पीछे कई सामाजिक और मनो वैज्ञानिक पहलू हैं।
बर्थ ऑर्डर कई बार बच्चों के माइंडसेट को काफी गहरे तक प्रभावित करता है। बड़े बच्चे के पहले कदम से लेकर पहले शब्द तक मां बाप की पूरी अटेंशन रहती है, यही वजह है कि उन्हें यह सब खास लगता है। छोटा बच्चा पेरेंट्स की इस अटेंशन से बेखबर रहता है और वही करता है जो उसका दिल करता है।
मनोचिकित्सक अंजली छाबड़िया के मुताबिक बीच के क्रम वाला बच्चा कुछ अलग ही तरह से सोचता है।
काश मैं भी बड़ा होता:
ज्यादातर मां बाप के पूरी तरह से ध्यान नहीं दे पाने के चलते बीच वाला बच्चा खुद को उपेक्षित महसूस करता है। वह सोचता है काश वह बड़ा बच्चा होता। पेरेंट्स को बच्चों को लेकर बैलेंस अप्रोच रखनी चाहिए। कुछ मां-बाप यह बखूबी करते हैं। बच्चों को उनकी जरूरतों और उनके टेलेंट के हिसाब से अलग-अलग तरीके से गाइड करना चाहिए। सभी बच्चों पर एक जैसा फॉमरूला अपनाना भी सही नहीं है।
कैजुअल अप्रोच :
मनोचिकित्सक सीमा हिंगोरानी के मुताबिक आमतौर पर पेरेंट्स अपने पहले बच्चे के साथ ज्यादा इन्वॉल्व होने के बाद दूसरे बच्चे के समय कैजुअल हो जाते हैं।
इसके बाद तीसरे बच्चे के प्रति वे ज्यादा भावुक हो जाते हैं क्योंकि वह इस क्रम में अंतिम होता है। पहला बच्चा आत्मनिर्भर होता है। दूसरा उसी की नकल करने लगता है जबकि तीसरा अलग रवैया अख्तियार करता है।
बीच के कुछ बड़े नाम..
जरूरी नहीं कि उपेक्षित महसूस करने के बाद बीच वाला बच्च जिंदगी में कुछ नहीं कर पाता है। बचपन की यह धारणा बड़े होने पर खत्म हो जाती है। दुनिया के सबसे अमीर और माइक्रासॉफ्ट के पूर्व चेयरमैन बिल गेट्स, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन. एफ. कैनेडी और क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो और पॉप गायिका मैडोना कुछ ऐसे ही नाम है जिन्होंने बचपन में उपक्षित महसूस करने के बावजूद दुनिया में खूब नाम कमाया।
Posted on 9:59 PM
Saturday, June 28, 2008
बिल की ५ हिदायतें
अगर आप गड़बड़ियां करते हों तो उसके लिए अपने माता-पिता को दोष न दें। अपनी गलतियों का रोना रोने के बजाय उनसे सीखने का प्रयास करंे।>>आपके पैदा होने से पहले आपके माता-पिता इतने नीरस नहीं थे, जितने अब हैं। वे आपके जरूरी-गैर जरूरी खर्च उठाने, आपके कपड़े साफ करने और आपकी हर बात सुनने की वजह से ऐसे हो गए हैं।
>>आपकी स्कूल में हर चीज का निर्धारण भले ही पास-फेल से होता हो, लेकिन जिंदगी में हर बार ऐसा नहीं होना जरूरी नहीं है।
>> जिंदगी की स्कूल में सेमेस्टर्स नहीं होते। इसमें आपको गर्मियों की छुट्टियां नहीं मिलेंगी।
>>अनाकर्षक व्यक्तियों के प्रति भी अच्छी राय रखें। हो सकता है आपको ऐसे ही किसी व्यक्ति के लिए काम करना पड़े।
यह भी खूब !
>> बिल गेट्स 250 डॉलर प्रति सेकेंड कमाते हैं यानी रोजाना दो करोड़ डॉलर।
>> अगर उनके हाथ से एक हजार डालर का नोट गिर जाए तो उन्हें उसे उठाने की जरूरत नहीं रहेगी। उसे उठाने में उन्हें चार सेकेंड का समय लगेगा और इतने समय में वे हजार डॉलर कमा लेंगे।
>> अमेरिका पर कुल कर्ज 5.62 ट्रिलियन डॉलर है। अगर बिल गेट्स को इस कर्ज का भुगतान करने को कहा जाए तो वे 10 साल से भी कम समय में उसे चुकता कर देंगे।
>> वे संसार के प्रत्येक व्यक्ति को 15 डॉलर दान दे सकते हैं और उसके बाद भी उनके पास 50 लाख डालर बच जाएंगे।
>> अगर गेट्स के पास कुल राशि को एक डालर के नोटों में तब्दील कर दिया जाए तो उन्हें जोड़कर धरती से चंद्रमा तक 14 बार सड़क बनाई जा सकती है। लेकिन एक व्यक्ति को यह सड़क बनाने में 1400 साल लगेंगे, वह भी लगातार 24 घंटे काम करने पर।
>> अगर माइक्रोसाफ्ट विंडो के यूजर्स हर बार कम्प्यूटर हेंग होने पर हर्जाने के तौर पर एक-एक डॉलर की मांग करने लगें तो गेट्स तीन साल में दिवालिया हो जाएंगे।
Posted on 11:02 PM
Friday, June 27, 2008
पहले फ़ील्ड मार्शल सैम बहादुर नहीं रहे
भारत के पूर्व सेना प्रमुख और 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के हीरो माने जाने वाले फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का गुरुवार रात निधन हो गया. वो 94 वर्ष के थे.
कई दिनों से उनकी हालत नाज़ुक बनी हुई थी. मानेकशॉ तमिलनाडु के वेलिंग्टन सेना अस्पताल में भर्ती थे.
समाचार एजेंसियों के अनुसार गुरुवार की सुबह डॉक्टरों ने कह दिया था उनकी हालत लगातार बिगड़ रही है.
भारत के सबसे ज़्यादा चर्चित और कुशल सैनिक कमांडर माने जाने वाले 94 वर्षीय मानेकशॉ का जीवन उपलब्धियों से भरा रहा. उन्होंने भारत के लिए कई महत्वपूर्ण जंगों में निर्णायक भूमिका निभाई.
उनकी सबसे बड़ी कामयाबी मानी जाती है- 1971 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंग में जीत.
उस समय पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में करीब 93 हज़ार पाकिस्तानी सैनिकों फ़ौज ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया था.
तब से सैम बहादुर के नाम से लोकप्रिय फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ को एक राष्ट्रीय नायक के रूप में देखा जाता रहा है.
मानेकशॉ का बचपन
फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ का पूरा नाम सैम होर्मुशजी फ़्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ है. उनका जन्म तीन अप्रैल 1914 को अमृतसर में हुआ था.
उनका परिवार पारसी है. उनके पिता डॉक्टर एचएफ मानेकशॉ एक चिकित्सक थे और पंजाब में जाकर बस गए थे. सैम मानेकशॉ ने प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में ही पाई. बाद में वो नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में दाखिल हो गए.
स्कूली शिक्षा के बाद वो उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैंड जाना चाहते थे. लेकिन उनके पिता ने उन्हें बहुत छोटा जानकर विदेश नहीं भेजा.
बाद में उन्होंने अमृतसर के हिंदू सभा कॉलेज में दाख़िला लिया. उन दिनों 'ब्रिटिश इंडियन आर्मी' में भारतीयों को सीधा कमीशन मिलने लगा था और देहरादून में 'इंडियन मिलिट्री एकेडमी' की स्थापना की गई थी.
सैम ने भी एकेडमी के पहले बैच में प्रवेश के लिए आवेदन किया और सफल हो गए.
मानेकशॉ पर डॉक्यूमेंट्री
फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ पर एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'इन वार एंड पीस: द लाइफ़ ऑफ़ फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ' भी बन चुकी है.
दिल्ली की ग़ैरसरकारी संस्था 'परज़ोर' ने इस डॉक्यूमेंट्री को तैयार किया था.
भारत-पाकिस्तान की 1971 की जंग के दौरान मानेकशॉ भारतीय सेनाध्यक्ष थे
ये फ़िल्म एक दादा द्वारा अपने पोते को बताए गए किस्सों पर आधारित थी. जिसमें दादा सैम मानेकशॉ ने अपने पोते को भारत के कुछ यादगार ऐतिहासिक पलों के बारे में बताया था.
फ़िल्म की निर्देशक जेसिका गुप्ता ने वर्ष 2003 में डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म के उदघाटन समारोह के दौरान बीबीसी को बताया था, "सैम बहादुर का जो मज़ाक करने का अंदाज़ है, जो अपनापन है, उससे आपको इस बात का एहसास हो जाता है कि आप किसी हीरो के पास बैठे हुए हैं."
इस डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म में एक जगह सैम याद करते हैं कि कैसे 1971 की लड़ाई के बाद तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें तलब किया और कहा कि ऐसी चर्चा है कि सैम तख़्ता पलटने वाले हैं.
सैम ने मज़ाक करते हुए अपने जाने-माने अंदाज़ में कहा, "क्या आप ये नहीं समझतीं कि मैं आपका सही उत्तराधिकारी साबित हो सकूँगा? क्योंकि आपकी नाक लंबी है और मेरी भी नाक लंबी ही है."
