Wednesday, July 28, 2010

गौहत्या की तो होगी दस साल की सजा

अमृतसर. गौ प्रेमियों के लिए खुशखबरी है। अब गौ माता का उत्पीड़न करने वालों के खिलाफ सख्त कानून बनने जा रहा है। इसके तहत गौहत्या में लिप्त लोगों को दस साल की सजा हो सकती है। इस तरफ पहल की है सरकार की तरफ से हालिया गठित पंजाब गऊ सेवा बोर्ड ने राज्य में गायों की दशा सुधारने तथा उनको उचित सम्मान देने का भी संकल्प लिया है। पिछले दिनों रमदास इलाके में एक किसान द्वारा रावी दरिया में बछड़े को कथित रूप से डूबो कर मारने की घटना का कड़ा नोटिस लेते हुए बोर्ड पदाधिकारियों ने सर्किट हाउस में बैठक के दौरान समूचे समाज का आह्वान किया है कि वह गौ सेवा, संरक्षण व संवर्धन में आगे आएं।

तीन करोड़ से बनेगी लैब : 

भगत ने बताया कि राज्य में इस वक्त 212 गौशालाएं हैं,जहां पर सवा दो लाख गाएं आश्रय पा रही हैं। इसके विपरीत आज भी राज्य के विभिन्न इलाकों में 70 हजार गाएं सड़कों पर घूम रही हैं। 
उन्होंने बताया कि आमतौर पर देखा गया है कि गाय पालने वाले 25 फीसदी लोग दूध निकालने के बाद गायों को आवारा सड़कों पर खुला छोड़ देते हैं और वह इधर-उधर भटकते हुए सड़क हादसों का भी कारण बनती हैं। उनका कहना है कि इसे रोकने के लिए विभिन्न जिलों में नगर निगम तथा नगर कौंसिल से मिल कर टीम गठित की गई है और उनको उचित स्थान पर पहुंचाया जा रहा है। 

उनका कहना है कि गौहत्या मेंं लिप्त लोग यहां पर लैब न होने के कारण सजा से बच निकलते हैं। इस लिए अब राज्य सरकार जल्द ही तीन करोड़ रुपए की लागत से अपनी लैब बनाएगी। हत्या के समान होगा गऊ को मारना पत्रकारों से बातचीत में बोर्ड के चेयरमैन कीमती लाल भगत ने कहा कि बछड़े को मारने वाले उक्त किसान के खिलाफ परचा दर्ज किया गया था, जिसे अब हत्या में तबदील कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने विशेष रुचि लेते हुए गौ संरक्षण को पहल दी है। उनका कहना है कि पंजाब में भी अब उत्तराखंड सरकार की तर्ज पर गौहत्या में लिप्त लोगों के लिए 10 साल की सजा की कोशिश होगी। इसके लिए लोगों को लामबंद किया जाने लगा है।

Sunday, May 30, 2010

खेल प्रतिभाओं में आएगा निखार

रानीवाड़ा

क्षेत्र की खेल प्रतिभाओं के लिए कस्बे के राउमावि खेल मैदान में जालोर व भीनमाल की तर्ज पर स्टेडियम निर्माण किया जाएगा, जिससे क्षेत्र की खेल प्रतिभाओं का विकास हो सकेगा।

यह कार्य विधायक रतन देवासी की अनुशंसा पर नरेगा योजना के तहत किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार खेल मैदान के प्रस्ताव को नरेगा योजना के तहत स्वीकृति मिली है। मैदान के चारों तरफ फुट ट्रैक भी बनाई जा रहा है। स्टेडियम निर्माण का शुभारंभ 1 जून को विधायक देवासी के आतिथ्य में होगा। खेल मैदान का सर्वप्रथम समतलीकरण कर सड़क से एक फीट ऊंचाई तक रेती डालकर रोलर से आधार को मजबूत बनाया जाएगा। मैदान के चारों तरफ ट्रैक का निर्माण किया जाएगा। स्कूल भवन की ओर पेवेलियन बनाया जाएगा, जहां दर्शक बैठ सकेंगे। खेल मैदान के चारों ओर घास भी लगाई जाएगी। वर्तमान

चार दीवारी को ऊंची उठाकर सुंदर रूप दिया जाएगा। राजकीय अस्पताल के सामने स्टेडियम का गेट बनाया जाएगा।