और फिर सैम ने कहा, "लेकिन मैं अपनी नाक किसी के मामले में नहीं डालता और सियासत से मेरा दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है."
फिल्म में सैम को ये भी कहते हुए दिखाया गया है कि शिमला समझौते के दौरान भारत ने कश्मीर समस्या सुलझाने का सुनहरा मौक़ा ख़ो दिया.
कई दिनों से उनकी हालत नाज़ुक बनी हुई थी. मानेकशॉ तमिलनाडु के वेलिंग्टन सेना अस्पताल में भर्ती थे.
समाचार एजेंसियों के अनुसार गुरुवार की सुबह डॉक्टरों ने कह दिया था उनकी हालत लगातार बिगड़ रही है.
भारत के सबसे ज़्यादा चर्चित और कुशल सैनिक कमांडर माने जाने वाले 94 वर्षीय मानेकशॉ का जीवन उपलब्धियों से भरा रहा. उन्होंने भारत के लिए कई महत्वपूर्ण जंगों में निर्णायक भूमिका निभाई.
उनकी सबसे बड़ी कामयाबी मानी जाती है- 1971 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंग में जीत.
उस समय पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में करीब 93 हज़ार पाकिस्तानी सैनिकों फ़ौज ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया था.
तब से सैम बहादुर के नाम से लोकप्रिय फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ को एक राष्ट्रीय नायक के रूप में देखा जाता रहा है.
मानेकशॉ का बचपन
फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ का पूरा नाम सैम होर्मुशजी फ़्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ है. उनका जन्म तीन अप्रैल 1914 को अमृतसर में हुआ था.
उनका परिवार पारसी है. उनके पिता डॉक्टर एचएफ मानेकशॉ एक चिकित्सक थे और पंजाब में जाकर बस गए थे. सैम मानेकशॉ ने प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में ही पाई. बाद में वो नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में दाखिल हो गए.
स्कूली शिक्षा के बाद वो उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैंड जाना चाहते थे. लेकिन उनके पिता ने उन्हें बहुत छोटा जानकर विदेश नहीं भेजा.
बाद में उन्होंने अमृतसर के हिंदू सभा कॉलेज में दाख़िला लिया. उन दिनों 'ब्रिटिश इंडियन आर्मी' में भारतीयों को सीधा कमीशन मिलने लगा था और देहरादून में 'इंडियन मिलिट्री एकेडमी' की स्थापना की गई थी.
सैम ने भी एकेडमी के पहले बैच में प्रवेश के लिए आवेदन किया और सफल हो गए.
मानेकशॉ पर डॉक्यूमेंट्री
फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ पर एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'इन वार एंड पीस: द लाइफ़ ऑफ़ फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ' भी बन चुकी है.
दिल्ली की ग़ैरसरकारी संस्था 'परज़ोर' ने इस डॉक्यूमेंट्री को तैयार किया था.
भारत-पाकिस्तान की 1971 की जंग के दौरान मानेकशॉ भारतीय सेनाध्यक्ष थे
ये फ़िल्म एक दादा द्वारा अपने पोते को बताए गए किस्सों पर आधारित थी. जिसमें दादा सैम मानेकशॉ ने अपने पोते को भारत के कुछ यादगार ऐतिहासिक पलों के बारे में बताया था.
फ़िल्म की निर्देशक जेसिका गुप्ता ने वर्ष 2003 में डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म के उदघाटन समारोह के दौरान बीबीसी को बताया था, "सैम बहादुर का जो मज़ाक करने का अंदाज़ है, जो अपनापन है, उससे आपको इस बात का एहसास हो जाता है कि आप किसी हीरो के पास बैठे हुए हैं."
इस डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म में एक जगह सैम याद करते हैं कि कैसे 1971 की लड़ाई के बाद तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें तलब किया और कहा कि ऐसी चर्चा है कि सैम तख़्ता पलटने वाले हैं.
सैम ने मज़ाक करते हुए अपने जाने-माने अंदाज़ में कहा, "क्या आप ये नहीं समझतीं कि मैं आपका सही उत्तराधिकारी साबित हो सकूँगा? क्योंकि आपकी नाक लंबी है और मेरी भी नाक लंबी ही है."
और फिर सैम ने कहा, "लेकिन मैं अपनी नाक किसी के मामले में नहीं डालता और सियासत से मेरा दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है."
फिल्म में सैम को ये भी कहते हुए दिखाया गया है कि शिमला समझौते के दौरान भारत ने कश्मीर समस्या सुलझाने का सुनहरा मौक़ा ख़ो दिया.
Posted on 5:04 AM
Wednesday, June 18, 2008
कब जागेंगे हम?
जब पिछली बार हमने सत्ता के गलियारों को हिलाने की हिमाकत की थी तो हमें तीन साल तक दहकते अंगारों पर चलने का अभिशाप दिया गया. रक्षा सौदों में भष्टाचार की पोल खोलने वाला ऑपरेशन वेस्ट एंड मार्च 2001 में प्रसारित हुआ था. इसके फौरन बाद दो चीजें हुईं. पहला हमें लंबे समय तक लोगों की अपार सराहना और उनका प्यार मिला. दूसरा, हमारे काम और जिंदगी पर एक अनैतिक और असंवैधानिक हमला बोला गया. ये भी लंबे समय तक नहीं रूका—तब तक जब तक सरकार का सारा गोला-बारूद खत्म नहीं हो गया.
छह साल पहले उस वक्त हम पर एक के बाद एक कई आरोप लगाए गए. कुछ ने कहा कि हम कांग्रेस के लिए काम करते हैं. कइयों के लिए हम दाऊद के आदमी थे. कुछ का कहना था कि हमारे पीछे हिंदुजा का पैसा लगा है. कोई हमें आईएसआई से जोड़ रहा था जिसका मकसद हमारे जरिये शेयर बाजार को औंधे मुंह गिराना था. कहा जा रहा था कि इस काम के लिए हमें करोड़ों रुपये मिले हैं. यही नरेंद्र मोदी उस समय बीजेपी के महासचिव हुआ करते थे. मुझे वह टीवी इंटरव्यू नहीं भूलता जिसमें मोदी और मैं दोनों फोन पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे और मोदी चिल्लाचिल्लाकर हमारे खिलाफ झूठ उगल रहे थे. एक दिन बाद ही वह मेरे बारे में दस तथ्यों से भरा एक पर्चा भी छापने वाले थे.
मुझे वह टीवी इंटरव्यू नहीं भूलता जिसमें मोदी और मैं दोनों फोन पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे और मोदी चिल्लाचिल्लाकर हमारे खिलाफ झूठ उगल रहे थे. एक दिन बाद ही वह मेरे बारे में दस तथ्यों से भरा एक पर्चा छापने वाले थे.
इनमें पहला और सबसे अहम तथ्य ये था कि मैं एक कांट्रेक्टर का बेटा हूं जो कि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह के करीबी सहयोगी थे.
हमारे ख़िलाफ़ उछाला गया हर आरोप दिल्ली के संभ्रांत हलकों में न केवल चटखारे लगाकर सुना-सुनाया गया बल्कि एक कान से दूसरे कान तक जाने की प्रक्रिया में इसमें कई और स्वाद भी जोड़े गए. यहां तक कि दोस्तों और जानने वालों ने भी दबी जबान में बातें कीं. ये वे लोग थे जिन्होंने किसी को बिना फायदे के कभी कुछ करते हुए नहीं देखा था. उनके लिए ये मानना सही भी था कि हम भला उनसे क्योंकर अलग होंगे. और अब जब सरकार हमारे शिकार पर निकल ही चुकी थी तो सच का सामने आना बस कुछ वक्त का ही खेल था. इतना सब कहने के बाद मिलने पर हमारी तरफ एक जुमला उछाल दिया जाता कि आपने असाधारण काम किया...ऐसा काम जो न सिर्फ जरूरी था बल्कि बहुत साहसिक भी.
हकीकत ये है कि-
-मैं कभी भी किसी हिंदुजा से नहीं मिला था
-मैंने स्टॉक मार्केट में एक शेयर की भी खरीद-फरोख्त नहीं की थी.
-मेरा कांग्रेस से कभी भी कोई लेनादेना नहीं रहा. मैं तो राजनीति कवर करने वाला पत्रकार तक नहीं था. रिकार्ड के लिए बता दूं कि तहलका शायद भारत में अकेली ऐसी कंपनी होगी जिसके खिलाफ तीन सीबीआई केस चल रहे हैं. ये तीनों केस एनडीए सरकार के वक्त दर्ज किए गए थे और यूपीए के सत्ता में आने के बाद भी जारी हैं. हमें जमानत लेने के लिए नियमित रूप से कोर्ट के चक्कर काटने पड़ते हैं.
-हमारे पास कभी भी काले धन की एक पाई तक नहीं रही. अगर ऐसा होता तो हर घड़ी हमारे पीछे लगी रही एजेंसियां हमें कब का जेल में ठूंस देतीं. आखिर में ऐसा वक्त आया जब इस कंपनी में काम करने वाले लोग 120 से घटकर सिर्फ चार रह गए. साउथ एक्सटेंशन के पीछे एक किराए के कमरे में हमारा ऑफिस चल रहा था. कानूनी और जिंदगी के तमाम पचड़ों से लड़ने के लिए हम पर दसियों लाख रुपये उधार चढ़ चुके थे जो हम अब तक चुका रहे हैं.