आकर्षक होगा स्वरूप

नरेगा योजना के तहत २२.७१ लाख रुपए इस कार्य के लिए स्वीकृत किए गए हैं, जिसके तहत ट्रैक, समतलीकरण, मिट्टी की भराई व दीवार का कार्य करवाया जाएगा। विधायक मद से अतिरिक्त राशि का आवंटन कर पैवेलियन निर्माण व सौंदर्यकरण का कार्य किया जाएगा। इस कार्य में केंद्रीय खेल प्राधिकरण यानि पायका योजना की राशि को भी सही कार्य में

लगाया जाएगा।

नरेगा योजना के तहत इस स्टेडियम को सुंदर व सुविधायुक्त बनाया जाएगा, क्षेत्र में अभी तक एक भी स्टेडियम नहीं होने के कारण खेलप्रेमियों को इसकी कमी खल रही है। राशि कम पडऩे पर विधायक मद से पक्के निर्माण को लेकर धन की कमी नहीं आने दी जाएगी।

-रतनदेवासी, विधायक रानीवाड़ा।

नरेगा योजना के तहत जिले में पहली बार ऐसा कार्य विधायक देवासी के प्रयासों से स्वीकृत हो पाया है। निर्माण कार्य में पीडब्ल्यूडी इस कार्य को अतिशीघ्र पूरा करने करने का प्रयास करेगा।

अमृतलाल वर्मा, सहायक अभियंता पीडब्ल्यूडी, रानीवाड़ा।

Sunday, December 6, 2009

खूबसूरती बढ़ाए अदरक


सर्दियों के मौसम में अदरक की चाय मिले, तो कहना ही क्या। लेकिन चाय समेत हमारे भोजन को जायकेदार बनाने वाला अदरक खूबसूरती को बढ़ाने में भी मददगार साबित होता है। अदरक को आप फल-सब्जी या फिर दवा भी मान सकते हैं। अदरक के चिकित्सीय गुणों की जानकारी पुरातन चिकित्सा पद्धति में भी आसानी से देखी जा सकती है। आइए डालते हैं खूबसूरती और सेहत के लिए फायदेमंद अदरक के गुणों पर एक नजर।
त्वचा को निखारे-
अदरक त्वचा को आकर्षक व चमकदार बनाने में मदद करता है। सुबह खाली पेट एक गिलास गुनगुने पानी के साथ अदरक का एक टुकड़ा खाएं। इससे न केवल आपकी त्वचा में निखार आएगा बल्कि आप लंबे समय तक जवां दिखेंगे।
बीमारियों में रामबाण-
दवा के रूप में अदरक का प्रयोग गठिया, आर्थराइटिस, साइटिका और गर्दन-रीढ़ की हड्डियों के रोग [सर्वाइकल स्पांडिलाइटिस] में प्रमुखता से किया जाता है। इसके अलावा भूख न लगना, पेचिश, खांसी-जुकाम, शरीर में दर्द के साथ बुखार, कब्ज, कान में दर्द, उल्टी होना, मोच और मासिक धर्म की अनियमितता दूर करने में अदरक का प्रयोग किया जाता है।
कैंसर प्रतिरोधी-
अदरक में कोलेस्ट्राल का स्तर कम करने, रक्त का थक्का जमने से रोकने, एंटी-फंगल और कैंसर प्रतिरोधी गुण भी पाए जाते हैं।
मार्निग सिकनेस से निजात-
अदरक गर्भवती महिलाओं को होने वाली मार्निग सिकनेस [चक्कर आना, उल्टियां होना आदि] निजात दिलाता है।
दर्द मिटाए चुटकी में-
अदरक दर्द भगाने की सबसे कारगर दवा है। 'फूड्स दैट फाइट पेन' पुस्तक के लेखक आर्थर नील बर्नार्ड के मुताबिक अदरक में दर्द मिटाने के प्राकृतिक गुण पाए जाते हैं। यह बिना किसी दुष्प्रभाव के दर्दनिवारक दवा की तरह काम करता है।
इसलिए भी खास है अदरक
-पाचन की समस्या होने पर रोजाना सुबह अदरक का एक टुकड़ा खाएं। ऐसा करने से आपको बदहजमी नहीं होगी। इसके अलावा सीने की जलन दूर करने में भी अदरक मददगार साबित होता है।
-अदरक में किसी भी चीज को संरक्षित करने के गुण प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं। नाइजीरिया में हुए एक
शोध के मुताबिक अदरक का सत्व सल्मोनेला नामक जीवाणुओं को खत्म करने में काफी असरकारक है।
-शरीर में वसा का स्तर कम करने में भी अदरक काफी मददगार है।
-यदि आपको खांसी के साथ कफ की भी शिकायत है तो रात को सोते समय दूध में अदरक डालकर उबालकर पिएं। यह प्रक्रिया करीब 15 दिनों तक अपनाएं। इससे सीने में जमा कफ आसानी से बाहर निकल आएगा।