गंभीर आरोप लगने पर चिल्लाचोट की रणनीति भले ही चतुर लेकिन निंदनीय राजनीतिक दांव हो लेकिन भारतीय संभ्रांत वर्ग की साजिश ढूंढने का शगल समझ से परे है. इससे केवल खुद के बारे में सोचने वाली संस्कृति की बू आती है जहां कोई जनहित कोई मकसद ही नहीं होता.
-और हां, अंडरवर्ल्ड को झटका देने वाले क्रिकेट मैच फिक्सिंग के खुलासे के बावजूद हमसे से कोई दाऊद इब्राहिम या किसी और भाई से कभी नहीं मिला था.
मेरे पिता को तो छोड़िये मैं भी उस समय तक अर्जुन सिंह से कभी नहीं मिला था. कांट्रेक्टर होने की बजाय मेरे पिता की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा भारतीय सेना में गुजरा था. इस दौरान उन्होंने 1965 और 1971 में पाकिस्तान से हुए दोनों युद्ध भी लड़े. फिर भी मोदी ने सार्वजनिक मंच पर ये और ऐसे दूसरे कई सफेद झूठ बोलने से पहले कुछ नहीं सोचा और सेंसेक्स से भी ज्यादा चकरायमान मीडिया ने इसके पीछे के सच को बाहर लाने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं समझी.
झूठ के पीछे के सच को अगर बाहर न लाया जाए तो झूठ खतरनाक आकार ले लेता है. सच्चाई का चेहरा विकृत हो जाता है और अराजकता घर करने लगती है. पुरानी कहावत है कि झूठ को अगर लगातार और कई तरीकों से फैलाया जाता है तो वह सच बन जाता है या फ़िर कम से कम सच को डुबो तो देता ही है. इसका उदाहरण तब देखने को मिला जब 1984 में सिक्खों की गर्दनें तलवारों पर रखी गईं. और हमने ऐसा होते 2002 में भी देखा जब गुजरात को दूषित भावनाओं के साथ गलत जानकारी की आड़ में आग के हवाले कर दिया गया. कुछ मौकों पर मीडिया ने सच की पड़ताल कर उसे दिखाया भी. लेकिन तब तक सच का महत्व ही खत्म हो चुका था. सच से बेनकाब होते लोगों की रणनीति इतना शोर मचाने की थी कि उसमें सब कुछ डूब जाए—अच्छा, बुरा, सच, झूठ सब कुछ. हमारी इस तहकीकात पर उनका शोर है कि आपने गोधरा के बारे में तो कुछ कहा ही नहीं. जबकि सच ये है कि इस अंक के 30 पन्ने गोधरा की तहकीकात को ही समर्पित हैं.
गंभीर आरोप लगने पर चिल्लाचोट की रणनीति भले ही चतुर लेकिन निंदनीय राजनीतिक दांव हो लेकिन भारतीय संभ्रांत वर्ग की साजिश ढूंढने का शगल समझ से परे है. इससे केवल खुद के बारे में सोचने वाली संस्कृति की बू आती है जहां कोई जनहित कोई मकसद ही नहीं होता. पिछले कुछ सालों में मुझे कई बार ये अजीब और कड़वा अनुभव हुआ है जब लोगों को मैंने मेधा पाटकर और अरुंधती रॉय जैसे जनता के लिए लड़ने वाले लोगों पर पैसे के लिए काम करने का आरोप लगाते देखा है. किसी की राय से सहमत न होना अलग बात है. लेकिन खुद ही ये मान लेना कि आम लोगों के मुद्दों को उठाने वाले लोग भष्ट्र हैं, हमारे बारे में कई गंभीर पहलुओं की पोल खोलता है. इस विकृति का कुछ लेना-देना हमारी गुलामी के समय से भी है--वह दौर जब हम ईर्ष्या, चालाकी, साजिश, चुगली या धोखा, किसी भी तरह से गोरे मालिकों को खुश करने के लिए बैचैन रहते थे.
इस बार जब हमने 2002 के गुजरात नरसंहार के पीछे छिपे सच का खुलासा किया तो साजिश ढूंढने वालों ने नई ऊंचाइयां नाप लीं. बीजेपी ने हम पर कांग्रेस के लिए काम करने का आरोप लगाते हुए हमला किया. उधर, कांग्रेस का कहना था कि हम बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं. इससे साफ था कि हम किसी सही काम को ही अंजाम दे रहे थे. इस सबके बीच भारत के विचार के लिए लड़ने का काम लालू यादव, मायावती और वामदलों पर छोड़ दिया गया. हालांकि आदर्श भारत का ये विचार कभी कांग्रेस के पुरोधाओं द्वारा रचा गया था लेकिन आज की कांग्रेस से जुड़े दिग्गज शायद इसका मतलब भी भूल चुके हैं.
अगर सीआईआई को थोड़ी भी बदहजमी हो जाए तो प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर देता है. और अगर इस बदहजमी पर वह एक सेमिनार भी करना चाहे तो प्रधानमंत्री उसमें मुख्य वक्ता के रूप में फौरन पहुंच जाते हैं.
ये भी अपने आप में असाधारण बात है कि गुजरात नरसंहार के खुलासे को कई दिन होने को आए लेकिन अब तक इस पर न तो प्रधानमंत्री ने ही कोई बयान दिया और न ही गृहमंत्री ने. पत्रकारिता के इतिहास में पहली बार सामूहिक हत्याकांड करने वाले कैमरे पर खुद बता रहे थे कि उन्होंने कैसे मारा, क्यों मारा और किसकी इजाजत से मारा. ये कोई छोटे-मोटे अपराधी नहीं थे. ये विचारधारा में अंधे वे उन्मादी लोग थे जो उस खतरनाक दरार की सच्चाई का खुलासा कर रहे थे जिसमें इस देश के टुकड़े करने की क्षमता है. लेकिन रेसकोर्स रोड में बैठे भद्रजनों के लिए ये काफी नहीं था. अगर सीआईआई को थोड़ी भी बदहजमी हो जाए तो प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर देता है. और अगर इस बदहजमी पर वह एक सेमिनार भी करना चाहे तो प्रधानमंत्री उसमें मुख्य वक्ता के रूप में फौरन पहुंच जाते हैं.
प्रधानमंत्री को भी कोसने का क्या फायदा. उनके पास जिम्मेदारी तो है पर शक्तियां नहीं. बेईमानी के पहाड़ की चोटी पर बैठा ईमानदार व्यक्ति. कांग्रेस के उन बड़े रणनीतिकारों पर नजर डालते हैं जो खुद तो कोई चुनाव नहीं जीत सकते मगर कईयों को चुनाव जितवाने के रहस्य जानते हैं. उनके हिसाब से देखा जाए तो हत्याओं और बलात्कारों में मोदी की भूमिका का पर्दाफाश इस तरह से डिजाइन किया गया था कि गुजराती हिंदू को ये यकीन हो जाए कि मोदी ही उनके लिए आदर्श नेतृत्व हैं. उन्हें यह नहीं सूझा कि हिंसा के इन सबूतों को वे मोदी के खिलाफ एक हिला देने वाली सार्थक बहस शुरू करने के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
वास्तविकता ये है कि कांग्रेस को आज कुछ ऐसे छुटभैये रणनीतिकार चला रहे हैं जो ये भूल चुके हैं कि सही कदम उठाना क्या होता है. उनके पास न तो इतिहास के अनुभवों का प्रकाश है और न ही भविष्य के लिए दृष्टि. वे यह देख पाने में असमर्थ हैं कि एक जमाने में महान विभूतियों ने धर्म, जाति, भाषा, नस्ल आदि जैसी खाइयों को पाटते हुए इस देश के विचार को शक्ल दी थी. मूर्खतापूर्ण तरीके से वे अब इन्हीं दरारों को फिर से उभार रहे हैं. वे उन संकटों को देख पाने में असमर्थ हैं जो इसके परिणामस्वरूप सामने आएंगे. उन्हें ये नहीं पता कि राजनीति में नैतिकता को हथियार कैसे बनाया जा सकता है और उनमें नैतिकता के रास्ते पर चलने की हिम्मत भी नहीं है. ये लोग और कुछ नहीं ज्यादा से ज्यादा बस चुनावों में वोटों की तिकड़म भिड़ाने वाले एकाउंटेंट हैं जो चुनावी लाभ और हानि के बीच झूला झूलते रहते हैं.
आज की कांग्रेस उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्र में निष्ठा रखने वाले उस भारतीय को निराश करती है जिसे भारत की आत्मा की रक्षा करने को एक राजनीतिक छाते की आवश्यकता है. सही बातें न कहकर, सही कदम न उठाकर ये उस उदार भारतीय को कमजोर करती है जिसकी विवादों में कोई रुचि नहीं और जो अपनी अच्छाई की स्वीकृति चाहता है. इससे पैदा हुए खाली स्थान पर जहरीली और विकृत विचारधाराएं काबिज हो जाती हैं.
और ये सब तब हो रहा है जब भारतीय कुलीन वर्ग ऐसा व्यवहार कर रहा है जैसा कि 1920 में चमक-दमक और शैंपेन की खुमारी में डूबा अमेरिकी कुलीन वर्ग किया करता था जबकि पैरों के नीचे की जमीन बड़ी तेज़ी से दरकती जा रही है. ताजा आंकड़े बताते हैं कि पांच मुख्य राज्यों में गरीबी से बदहाल लोगों की संख्या बढ़ रही है. भारत के 30 फीसदी जिलों में घनघोर दरिद्रता से उठता नक्सलवाद बढ़ता रहा है. आखिर कब तक आकंठ पैसे में डूबे हुए और भूख से मर रहे लोग बगैर टकराव के साथ-साथ रह सकते हैं. सच्चाई ये है कि भारत को सिर्फ आर्थिक सुधारों की नहीं बल्कि राजनीतिक दूरदृष्टि की भी जरूरत है जिसका कहीं अता-पता नहीं. गुजरात के प्रति हमारी बेपरवाही बताती है कि दुनिया के इस सबसे जटिल लोकतंत्र के सामने अब तक की सबसे पेचीदा चुनौती मुंह बाए खड़ी है.
तरुण तेजपाल
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छह साल पहले उस वक्त हम पर एक के बाद एक कई आरोप लगाए गए. कुछ ने कहा कि हम कांग्रेस के लिए काम करते हैं. कइयों के लिए हम दाऊद के आदमी थे. कुछ का कहना था कि हमारे पीछे हिंदुजा का पैसा लगा है. कोई हमें आईएसआई से जोड़ रहा था जिसका मकसद हमारे जरिये शेयर बाजार को औंधे मुंह गिराना था. कहा जा रहा था कि इस काम के लिए हमें करोड़ों रुपये मिले हैं. यही नरेंद्र मोदी उस समय बीजेपी के महासचिव हुआ करते थे. मुझे वह टीवी इंटरव्यू नहीं भूलता जिसमें मोदी और मैं दोनों फोन पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे और मोदी चिल्लाचिल्लाकर हमारे खिलाफ झूठ उगल रहे थे. एक दिन बाद ही वह मेरे बारे में दस तथ्यों से भरा एक पर्चा भी छापने वाले थे.
मुझे वह टीवी इंटरव्यू नहीं भूलता जिसमें मोदी और मैं दोनों फोन पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे और मोदी चिल्लाचिल्लाकर हमारे खिलाफ झूठ उगल रहे थे. एक दिन बाद ही वह मेरे बारे में दस तथ्यों से भरा एक पर्चा छापने वाले थे.
इनमें पहला और सबसे अहम तथ्य ये था कि मैं एक कांट्रेक्टर का बेटा हूं जो कि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह के करीबी सहयोगी थे.
हमारे ख़िलाफ़ उछाला गया हर आरोप दिल्ली के संभ्रांत हलकों में न केवल चटखारे लगाकर सुना-सुनाया गया बल्कि एक कान से दूसरे कान तक जाने की प्रक्रिया में इसमें कई और स्वाद भी जोड़े गए. यहां तक कि दोस्तों और जानने वालों ने भी दबी जबान में बातें कीं. ये वे लोग थे जिन्होंने किसी को बिना फायदे के कभी कुछ करते हुए नहीं देखा था. उनके लिए ये मानना सही भी था कि हम भला उनसे क्योंकर अलग होंगे. और अब जब सरकार हमारे शिकार पर निकल ही चुकी थी तो सच का सामने आना बस कुछ वक्त का ही खेल था. इतना सब कहने के बाद मिलने पर हमारी तरफ एक जुमला उछाल दिया जाता कि आपने असाधारण काम किया...ऐसा काम जो न सिर्फ जरूरी था बल्कि बहुत साहसिक भी.
हकीकत ये है कि-
-मैं कभी भी किसी हिंदुजा से नहीं मिला था
-मैंने स्टॉक मार्केट में एक शेयर की भी खरीद-फरोख्त नहीं की थी.
-मेरा कांग्रेस से कभी भी कोई लेनादेना नहीं रहा. मैं तो राजनीति कवर करने वाला पत्रकार तक नहीं था. रिकार्ड के लिए बता दूं कि तहलका शायद भारत में अकेली ऐसी कंपनी होगी जिसके खिलाफ तीन सीबीआई केस चल रहे हैं. ये तीनों केस एनडीए सरकार के वक्त दर्ज किए गए थे और यूपीए के सत्ता में आने के बाद भी जारी हैं. हमें जमानत लेने के लिए नियमित रूप से कोर्ट के चक्कर काटने पड़ते हैं.
-हमारे पास कभी भी काले धन की एक पाई तक नहीं रही. अगर ऐसा होता तो हर घड़ी हमारे पीछे लगी रही एजेंसियां हमें कब का जेल में ठूंस देतीं. आखिर में ऐसा वक्त आया जब इस कंपनी में काम करने वाले लोग 120 से घटकर सिर्फ चार रह गए. साउथ एक्सटेंशन के पीछे एक किराए के कमरे में हमारा ऑफिस चल रहा था. कानूनी और जिंदगी के तमाम पचड़ों से लड़ने के लिए हम पर दसियों लाख रुपये उधार चढ़ चुके थे जो हम अब तक चुका रहे हैं.
गंभीर आरोप लगने पर चिल्लाचोट की रणनीति भले ही चतुर लेकिन निंदनीय राजनीतिक दांव हो लेकिन भारतीय संभ्रांत वर्ग की साजिश ढूंढने का शगल समझ से परे है. इससे केवल खुद के बारे में सोचने वाली संस्कृति की बू आती है जहां कोई जनहित कोई मकसद ही नहीं होता.
-और हां, अंडरवर्ल्ड को झटका देने वाले क्रिकेट मैच फिक्सिंग के खुलासे के बावजूद हमसे से कोई दाऊद इब्राहिम या किसी और भाई से कभी नहीं मिला था.
मेरे पिता को तो छोड़िये मैं भी उस समय तक अर्जुन सिंह से कभी नहीं मिला था. कांट्रेक्टर होने की बजाय मेरे पिता की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा भारतीय सेना में गुजरा था. इस दौरान उन्होंने 1965 और 1971 में पाकिस्तान से हुए दोनों युद्ध भी लड़े. फिर भी मोदी ने सार्वजनिक मंच पर ये और ऐसे दूसरे कई सफेद झूठ बोलने से पहले कुछ नहीं सोचा और सेंसेक्स से भी ज्यादा चकरायमान मीडिया ने इसके पीछे के सच को बाहर लाने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं समझी.
झूठ के पीछे के सच को अगर बाहर न लाया जाए तो झूठ खतरनाक आकार ले लेता है. सच्चाई का चेहरा विकृत हो जाता है और अराजकता घर करने लगती है. पुरानी कहावत है कि झूठ को अगर लगातार और कई तरीकों से फैलाया जाता है तो वह सच बन जाता है या फ़िर कम से कम सच को डुबो तो देता ही है. इसका उदाहरण तब देखने को मिला जब 1984 में सिक्खों की गर्दनें तलवारों पर रखी गईं. और हमने ऐसा होते 2002 में भी देखा जब गुजरात को दूषित भावनाओं के साथ गलत जानकारी की आड़ में आग के हवाले कर दिया गया. कुछ मौकों पर मीडिया ने सच की पड़ताल कर उसे दिखाया भी. लेकिन तब तक सच का महत्व ही खत्म हो चुका था. सच से बेनकाब होते लोगों की रणनीति इतना शोर मचाने की थी कि उसमें सब कुछ डूब जाए—अच्छा, बुरा, सच, झूठ सब कुछ. हमारी इस तहकीकात पर उनका शोर है कि आपने गोधरा के बारे में तो कुछ कहा ही नहीं. जबकि सच ये है कि इस अंक के 30 पन्ने गोधरा की तहकीकात को ही समर्पित हैं.
गंभीर आरोप लगने पर चिल्लाचोट की रणनीति भले ही चतुर लेकिन निंदनीय राजनीतिक दांव हो लेकिन भारतीय संभ्रांत वर्ग की साजिश ढूंढने का शगल समझ से परे है. इससे केवल खुद के बारे में सोचने वाली संस्कृति की बू आती है जहां कोई जनहित कोई मकसद ही नहीं होता. पिछले कुछ सालों में मुझे कई बार ये अजीब और कड़वा अनुभव हुआ है जब लोगों को मैंने मेधा पाटकर और अरुंधती रॉय जैसे जनता के लिए लड़ने वाले लोगों पर पैसे के लिए काम करने का आरोप लगाते देखा है. किसी की राय से सहमत न होना अलग बात है. लेकिन खुद ही ये मान लेना कि आम लोगों के मुद्दों को उठाने वाले लोग भष्ट्र हैं, हमारे बारे में कई गंभीर पहलुओं की पोल खोलता है. इस विकृति का कुछ लेना-देना हमारी गुलामी के समय से भी है--वह दौर जब हम ईर्ष्या, चालाकी, साजिश, चुगली या धोखा, किसी भी तरह से गोरे मालिकों को खुश करने के लिए बैचैन रहते थे.
इस बार जब हमने 2002 के गुजरात नरसंहार के पीछे छिपे सच का खुलासा किया तो साजिश ढूंढने वालों ने नई ऊंचाइयां नाप लीं. बीजेपी ने हम पर कांग्रेस के लिए काम करने का आरोप लगाते हुए हमला किया. उधर, कांग्रेस का कहना था कि हम बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं. इससे साफ था कि हम किसी सही काम को ही अंजाम दे रहे थे. इस सबके बीच भारत के विचार के लिए लड़ने का काम लालू यादव, मायावती और वामदलों पर छोड़ दिया गया. हालांकि आदर्श भारत का ये विचार कभी कांग्रेस के पुरोधाओं द्वारा रचा गया था लेकिन आज की कांग्रेस से जुड़े दिग्गज शायद इसका मतलब भी भूल चुके हैं.