Tuesday, November 10, 2009

चेतक" को लगे पंख

अहमदाबाद । "चेतक" को पंख लग गए। अब वह डाक के जरिए देश भर में उड़ सकता है।यहां चेतक से मतलब है भारतीय नस्ल के लुप्तप्राय घोड़े। चेतक महाराणा प्रताप का जांबाज घोड़ा था और काठियावाडी था। भारतीय डाक विभाग ने सोमवार को काठियावाडी-मारवाड़ी समेत घोड़ों की चार लुप्तप्राय नस्लों पर डाक टिकट जारी किया। यहां आयोजित एक समारोह में केन्द्रीय डाक सचिव राधिका दोराईस्वामी ने यह डाक टिकट जारी किया। इस डाक टिकट पर काठियावाडी, मारवाड़ी, जंसकारी और मणिपुरी घोड़े हैं, जो भारत में लुप्तप्राय होते जा रहे हैं। अहमदाबाद में कार्यरत डाक विभाग के अधिकारी संदीप ब्र±मभट्ट के विशेष प्रयासों से भारतीय नस्ल के घोड़ों पर डाक टिकट जारी हुआ है। लोकार्पण समारोह में गुजरात डाक परिमंडल की मुख्य पोस्ट मास्टर जनरल करूणा पिल्लै समेत डाक विभाग और उससे जुड़े फिलाटेलिक विभाग के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। समारोह को सम्बोधित करते हुए राधिका दोराईस्वामी ने जहां संदीप ब्र±मभट्ट के प्रयासों की सराहना की, वहीं इस बात पर खुशी जाहिर की कि डाक विभाग ऎसे घोड़ों पर डाक टिकट जारी कर रहा है, जिनको बचाने की आज महती आवश्यकता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि डाक टिकट जारी होने से लोगों में इन घोड़ों के संरक्षण के प्रति जागरूकता आएगी। इससे पहले संदीप ब्र±मभट्ट ने कहा कि डाक विभाग जब कोई डाक टिकट जारी करता है, तो वह फौरी तौर पर नहीं, बल्कि गहन मंथन के बाद होता है। ऎसे में जिस किसी पर भी डाक टिकट जारी होता है, उसकी महत्ता को स्वयं समझा जा सकता है। वे इसके लिए पिछले पांच वर्षो से प्रयास कर रहे थे और आज जाकर उनके प्रयास साकार हुए हैं, तो इससे भारतीय नस्ल के घोड़ों की महत्ता अपने आप स्पष्ट है। उन्होंने कहा कि यह और भी गर्व की बात है कि जिन चार नस्लों के घोड़ों पर टिकट जारी हो रहा है, उनमें काठियावाडी भी शामिल है

Friday, October 9, 2009

ब्लॉगर के दस साल पूरे

इंटरनेट की दुनिया में ब्लोगर आज अपना एक दशक का सफर तय कर चुका है। आज दुनिया भर में इस के 30 करोड़ से ज्यादा नियमित यूजर है। इन दस वर्षो में इस पर लिखे गए शब्दों की गणना करें तो पाएंगे कि अब तक ब्लॉगर इतने शब्द इक्ट्ठे कर चुका है। जिनसे करीब 32 करोड़ किताबें लिखी जा सकती है।