अगर सीआईआई को थोड़ी भी बदहजमी हो जाए तो प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर देता है. और अगर इस बदहजमी पर वह एक सेमिनार भी करना चाहे तो प्रधानमंत्री उसमें मुख्य वक्ता के रूप में फौरन पहुंच जाते हैं.
ये भी अपने आप में असाधारण बात है कि गुजरात नरसंहार के खुलासे को कई दिन होने को आए लेकिन अब तक इस पर न तो प्रधानमंत्री ने ही कोई बयान दिया और न ही गृहमंत्री ने. पत्रकारिता के इतिहास में पहली बार सामूहिक हत्याकांड करने वाले कैमरे पर खुद बता रहे थे कि उन्होंने कैसे मारा, क्यों मारा और किसकी इजाजत से मारा. ये कोई छोटे-मोटे अपराधी नहीं थे. ये विचारधारा में अंधे वे उन्मादी लोग थे जो उस खतरनाक दरार की सच्चाई का खुलासा कर रहे थे जिसमें इस देश के टुकड़े करने की क्षमता है. लेकिन रेसकोर्स रोड में बैठे भद्रजनों के लिए ये काफी नहीं था. अगर सीआईआई को थोड़ी भी बदहजमी हो जाए तो प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर देता है. और अगर इस बदहजमी पर वह एक सेमिनार भी करना चाहे तो प्रधानमंत्री उसमें मुख्य वक्ता के रूप में फौरन पहुंच जाते हैं.
प्रधानमंत्री को भी कोसने का क्या फायदा. उनके पास जिम्मेदारी तो है पर शक्तियां नहीं. बेईमानी के पहाड़ की चोटी पर बैठा ईमानदार व्यक्ति. कांग्रेस के उन बड़े रणनीतिकारों पर नजर डालते हैं जो खुद तो कोई चुनाव नहीं जीत सकते मगर कईयों को चुनाव जितवाने के रहस्य जानते हैं. उनके हिसाब से देखा जाए तो हत्याओं और बलात्कारों में मोदी की भूमिका का पर्दाफाश इस तरह से डिजाइन किया गया था कि गुजराती हिंदू को ये यकीन हो जाए कि मोदी ही उनके लिए आदर्श नेतृत्व हैं. उन्हें यह नहीं सूझा कि हिंसा के इन सबूतों को वे मोदी के खिलाफ एक हिला देने वाली सार्थक बहस शुरू करने के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
वास्तविकता ये है कि कांग्रेस को आज कुछ ऐसे छुटभैये रणनीतिकार चला रहे हैं जो ये भूल चुके हैं कि सही कदम उठाना क्या होता है. उनके पास न तो इतिहास के अनुभवों का प्रकाश है और न ही भविष्य के लिए दृष्टि. वे यह देख पाने में असमर्थ हैं कि एक जमाने में महान विभूतियों ने धर्म, जाति, भाषा, नस्ल आदि जैसी खाइयों को पाटते हुए इस देश के विचार को शक्ल दी थी. मूर्खतापूर्ण तरीके से वे अब इन्हीं दरारों को फिर से उभार रहे हैं. वे उन संकटों को देख पाने में असमर्थ हैं जो इसके परिणामस्वरूप सामने आएंगे. उन्हें ये नहीं पता कि राजनीति में नैतिकता को हथियार कैसे बनाया जा सकता है और उनमें नैतिकता के रास्ते पर चलने की हिम्मत भी नहीं है. ये लोग और कुछ नहीं ज्यादा से ज्यादा बस चुनावों में वोटों की तिकड़म भिड़ाने वाले एकाउंटेंट हैं जो चुनावी लाभ और हानि के बीच झूला झूलते रहते हैं.
आज की कांग्रेस उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्र में निष्ठा रखने वाले उस भारतीय को निराश करती है जिसे भारत की आत्मा की रक्षा करने को एक राजनीतिक छाते की आवश्यकता है. सही बातें न कहकर, सही कदम न उठाकर ये उस उदार भारतीय को कमजोर करती है जिसकी विवादों में कोई रुचि नहीं और जो अपनी अच्छाई की स्वीकृति चाहता है. इससे पैदा हुए खाली स्थान पर जहरीली और विकृत विचारधाराएं काबिज हो जाती हैं.
और ये सब तब हो रहा है जब भारतीय कुलीन वर्ग ऐसा व्यवहार कर रहा है जैसा कि 1920 में चमक-दमक और शैंपेन की खुमारी में डूबा अमेरिकी कुलीन वर्ग किया करता था जबकि पैरों के नीचे की जमीन बड़ी तेज़ी से दरकती जा रही है. ताजा आंकड़े बताते हैं कि पांच मुख्य राज्यों में गरीबी से बदहाल लोगों की संख्या बढ़ रही है. भारत के 30 फीसदी जिलों में घनघोर दरिद्रता से उठता नक्सलवाद बढ़ता रहा है. आखिर कब तक आकंठ पैसे में डूबे हुए और भूख से मर रहे लोग बगैर टकराव के साथ-साथ रह सकते हैं. सच्चाई ये है कि भारत को सिर्फ आर्थिक सुधारों की नहीं बल्कि राजनीतिक दूरदृष्टि की भी जरूरत है जिसका कहीं अता-पता नहीं. गुजरात के प्रति हमारी बेपरवाही बताती है कि दुनिया के इस सबसे जटिल लोकतंत्र के सामने अब तक की सबसे पेचीदा चुनौती मुंह बाए खड़ी है.
तरुण तेजपाल
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Posted on 12:58 AM
'स्पेलिंग चैम्पियनशिप' में भारतीय दबदबा
Marwar News!
भारतीय मूल के कृष्ण मिश्र और अल्का मिश्र पिछले सात वर्षो से अपने बच्चों को अमरीका में होने वाली वर्तनी प्रतियोगिता- 'नेशनल स्पेलिंग बी' में भाग लेने के लिए इंडियाना से वाशिंगटन डीसी ले जाते रहे हैं.
वे दिल्ली से 15 वर्ष पहले अमरीका आए थे. इस बार उनके पुत्र 13 वर्षीय समीर ने इस प्रतियोगिता में पहला स्थान जीतकर उनका सपना पूरा कर दिया है. .
समीर को 40 हज़ार डॉलर यानी क़रीब 16 लाख रुपए से भी ज़्यादा की राशि पुरस्कार में मिली है.
सबसे पहले उनकी बड़ी पुत्री श्रुति ने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था.
अमरीका में यह प्रतियोगिता काफ़ी लोकप्रिय है. इसके लिए बच्चे महीनों तैयारी करते हैं. प्रतियोगिता के राष्ट्रीय स्तर के फ़ाइनल में पहुँचने से पहले उन्हें स्थानीय और प्रांतीय स्तर पर जीत हासिल करनी पड़ती है.
समीर ने 'guerdon' शब्द की सही स्पेलिंग बता कर यह प्रतियोगिता जीती है. इस बहुत कम प्रचलित शब्द का मतलब पुरस्कार होता है.
लाल कालीन पर चलना आपको एक सेलिब्रिटी होने का एहसास देता है. मेरी पत्नी चाहती थी कि समीर भी सेलिब्रिटी की तरह लाल कालीन पर ले चले
कृष्ण मिश्र, समीर के पिता
इस वर्ष दक्षिण एशिया के बच्चे इस प्रतियोगिता में छाए रहे. दूसरे स्थान पर इस प्रतियोगिता में मिशीगन के 12 वर्ष के सिद्धार्थ चांद रहे जबकि कैनसस की काव्या शिवशंकर को चौथा और पेन्सिलवेनिया की जाह्नवी अय्यर को आठवाँ स्थान मिला.
लगन और इच्छाशक्ति
समीर को परिवार का पूरा सहयोग मिला
न्यूयॉर्क में रहने वाले आठ वर्षीय श्रीराम हथवार ने इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाले सबसे कम उम्र का प्रत्याशी बनकर सबको चौंका दिया.
स्पेलिंग प्रतियोगिता में भारतीय परिवार के बच्चों के वर्चस्व की असली वजह उनका पारिवारिक माहौल है.
वर्ष 1985 में 'स्पेलिंग बी' प्रतियोगिता में जीतने वाले और इस वर्ष के निर्णायकों में से एक, डॉक्टर बालू नटराजन का कहना है कि जो बात सभी जीतने वाले प्रतियोगियों में दिखती है वह है उनका इस प्रतियोगिता के प्रति लगन और परिवार का सहयोग.
वे कहते हैं, "यह ऐसी प्रतियोगिता नहीं है जिसे बच्चे सिर्फ़ अपनी प्रतिभा के बूते जीत लें. मुझे लगता है कि दक्षिण एशियाई परिवारों की इच्छा और सहयोग काफ़ी मायने रखता है."
कृष्ण मिश्र कहते हैं कि 'स्पेलिंग बी' प्रतियोगिता उनके बच्चों के लिए एक अच्छा शैक्षणिक अनुभव रहा है और इससे बेहतरीन अंग्रेजी सीखने में भी मदद मिलती है.
वे हँसते हुए कहते हैं, "लाल कालीन पर चलना आपको एक सेलिब्रिटी होने का एहसास देता है. मेरी पत्नी चाहती थी कि समीर भी सेलिब्रिटी की तरह लाल कालीन पर ले चले."
समीर कहते हैं कि उन्होंने इस प्रतियोगिता के लिए काफ़ी मेहनत किया था. वे कहते हैं, "मैंने सीखा कि कैसे लगातार मेहनत किया जाए और उसे बरकरार रखा जाए."
वर्तनी प्रतियोगिता में दक्षिण एशिया मूल के लोगों की सफलता को देख कर न्यू जर्सी के राहुल वालिया 'दक्षिण एशिया स्पेलिंग बी' प्रतियोगिता का आयोजन कर रहे हैं.
वे कहते हैं इन प्रतियोगिताओं से बच्चों के अंदर विश्वास बढ़ेगा और उनकी प्रतिभा निखरेगी.
भारतीय मूल के कृष्ण मिश्र और अल्का मिश्र पिछले सात वर्षो से अपने बच्चों को अमरीका में होने वाली वर्तनी प्रतियोगिता- 'नेशनल स्पेलिंग बी' में भाग लेने के लिए इंडियाना से वाशिंगटन डीसी ले जाते रहे हैं.
वे दिल्ली से 15 वर्ष पहले अमरीका आए थे. इस बार उनके पुत्र 13 वर्षीय समीर ने इस प्रतियोगिता में पहला स्थान जीतकर उनका सपना पूरा कर दिया है. .
समीर को 40 हज़ार डॉलर यानी क़रीब 16 लाख रुपए से भी ज़्यादा की राशि पुरस्कार में मिली है.
सबसे पहले उनकी बड़ी पुत्री श्रुति ने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था.
अमरीका में यह प्रतियोगिता काफ़ी लोकप्रिय है. इसके लिए बच्चे महीनों तैयारी करते हैं. प्रतियोगिता के राष्ट्रीय स्तर के फ़ाइनल में पहुँचने से पहले उन्हें स्थानीय और प्रांतीय स्तर पर जीत हासिल करनी पड़ती है.
समीर ने 'guerdon' शब्द की सही स्पेलिंग बता कर यह प्रतियोगिता जीती है. इस बहुत कम प्रचलित शब्द का मतलब पुरस्कार होता है.
लाल कालीन पर चलना आपको एक सेलिब्रिटी होने का एहसास देता है. मेरी पत्नी चाहती थी कि समीर भी सेलिब्रिटी की तरह लाल कालीन पर ले चले
कृष्ण मिश्र, समीर के पिता
इस वर्ष दक्षिण एशिया के बच्चे इस प्रतियोगिता में छाए रहे. दूसरे स्थान पर इस प्रतियोगिता में मिशीगन के 12 वर्ष के सिद्धार्थ चांद रहे जबकि कैनसस की काव्या शिवशंकर को चौथा और पेन्सिलवेनिया की जाह्नवी अय्यर को आठवाँ स्थान मिला.
लगन और इच्छाशक्ति
समीर को परिवार का पूरा सहयोग मिला
न्यूयॉर्क में रहने वाले आठ वर्षीय श्रीराम हथवार ने इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाले सबसे कम उम्र का प्रत्याशी बनकर सबको चौंका दिया.
स्पेलिंग प्रतियोगिता में भारतीय परिवार के बच्चों के वर्चस्व की असली वजह उनका पारिवारिक माहौल है.
वर्ष 1985 में 'स्पेलिंग बी' प्रतियोगिता में जीतने वाले और इस वर्ष के निर्णायकों में से एक, डॉक्टर बालू नटराजन का कहना है कि जो बात सभी जीतने वाले प्रतियोगियों में दिखती है वह है उनका इस प्रतियोगिता के प्रति लगन और परिवार का सहयोग.
वे कहते हैं, "यह ऐसी प्रतियोगिता नहीं है जिसे बच्चे सिर्फ़ अपनी प्रतिभा के बूते जीत लें. मुझे लगता है कि दक्षिण एशियाई परिवारों की इच्छा और सहयोग काफ़ी मायने रखता है."
कृष्ण मिश्र कहते हैं कि 'स्पेलिंग बी' प्रतियोगिता उनके बच्चों के लिए एक अच्छा शैक्षणिक अनुभव रहा है और इससे बेहतरीन अंग्रेजी सीखने में भी मदद मिलती है.
वे हँसते हुए कहते हैं, "लाल कालीन पर चलना आपको एक सेलिब्रिटी होने का एहसास देता है. मेरी पत्नी चाहती थी कि समीर भी सेलिब्रिटी की तरह लाल कालीन पर ले चले."
समीर कहते हैं कि उन्होंने इस प्रतियोगिता के लिए काफ़ी मेहनत किया था. वे कहते हैं, "मैंने सीखा कि कैसे लगातार मेहनत किया जाए और उसे बरकरार रखा जाए."
वर्तनी प्रतियोगिता में दक्षिण एशिया मूल के लोगों की सफलता को देख कर न्यू जर्सी के राहुल वालिया 'दक्षिण एशिया स्पेलिंग बी' प्रतियोगिता का आयोजन कर रहे हैं.
वे कहते हैं इन प्रतियोगिताओं से बच्चों के अंदर विश्वास बढ़ेगा और उनकी प्रतिभा निखरेगी.
Posted on 12:11 AM
Tuesday, June 17, 2008
मारे गए पत्रकारों की स्मृति में स्मारक
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने लंदन में एक स्मारक का अनावरण किया. यह उन पत्रकारों की याद में तैयार किया गया है जो रिपोर्टिंग करते मारे गए.
'ब्रीदिंग' नाम का यह स्मारक बीबीसी के मुख्यालय ब्रॉडकास्टिंग हाउस की छत पर स्थापित किया गया है.
यह एक रोशनी का एक स्तंभ है जिसकी ऊँचाई 32 फ़ुट है. इसका प्रकाश रात को आकाश में एक किलोमीटर तक चमकेगा.
हर रात आधा घंटे यह उस समय रौशन होगी जब बीबीसी का प्रमुख समाचार बुलैटिन प्रसारित होता है. यानी रात दस बजे.
यह स्मारक उन सभी पत्रकारों और उनके साथ काम करने वाले लोगों को समर्पित है, जो अपना काम करते हुए मारे गए, इनमें ड्राइवर हैं और अनुवादक भी.
पिछले दस सालों में औसतन हर हफ़्ते दो ऐसे पत्रकार मारे गए हैं जो युद्ध की रिपोर्टिंग करते हैं, कई अन्य पत्रकार भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग करते हुए मारे गए हैं.
श्रद्धांजलि
संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने उन पत्रकारों को श्रद्धांजलि अर्पित की है जो रिपोर्टिंग करते हुए मारे गए.
बीबीसी के पत्रकार अब्दुल रोहानी और नासेह दाहिर फ़राह की मौत हाल ही में हुई है
बान की मून ने कहा, "यह स्मारक उन लोगों की याद में खड़ा किया गया है जिन्होने अपनी जान गवाँ दी जिससे हम तक ख़बर पहुंच सके. लेकिन यह उन पत्रकारों के लिए भी है जो इस समय ख़तरों का सामना कर रहे हैं और रिपोर्टें भेजने के लिए अपनी जान को जोख़िम में डाल रहे हैं."
इस स्मारक के अनावरण के अवसर पर बीबीसी के महानिदेशक मार्क टॉमसन ने कहा कि समाचार जुटाने का काम दिन पर दिन ख़तरनाक होता जा रहा है. पिछले दस सालों में औसतन हर सप्ताह दो पत्रकार मारे जाते रहे हैं और 90 प्रतिशत मामलों में किसी पर मुक़दमा नहीं चला है.
अनावरण समारोह में उन पत्रकारों के परिजन भी आए थे जो या तो मारे गए या जिनकी हत्या हुई.
इनमें बीबीसी की प्रोड्यूसर केट पेटन के परिवार वाले थे जो 2005 में सोमालिया में मारी गई थीं और कैमरामैन साइमन कम्बर्स के सगे संबंधी भी जो सउदी अरब में मारे गए थे.
इस अवसर पर बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार जॉन सिम्पसन जो वर्ष 2003 में स्वयं एक अमरीकी मिसाइल हमले में मरते-मरते बचे थे उन्होंने जेम्स फ़ैंटन की एक कविता पढ़कर सुनाई.
पूर्व युद्ध रिपोर्टर और कवि जेम्स फ़ैंटन ने यह कविता विशेष तौर पर बीबीसी के लिए लिखी है.
'ब्रीदिंग' नाम का यह स्मारक बीबीसी के मुख्यालय ब्रॉडकास्टिंग हाउस की छत पर स्थापित किया गया है.
यह एक रोशनी का एक स्तंभ है जिसकी ऊँचाई 32 फ़ुट है. इसका प्रकाश रात को आकाश में एक किलोमीटर तक चमकेगा.
हर रात आधा घंटे यह उस समय रौशन होगी जब बीबीसी का प्रमुख समाचार बुलैटिन प्रसारित होता है. यानी रात दस बजे.
यह स्मारक उन सभी पत्रकारों और उनके साथ काम करने वाले लोगों को समर्पित है, जो अपना काम करते हुए मारे गए, इनमें ड्राइवर हैं और अनुवादक भी.
पिछले दस सालों में औसतन हर हफ़्ते दो ऐसे पत्रकार मारे गए हैं जो युद्ध की रिपोर्टिंग करते हैं, कई अन्य पत्रकार भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग करते हुए मारे गए हैं.
श्रद्धांजलि
संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने उन पत्रकारों को श्रद्धांजलि अर्पित की है जो रिपोर्टिंग करते हुए मारे गए.