ब्लॉगर का सफर 1999 में शुरू हुआ। इसे पहली साइट माना जा सकता है जिसके जरिए कम्प्यूटर पर सोशियल नेटवर्किग की शुरूआत हुई। इसके शुरूआती सफर में एक बड़ा बदलाव 2001 में अमरीका पर हुए आतंकी हमले के बाद आया। जिसे ब्लोगिंग की दुनिया में नींव के पत्थर कहा जा सकता है। इतने बड़े हमले के बाद लोगों के दुख, रोष और भड़ास को निकालने के लिए मीडिया ने उन्हें ब्लॉगस पर अपने अनुभव लिखने को प्रेरित किया। तब से ब्लोग्स का यह सफर बदस्तूर जारी है।

आज मनोरंजन, समाचार और सूचना के क्षेत्र में यह एक अहम जरूरत बन चुका है। महिलाएं भी ब्लोगिंग की दीवानी है और एक अनुमान के मुताबिक हर महीने करीब 1.5 करोड़ महिलाए इसका उपयोग करती है।

Sunday, October 4, 2009

ऊँटनी का दूध कितना लाभदायक?

यूरोप में ऊँट के आयात पर प्रतिबंध है! हॉलैंड में विशेषज्ञ यह शोध कर रहे हैं कि ऐतिहासिक तौर पर लाभदायक समझ जाने वाला ऊँटनी के दूध में क्या रोग से लड़ने की क्षमता है? मिस्र के सेनाई प्रायद्वीप के बद्दू प्राचीन ज़माने से यह विश्वास करते हैं कि ऊँटनी का दूध शरीर के अंदर की लगभग हर बीमारी का इलाज है. उनका विश्वास है कि इस दूध में शरीर में मौजूद बैकटीरिया को ख़त्म करने की क्षमता है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संस्थान की एक रिपोर्ट के अनुसार रूस और क़ज़ाकिस्तान में आम तौर पर डॉकटर कई प्रकार के रोगियों के लिए ऊँटनी के दूध की सलाह देते हैं.
भारत में ऊँटनी का दूध पीलिया, टीबी, दमा, ख़ून की कमी और बवासीर जैसी ख़तरनाक बीमारियों के इलाज के लिए प्रयुक्त रहा है. और उन क्षेत्रों में जहां ऊँटनी का दूध रोज़ाना के खान-पान में शामिल है वहां लोगों में मधुमेह की औसत बहुत कम पाई गई है. हॉलैंड में 26 वर्षीय फ़्रैंक स्मिथ पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने नियमित रूप से ऊँटों की व्यावसायिक फ़ार्मिंग का काम शुरू किया. उनके पिता मुर्सिल शिरा संबंधी रोग के माहिर डॉक्टर हैं. उन्होंने स्वास्थ विभाग से जुड़े अपने साथियों को इस शोध में लगाया है जिससे वह ये जान सकें कि उनके बेटे के ज़रिए तैयार की गई चीज़ें कितनी लाभदायक हैं. सिर्फ़ तीन ही साल में उनके काम ने विभिन्न क्षेत्रों में इतनी रूचि पैदा कर दी कि स्वास्थ विभाग की ओर से उनके लिए बाक़ायदा फंडिंग शुरू कर दी गई.
डॉक्टर स्मिथ का कहना है कि इस दूध में इतने फ़ायदे हैं कि यह यूरोप के स्वास्थवर्धक खाने का हिस्सा बन सकता है. "और हम यही करने की कोशिश कर रहे हैं." उन्होंने अपने शोध के बारे में बताया कि अस्पताल में मधुमेह के रोगियों को दो ग्रुप में विभाजित कर के उन्हें गाय और ऊँटनी का दूध नियमित रूप से पिलाया गया और फिर उनके शुगर लेवल की जाँच की गई जिससे ऊँटनी के दूध के लाभ और उपयोगिता सामने आई. उन्होंने ये भी बताया कि इसके बारे में विस्तृत शोध हो रहे हैं. मुश्किलें उन्होंने अपनी व्यावसायिक फ़ार्मिंग की शुरूआत तीन ऊँटों से की थी और अब उनके पास 40 ऊँट हैं. उनका कहना है कि यूरोप में ऊँटों को पालना एक मुश्किल काम था क्योंकि अरब देशों के विपरीत यूरोपीय संघ ऊँटों को गाय और बकरी वग़ैरह की तरह का पैदावारी पशु नहीं मानती है. इसलिए उन्होंने सरकार से विशेष अनुमति लेनी पड़ी. यूरोप में ऊँटों के आयात पर भी पाबंदी है और फिर ऊँटों के दूध दूहने की भी समस्या थी. फ़्रैंक स्मिथ का दावा है कि उन्होंने ऊँटों का दूध निकालने वाली दुनिया की पहली मशीन का अविष्कार किया है. शुरू में उन्हें यह सब कुछ बेचने के लिए ग्राहक तलाश करने में भी समस्या का सामना करना पड़ा. शुरू में उन्होंने अपनी चीज़ें मस्जिदों के बाहर बांटनी शूरू कीं जहां मराकश और सोमालिया के कई मुसलमान अपने देश में इससे बने आहार के आदी थे. धीरे धीरे ऊँट के दूध से बने उनके उत्पादनों की मांग बढ़ने लगी. स्मिथ को आशा है कि यूरोप में ऊँटनी के दूध से बने खाद्य पदार्थों की मांग में बढ़ौतरी होगी.। ।