बीबीसी के पत्रकार अब्दुल रोहानी और नासेह दाहिर फ़राह की मौत हाल ही में हुई है
बान की मून ने कहा, "यह स्मारक उन लोगों की याद में खड़ा किया गया है जिन्होने अपनी जान गवाँ दी जिससे हम तक ख़बर पहुंच सके. लेकिन यह उन पत्रकारों के लिए भी है जो इस समय ख़तरों का सामना कर रहे हैं और रिपोर्टें भेजने के लिए अपनी जान को जोख़िम में डाल रहे हैं."
इस स्मारक के अनावरण के अवसर पर बीबीसी के महानिदेशक मार्क टॉमसन ने कहा कि समाचार जुटाने का काम दिन पर दिन ख़तरनाक होता जा रहा है. पिछले दस सालों में औसतन हर सप्ताह दो पत्रकार मारे जाते रहे हैं और 90 प्रतिशत मामलों में किसी पर मुक़दमा नहीं चला है.
अनावरण समारोह में उन पत्रकारों के परिजन भी आए थे जो या तो मारे गए या जिनकी हत्या हुई.
इनमें बीबीसी की प्रोड्यूसर केट पेटन के परिवार वाले थे जो 2005 में सोमालिया में मारी गई थीं और कैमरामैन साइमन कम्बर्स के सगे संबंधी भी जो सउदी अरब में मारे गए थे.
इस अवसर पर बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार जॉन सिम्पसन जो वर्ष 2003 में स्वयं एक अमरीकी मिसाइल हमले में मरते-मरते बचे थे उन्होंने जेम्स फ़ैंटन की एक कविता पढ़कर सुनाई.
पूर्व युद्ध रिपोर्टर और कवि जेम्स फ़ैंटन ने यह कविता विशेष तौर पर बीबीसी के लिए लिखी है.
Posted on 1:55 AM
Monday, June 9, 2008
ये ब्लॉग सिर्फ बेटियों के लिए है
Tuesday, April 01, 2008 05:38 [IST]
नई दिल्ली तकनीकी क्रांति के युग में नेट यूजर्स की संख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है। ब्लॉगिंग कल्चर इन दिनों सर्वाधिक लोकप्रिय है। अब एक ऐसा ब्लॉग आया है जो सिर्फ लड़कियों के लिए ही है। ‘बेटियों का ब्लॉग’ एक ऐसा ही ब्लॉग है, जिसमें माता-पिता अपनी बेटियों के बारे में बातें लिखते हैं।
यह एक सामुदायिक ब्लॉग है। जिसमें एक ही छत के नीचे कई ब्लॉगर माता-पिता इकट्ठा होकर अपनी बेटियों के बारे में बातें लिखते हैं। फिलहाल इस ब्लॉग के ग्यारह सदस्य हैं। इस ब्लॉग को शुरू करने वाले अविनाश दास ने अपने पहले पोस्ट में लिखा, ‘‘ये ब्लॉग बेटियों के लिए है। हम सब, जो सिर्फ बेटियों के बाप होना चाहते थे, ये ब्लॉग उनकी तरफ से बेटियों की शरारतें, बातें साझा करने के लिए है।’’
उन्होंने अपने इस पोस्ट का टाइटल रखा- ‘आइए बेटियों के बारे में बात करें।’ इस ब्लॉग पर लिखने वाले सभी ब्लॉगर अपनी बेटियों के बारे में सामान्य, लेकिन रोचक रिपोर्ट प्रकाशित कर रहे हैं। इसमें शामिल एक ब्लॉगर जितेन्द्र चौधरी का कहना है कि इसमें बेटियों के रोचक क्रियाकलापों को भी शामिल किया जाएगा। वहीं रविश कुमार ने ‘बाबा तुम बांग्ला बोलो तो’ में काफी रोचक अंदाज में बताते हैं कि चार साल की बेटी ‘तिन्नी’ उन्हें किस प्रकार बंगाली भाषा का ज्ञान दे रही हैं।
एक ब्लॉगर पुनीता ने ‘क्या बेटियां पराई होती हंै’ के शीर्षक से अपनी बात कहने की कोशिश की है। शादी के बाद पिता के साथ एक भेंट को उन्होंने काफी अलग अंदाज में बयां किया है।
नई दिल्ली तकनीकी क्रांति के युग में नेट यूजर्स की संख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है। ब्लॉगिंग कल्चर इन दिनों सर्वाधिक लोकप्रिय है। अब एक ऐसा ब्लॉग आया है जो सिर्फ लड़कियों के लिए ही है। ‘बेटियों का ब्लॉग’ एक ऐसा ही ब्लॉग है, जिसमें माता-पिता अपनी बेटियों के बारे में बातें लिखते हैं।
यह एक सामुदायिक ब्लॉग है। जिसमें एक ही छत के नीचे कई ब्लॉगर माता-पिता इकट्ठा होकर अपनी बेटियों के बारे में बातें लिखते हैं। फिलहाल इस ब्लॉग के ग्यारह सदस्य हैं। इस ब्लॉग को शुरू करने वाले अविनाश दास ने अपने पहले पोस्ट में लिखा, ‘‘ये ब्लॉग बेटियों के लिए है। हम सब, जो सिर्फ बेटियों के बाप होना चाहते थे, ये ब्लॉग उनकी तरफ से बेटियों की शरारतें, बातें साझा करने के लिए है।’’
उन्होंने अपने इस पोस्ट का टाइटल रखा- ‘आइए बेटियों के बारे में बात करें।’ इस ब्लॉग पर लिखने वाले सभी ब्लॉगर अपनी बेटियों के बारे में सामान्य, लेकिन रोचक रिपोर्ट प्रकाशित कर रहे हैं। इसमें शामिल एक ब्लॉगर जितेन्द्र चौधरी का कहना है कि इसमें बेटियों के रोचक क्रियाकलापों को भी शामिल किया जाएगा। वहीं रविश कुमार ने ‘बाबा तुम बांग्ला बोलो तो’ में काफी रोचक अंदाज में बताते हैं कि चार साल की बेटी ‘तिन्नी’ उन्हें किस प्रकार बंगाली भाषा का ज्ञान दे रही हैं।
एक ब्लॉगर पुनीता ने ‘क्या बेटियां पराई होती हंै’ के शीर्षक से अपनी बात कहने की कोशिश की है। शादी के बाद पिता के साथ एक भेंट को उन्होंने काफी अलग अंदाज में बयां किया है।
Posted on 9:26 AM
ओबामा के लकी हनुमान
Monday, June 09, 2008 15:30 [IST]
न्यूयॉर्क. बात है तो अजीब लेकिन सच है! अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए संभावित डेमोक्रेटिक उम्मीदवार बैरेक ओबामा व्हाइट हाउस की जंग जीतने के लिए हिंदू भगवान हनुमान का आशीर्वाद ले रहे हैं।
डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से उम्मीदवारी हासिल करने के लिए 17 महीने की जद्दोजहद के बाद हिलेरी क्लिंटन को मात देने वाले ओबामा खुशकिस्मती के लिए अपने साथ छोटे से हनुमान को साथ लेकर चलते हैं।
टाइम्स के व्हाइट हाउस फोटो ऑफ द डे में प्रकाशित एक फोटो में पहली बार अश्वेत अमेरिकी प्रत्याशी का हुनमान प्रेम सामने आया है। ओबामा के पास एक ब्रेसलेट है जिसमें इराक में तैनात एक अमेरिकी सैनिक की यादें हैं, एक जुआरी की लकी चिट, एक छोटा सा वानर भगवान और छोटी सी मैडोना व एक बच्चे की आकृति है।
इस ब्रेसलेट में जो छोटे से वानर भगवान की आकृति है, वह बेशक हिंदू भगवान हनुमान की तरह ही है। प्रकाशित फोटो के साथ भी यह बात लिखी गई है लेकिन फोटोग्राफर ने इसकी पहचान का जिक्र नहीं किया है। केन्याई पिता और कैंसासी माता की संतान ओबामा ने अपना शुरुआती जीवन इंडोनेशिया में बिताया था जहां हिंदू धर्म काफी प्रचारित है।
लकी फैक्टर :इस फोटो के कैप्शन में यह भी लिखा गया है कि रिपब्लिक पार्टी के उम्मीदवार जॉन मैक्केन भी भाग्य में विश्वास करते हुए अपने लकी फैक्टर के रूप में अपनी कलाई पर एक रबर बैंड और एक निकेल बांधते हैं। एक स्वेटर और हैंपशायर में एक होटल रूम को भी वे लकी करार देते हैं।
दूसरी तरफ, हिलेरी क्लिंटन अपने लकी फैक्टर के रूप में अवाम द्वारा दिए गए तोहफों को तरजीह देती हैं। उनके प्रवक्ता के मुताबिक उन्हें टैक्सास में एक महिला ने एक लकी सिक्का व एक रूमाल दिया जिसे वे अक्सर अपनी जेब में रखे रहती हैं। इसी तरह ओहियो में एक महिला द्वारा दिए गए ब्रेसलेट को भी वे हमेशा पहने रहती हैं।
न्यूयॉर्क. बात है तो अजीब लेकिन सच है! अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए संभावित डेमोक्रेटिक उम्मीदवार बैरेक ओबामा व्हाइट हाउस की जंग जीतने के लिए हिंदू भगवान हनुमान का आशीर्वाद ले रहे हैं।
डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से उम्मीदवारी हासिल करने के लिए 17 महीने की जद्दोजहद के बाद हिलेरी क्लिंटन को मात देने वाले ओबामा खुशकिस्मती के लिए अपने साथ छोटे से हनुमान को साथ लेकर चलते हैं।
टाइम्स के व्हाइट हाउस फोटो ऑफ द डे में प्रकाशित एक फोटो में पहली बार अश्वेत अमेरिकी प्रत्याशी का हुनमान प्रेम सामने आया है। ओबामा के पास एक ब्रेसलेट है जिसमें इराक में तैनात एक अमेरिकी सैनिक की यादें हैं, एक जुआरी की लकी चिट, एक छोटा सा वानर भगवान और छोटी सी मैडोना व एक बच्चे की आकृति है।
इस ब्रेसलेट में जो छोटे से वानर भगवान की आकृति है, वह बेशक हिंदू भगवान हनुमान की तरह ही है। प्रकाशित फोटो के साथ भी यह बात लिखी गई है लेकिन फोटोग्राफर ने इसकी पहचान का जिक्र नहीं किया है। केन्याई पिता और कैंसासी माता की संतान ओबामा ने अपना शुरुआती जीवन इंडोनेशिया में बिताया था जहां हिंदू धर्म काफी प्रचारित है।
लकी फैक्टर :इस फोटो के कैप्शन में यह भी लिखा गया है कि रिपब्लिक पार्टी के उम्मीदवार जॉन मैक्केन भी भाग्य में विश्वास करते हुए अपने लकी फैक्टर के रूप में अपनी कलाई पर एक रबर बैंड और एक निकेल बांधते हैं। एक स्वेटर और हैंपशायर में एक होटल रूम को भी वे लकी करार देते हैं।
दूसरी तरफ, हिलेरी क्लिंटन अपने लकी फैक्टर के रूप में अवाम द्वारा दिए गए तोहफों को तरजीह देती हैं। उनके प्रवक्ता के मुताबिक उन्हें टैक्सास में एक महिला ने एक लकी सिक्का व एक रूमाल दिया जिसे वे अक्सर अपनी जेब में रखे रहती हैं। इसी तरह ओहियो में एक महिला द्वारा दिए गए ब्रेसलेट को भी वे हमेशा पहने रहती हैं।
Posted on 9:10 AM
Sunday, June 8, 2008
अपहृत बीबीसी संवाददाता की हत्या
अफ़ग़ानिस्तान में बीबीसी के एक युवा संवाददाता की दक्षिणी हेलमंद प्रांत में गोली मारकर हत्या कर दी गई है.अब्दुल समद रोहानी का शनिवार को अपहरण कर लिया गया था और रविवार को लश्कर गाह नाम के स्थान पर उनकी लाश पाई गई है.