Monday, September 28, 2009

फ़र्ज़ी कौमार्य को लेकर उठा बवाल

मिस्र के एक जाने-माने इस्लामी विद्वान ने माँग की है कि जो महिलाएँ एक उपकरण सहारे कौमार्य का ढोंग करती हैं उन्हें मृत्युदंड दिया जाना चाहिए. मिस्र के अख़बारों में ख़बर छपी है कि अरब देशों के बाज़ार में चीन में बना उपकरण उपलब्ध है जिसकी मदद से महिलाएँ अपने पति को ऐसा आभास दे सकती हैं कि उन्होंने पहले कभी यौन संबंध नहीं बनाए. इस उपकरण से लाल रंग का एक तरल निकलता है जो पहली बार संभोग के समय होने वाले रक्तस्राव का आभास देता है. यह उपकरण महँगी सर्जरी का बेहतर और सस्ता विकल्प है. अरब जगत में कौमार्य या वर्जिनिटी को लेकर लोगों के विचार काफ़ी रुढ़िवादी हैं और ऐसे ऑपरेशन चोरी-छिपे होते हैं. प्रोफ़ेसर अब्दुलमती बायुमी का कहना है कि जिन लोगों ने इस उपकरण का आयात किया है वे मिस्र के समाज को भ्रष्ट बना रहे हैं, यह एक बड़ा अपराध है इसलिए इसकी सज़ा मौत होनी चाहिए. उनका कहना है कि इस्लाम में व्यभिचार बहुत बड़ा गुनाह है और समाज को इसे बर्दाश्त नहीं करना चाहिए. मिस्र की संसद में भी इस उपकरण के उपकरण के आयात पर रोक लगाने की माँग की गई है. ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि कई अरब देशों में ये उपकरण पंद्रह डॉलर में बिक रहे

हिटलर की नहीं, महिला की खोपड़ी है

वांशिंगटन। जर्मनी के तानाशाह शासक एडोल्फ हिटलर की मौत का रहस्य एक बार फिर गहरा गया है। हाल ही में अमरीकी पुरातत्वविद् द्वारा किए गए खुलासे में कहा गया है कि सोवियत खुफिया एजेंसियों और सेना को मिली खोपड़ी जिसे हिटलर की माना जा रहा था दरअसल वह किसी महिला की है। हिटलर के डीएनए के विश्लेषण के बाद यह बात सामने आई है।
कनेक्टिकट विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद् और निक बेलन्टोनी ने डीएनए विश्लेषण के बाद बताया कि गोली लगी खोपड़ी को खोजा गया था वह किसी महिला की है जिसकी आयु 20 से 40 वर्ष के बीच आंकी गई है। इस खुलासे के बाद हिटलर की मौत की वजह पर फिर पर्दा पड़ गया है। संभावनाएं जताई जा रही है कि उसकी मौत बंकर में ना हुई हो। अब अमरीकी शोधकर्ताओं ने उसकी हड्डी की जांच में पाया है कि यह हड्डी काफी पतली है जबकि आमतौर पर पुरूषों की हडि्डयां सरचनात्मक रूप से मोटी होती है।
अब तक वैज्ञानिक और इतिहासकार यह मानते आए है कि बदनामी से बचने के लिए 30 अप्रेल 1945 करे हिटलर ने इवा ब्रॉन के साथ साइनाइड लेने के बाद खुद को गोली मार ली थी। हालांकि कुछ इतिहास कारों का यह भी कहना है कि खुद को हीरो बताने के लिए उसने यह कदम उठाया।
निक बेलन्टोनी ने एक अमरीकी हिस्ट्री चैनल पर बताया कि मृत व्यक्ति की उम्र चालीस से कम रही होगी जबकि मृत्यु के समय हिटलर 56 वर्ष का था। मौत के वक्त इवा और हिटलर जिस सोफे पर बैठे थे उस पर लगे रक्त के नमूने लेने के लिए निक मास्को गए। अमरीकी हिस्ट्री चैनल पर किए गए इस शोध के खुलासे में निक ने बताया कि उन्हें केवल एक घंटे के लिए हिटलर की ट्रोफियों आदि के साथ रहने दिया गया इस दौरान उन्होंने डीएनए के नमूने लिए और विश्लेषण के बाद पाया कि बंकर की खुदाई में पाई गई खोपड़ी हिटलर की नहीं बल्कि किसी महिला की है।

बिना काम लिए पैसा देती हैं कंपनियां

दुबई। आप मानें या ना लेकिन कुवैत में निजी कंपनियां कॉलेज से निकलने वाले युवाओं को नौकरी देती हैं, वेतन देती हैं पर इसके बदले काम बिल्कुल नहीं लेती।
कुवैत टाइम्स के अनुसार निजी कंपनियां कुवैत के सरकारी नियम के अनुसार अपनी कंपनी में 30 प्रतिशत नौकरियों को स्थानीय युवाओं को देने के लिए बाध्य हैं, चाहे इन कंपनियों को उनकी जरूरत नहीं हो। ऎसा नहीं करने पर इन कंपनियों को काफी ज्यादा अर्थदंड भुगतना पड़ता है। इसलिए ये कंपनियां इन युवाओं को नौकरी देती हैं और बैठे-बिठाए इन्हें वेतन भी देती हैं।
कुवैत में ये नौकरियां "भूतहा नौकरियां" कहलाती हैं और बिना अनुभव वाली इन भूतहा नौकरियों से युवाओं में काफी ज्यादा कुंठा फैल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऎसा करने से युवाओं की क्षमता पर असर पड़ रहा है, और धीरे-धीरे इससे देश की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा। उनकी चिंता है कि ऎसा करने से देश हमेशा बाहरी श्रमिकों पर ही निर्भर रहेगा।

Monday, June 1, 2009

दाढ़ी और बाल कटवाए तो नहीं मिलेगा आरक्षण

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने शनिवार को कहा कि केश सिख की मुख्य पहचान है। जो सिख अपने केश और दाढ़ी कटवाता है, वह अल्पसंख्यक संस्थान में प्रवेश के लिए किसी लाभ का हकदार नहीं है। अदालत ने इस मामले को लेकर दायर की गई याचिका को खारिज कर दिया। छात्रा गुरलीन कौर ने एक याचिका के माध्यम से 1925 के सिख गुरुद्वारा कानून में दर्ज सिख की परिभाषा की संवैधानिकता को चुनौती दी थी। क्योंकि उसे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) की निगरानी में संचालित अमृतसर स्थित श्रीगुरु रामदास इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल एजूकेशन एंड रिसर्च में एमबीबीएस कोर्स में सिखों के लिए आरक्षित सीटों में प्रवेश नहीं दिया गया था। तर्क दिया गया था कि वह अपनी भौहें बनवाती है और बाल काटवाती है। इसलिए वह सिख की परिभाषा में न आने के कारण अयोग्य है। इस मामले में हाईकोर्ट के तीन जजों की फुल बेंच ने एसजीपीसी, दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और सिख धर्म से जुड़े विद्वानों के विचार सुने थे। एसजीपीसी ने इस मामले में सहजधारी सिख की परिभाषा के संबंध में अदालत में एक अतिरिक्त संशोधित शपथ पत्र दायर किया था। इसमें बताया गया था कि जो सिख रीति के अनुसार धर्मानुष्ठान करता हो, केश रखता हो, भाव पतित न हो, तंबाकू , कत्था, हलाल मीट नहीं खाता हो और सिख धर्म के मूल मंत्र का पालन करता हो वह सहजधारी सिख है। लेकिन अगर दाढ़ी कटवाता या शेव करता है तो पतित सिख है। सिख गुरुद्वारा एक्ट 1925 के अनुसार बाल सिख की मुख्य पहचान है।