बीबीसी ने रोहानी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा, "रोहानी की हिम्मत और लगन अफ़ग़ानिस्तान में बीबीसी की रिपोर्टिंग का अहम हिस्सा रही है."
रोहानी बीबीसी के काबुल स्थित ब्यूरो ऑफ़िस के लिए काम करते थे और बीबीसी की पश्तो सेवा के हेलमंद संवाददाता थे.
हेलमंद प्रांत में पिछले कुछ समय से तालेबान के छापामार लगातार हमले कर रहे हैं.
बीबीसी की ओर से जारी बयान में कहा गया है, "रोहानी और उनके साथियों की साहसिक रिपोर्टिंग की ही बदौलत बीबीसी अफ़ग़ानिस्तान का सच दुनिया के सामने ला पाती है."
इस बयान में कहा गया है, "उनकी मौत से हमें एक भारी सदमा लगा है और इस दुखद घड़ी में हमारी संवेदना उनके परिवार के साथ है."
इस वर्ष अफ़ग़ानिस्तान में पत्रकारों पर कई हमले हुए हैं, पिछले वर्ष भी अफ़ग़ानिस्तान में पाँच पत्रकार मारे गए थे.
यह सप्ताहांत बीबीसी के लिए ख़ासा बुरा रहा, इससे पहले सोमालिया में किसमायो में पत्रकार नश्ते दहीर की हत्या कर दी गई, दहीर बीबीसी और समाचार एजेंसी एपी के लिए रिपोर्टिंग किया करते थे.
Posted on 8:05 PM
‘हनुमान’ है इंजीनियरिंग कालेज के अध्यक्ष
06 जून 2008 आईबीएन-7 लखनऊ (उत्तर प्रदेश)। लखनऊ के एक तकनीकि संस्थान में एक मजेदार वाक्या सामने आया है। लखनऊ के ‘सरदार भगत सिंह टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट’ के चेयरमैन के पद पर बजरंगबली को बिठाया गया है और यह फैसला इसके ट्रस्टियों ने लिया है।दरअसल, ट्रस्टियों के बीच चेयरमैन के पद को लेकर आपस में किसी तरह का समझौता नहीं हो पा रहा था। इसीलिए यहां के ट्रस्टियों ने अपने आराध्य देव हनुमान को ही इस महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी सौंप दी। अब इस कालेज की पूरी जिम्मेदारी हनुमान जी की देख-रेख में हो रही है।मजे की बात तो यह है कि इस कालेज में चेयरमैन का एक बड़ा कमरा है। कमरे के बाहर हनुमान जी के नाम का बोर्ड लगा हुआ है और चेयरमैन की कुर्सी पर हनुमान जी की प्रतिमा को बिठा दिया गया है। ट्रस्टियों ने चेयरमैन की सहायता के लिए एक वाइस-चेयरमैन (उपाध्यक्ष) भी नियुक्त किया है।उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी है कि वो सुबह कालेज के चेयरमैन हनुमान जी के कमरे में जाकर उनका दर्शन करें और उसके बाद अपने काम की शुरुआत करें। ‘सरदार भगत सिंह टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट’ के ट्रस्टी पंकज सिंह भदौरिया का कहना है कि, “हनुमान जी में हमारी अटूट श्रद्धा रही है, हम जो भी काम करते हैं उसकी शुरुआत हनुमान जी से ही करते हैं। इसलिए हम लोगों ने हनुमान जी को ही ये जिम्मेदारी सौंप दी।”ट्रस्टियों का यह तर्क भी है कि “हनुमान जी हर तरह का ज्ञान रखते हैं। इसलिए उनके लिए ये जिम्मेदारी तो बहुत ही छोटी है। लंकापति रावण के साथ हुए युद्ध में भगवान राम ने युद्ध के प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी हनुमान जी को ही दी थी। इसलिए हम लोगों ने उन्हें ये जिम्मेदारी सौंपी है।”वहीं, कालेज से जुड़े लोगों का मानना है कि जब से हनुमान जी ने इस कालेज के चेयरमैन पद की जिम्मेदारी संभाली है, कालेज में काफी सुधार देखने को मिल रहा है।
Posted on 12:27 AM
कम्प्यूटर से चलती पान की दुकान
7 जून 2008इंडो-एशियन न्यूज सर्विसइंदौर। अभी तक आपने हजारों पान की दुकानें देखी होंगी मगर आज हम एक ऐसी पान की दुकान के बारे में आपको बताने जा रहे है जो औरों से अलग है। इसकी खासियत यह है कि यहां आपको सिर्फ एक बार अपना मीनू बताना पड़ता है क्योंकि यह पान की दुकान अत्याधुनिक है। दोबारा आने पर आपको मीनू नहीं अपना नाम बताना होता है और आपकी पसंद का पान हाजिर हो जाता है।इंदौर के बड़ा गणपति चौराहे पर स्थित ‘अप्सरा पान शॉप’ औरों से अलग है। इस दुकान में अन्य पान की दुकानों की तरह चमक-दमक तो है ही साथ ही ग्राहकों का ब्यौरा दर्ज करने के लिए कम्प्यूटर भी लगा है।यहां जो भी पान के शौकीन आते हैं उन्हें सिर्फ एक बार ही आपना मसाला बताना पड़ता है। दुकान के संचालक राम कृष्ण वर्मा बताते हैं उनके यहां जो ग्राहक आता है उसका मसाला कम्प्यूटर में दर्ज कर दिया जाता है साथ ही उसे एक ‘ग्राहक नम्बर’ भी दिया जाता है।पढ़ें
: ताज को वोट दें और मुफ्त में पान खाएं अगली दफा जब वही ग्राहक पुन: दुकान पर पहुंचता है तो उसे सिर्फ अपना नाम और ‘ग्राहक नम्बर’ बताना होता है और कुछ ही देर में उसकी पसंद का पान हाजिर हो जाता है। इससे राम कृष्ण को तो लाभ हो ही रहा है साथ में ग्राहकों का भी समय बच जाता है।राम कृष्ण बताते कि उनके नियमित ग्राहक अपने घर अथवा दफ्तर से निकलने से पहले ही फोन करके अपना ग्राहक नम्बर बता देते हैं और उन्हें आते ही पान तैयार मिल जाता है। इतना ही नहीं घर और दफ्तर तक उन्होंने पान भेजने की भी व्यवस्था कर रखी है। इसके लिए उनकी दुकान पर 40 कर्मचारियों को रखा गया है।राम कृष्ण की दुकान का पान खाने वाले देश और विदेश में भी है। उन तक भी पान पहुंचाने का इंतजाम उनके पास है। राम कृष्ण के कम्प्यूटर में 4,000 से अधिक ग्राहकों के रिकॉर्ड दर्ज हैं, जिसकी पसंद कम्प्यूटर बता देता है।वे जल्दी ही ऑनलाइन सुविधा शुरू करने वाले हैं।
Posted on 12:00 AM
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