Sunday, May 24, 2009

धूम्रपान न करें, न करने दें


स्मोकिंग इज नॉट एलाउड" या "यहां घूम्रपान करना मना है" अक्सर सार्वजनिक स्थलों पर ऎसे स्लोगन देखने को मिल जाते हैं फिर चाहे वो हवाई जहाज हो या बस या टे्रन या ऑफिस, रेस्टोरेंट या और कोई सार्वजनिक स्थल। हाल ही में वॉशिंगटन में रहने वाले आईटी कन्सल्टेंट 32 वर्षीय विकास गोयल अपने अपार्टमेंट मैनेजर से मिले एक पत्र को पाकर हैरत मे पड़ गए। उन्हें मिले इस लेटर में लिखा था कि या तो वे इस 1 जनवरी से अपने घर मे सिगरेट पीना बंद कर दें या कहीं और रहने का इंतजाम कर लें। विकास कहते हैं- वैसे ही रेस्टोरेंट, कार्यस्थल, सार्वजनिक स्थल, क्लबों और बारों में स्मोकिंग करने पर रोक है, और अब नौबत यहां तक आ गई है कि आप अपने खुद के घर में भी घूम्रपान नहीं कर सकते। यानी अब आने वाले दिनों में एक छोटा सा कोना ढूंढ पाना मुश्किल होगा जहां आराम से बैठकर सिगरेट के कश लगाए जा सकें।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार तम्बाकू का इस्तेमाल करने वाले लोगों को दिल की बीमारी, अलग-अलग प्रकार के कैंसर और इम्फेसिमा जैसी बीमारियों के साथ ही इनके ही समान अन्य कई बीमारियां होने का खतरा बना रहता है। संयुक्त राष्ट्र के 19 राज्यों और करीब 2300 शहरों, जिनमें न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स, शिकागो और वॉशिंगटन शामिल हैं, ने सिगरेट पीने वालों के खिलाफ कानून जारी कर दिए हैं। भारत मे भी सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट पीना कानूनन अपराघ की श्रेणी में आता है।

तम्बाकू से बने पदार्थो पर कर बढ़ाने और तमाम रोक के बावजूद इसका सेवन करने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। हाल ही में स्वास्थ्य मंत्री श्री अम्बूमणि रामदास द्वारा संसद में दिए गए वक्तव्य के अनुसार भारत में लगभग 25 करोड़ लोग सिगरेट या तंबाकू के सेवन में लिप्त हैं। यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा उपलब्घ कराए गए आंकड़ों को देखें तो इनमें से 50 प्रतिशत यानी लगभग साढे़ बारह करोड़ लोग तम्बाकू के सेवन से होने वाली बीमारी के कारण समय से पहले मौत के मुंह में समा जाएंगे। एस्कार्ट हार्ट इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर के कार्डियोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ. आर.आर. कासलीवाल कहते हैं "तीस से चालीस साल की उम्र के लोगों में होने वाले हार्ट अटैक के पीछे सिगरेट पीना सबसे बड़ा कारण है।

सबसे बड़ी बात यह है कि मरीज बीमारी के पूरी तरह विकसित होने के बाद या फिर जब उसे स्मोकिंग छोड़ने की सलाह दी जाती है, उसके बाद ही हमारे पास आता है।" विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में होने वाली मौतों की पीछे तम्बाकू का सेवन दूसरा सबसे बड़ा कारण है। विश्व में प्रतिवर्ष होने वाली मौतों में 10 में से एक वयस्क मौत इसके कारण होती है। इंडियन मेडिकल काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार भारत मे प्रतिवर्ष होेने वाली 10 लाख मौतों के लिए तम्बाकू का सेवन जिम्मेदार है। यानी प्रतिदिन लगभग 3000 मौतें।"कई बार लोग चाहते हुए भी तम्बाकू के सेवन की यह लत छुड़ा पाने में सफल नहीं हो पाते ऎसे में काउंसिलिंग, निकोटिन रिप्लेसमेंट थैरेपी और दवाइयों के माघ्यम से स्मोकिंग छोड़ने वाले लोगों की मदद की जाती है। अपोलो हॉस्पिटल के रिस्पायरेटरी मेडिसीन विभाग के सीनियर कंस्लटेट डॉ. राजेश चावला कहते हैं यदि स्मोक करने वाले स्वयं इससे छुटकारा पाने की मानसिकता बना लें तो इससे दूर होना आसान हो जाएगा।

फैक्ट फाइल

*तम्बाकू ही वैघानिक रूप से उपलब्घ एक ऎसा कंज्यूमर प्रोडेक्ट है जो इंसानों की मौत का सीघे जिम्मेदार है।
*तम्बाकू का उपयोग मृत्यु के लिए जिम्मेदार दूसरा सबसे बड़ा कारण है।
*यदि स्मोकिंग करने वाले इसी तादाद में बढ़ते रहे तो सन् 2020 तक प्रतिवर्ष मरने वालों की संख्या 1 करोड़ होगी।
*भारत में तम्बाकू के सेवन से प्रतिवर्ष करीब 10 लाख लोग मौत को गले लगाते हंैं।
*घूम्रपान करने वाले इसके रूप में करीब 4000 केमिकल कम्पाउंड निगलते हैं, जो कि गैस या छोटे-छोटे कणों के रूप में होते हैं।
*कैंसर से होने वाली मौतों में 30 प्रतिशत के लिए तम्बाकू का सेवन जिम्मेदार है।

कितने कदम चलते हैं

स्वस्थ रहने के लिए रोजाना कम से कम दस हजार कदम चलने की मान्यता है। लेकिन, समस्या ये है कि इसे गिनें कैसे। शायद इसीलिए पीडोमीटर नाम के उपकरण की खोज हुई। ये उपकरण मापता है कि आप कब-कितना चले हैं। शुरूमें इसका इस्तेमाल खिलाड़ी किया करते थे। लेकिन, बाद में आम लोगों ने भी इसका प्रयोग शुरू कर दिया। ये एक छोटा सा उपकरण होता है, जिसे कमरबंद या पतलून में लगा लिया जाता है और दिनभर पहना जाता है। आम तौर पर लोग एक दिन में करीब तीन से चार हजार कदम चलते हैं।

Tuesday, May 5, 2009

कूड़े में मिली टीपू सुल्तान की पोशाक!

नई दिल्ली । इतिहास की एक अनमोल धरोहर कूड़े में पड़ी पाई गई है। यह धरोहर टीपू सुल्तान से संबंधित है। अब इसकी अहमियत पता चली है तो इसे आम जनता के लिए प्रदर्शित किए जाने की तैयारी चल रही है। अनुमान है कि इसकी नीलामी हुई तो 30 करोड़ रुपये से कम नहीं मिलेंगे। यह धरोहर सुल्तान की पोशाक के रूप में है। यह वही पोशाक है जिसे पहन कर अंग्रेजों से लड़ते हुए टीपू सुल्तान शहीद हुए थे।

श्रीरंगपट्टनम में महल के एक कमरे की सफाई के दौरान खून से सनी टीपू की पोशाक मिली। सिल्क का कुर्तानुमा यह परिधान पुराने कागज और रद्दी के बीच पड़ा था। हालांकि इस जानकारी पर आधिकारिक रूप से कोई कुछ नहीं कह रहा है। सरकार से कुछ कहते इसलिए भी नहीं बन रहा है, क्योंकि यह खबर सुल्तान की शहादत [4 मई, 1799] की 210वीं वर्षगांठ पर आई है।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना से लड़ते हुए मरने वाले टीपू सुल्तान के राज्य की राजधानी श्रीरंगपट्टनम ही थी। करीब दो सौ साल तक कूड़े में पड़े रहने के बाद उनकी जो धरोहर मिली है, उसमें टीपू पर शोध करने वाले टी.सी. गौड़ा की भूमिका अहम है। बेंगलूर में रहने वाले गौड़ा 120 किलोमीटर का सफर कर अक्सर इस महल में आते रहते हैं। उनका कहना है कि टीपू से जुड़ी वस्तुओं में यह कुर्ता बेहद महत्वपूर्ण है। यह वह पोशाक है जो उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की गोलियां खाते वक्त पहन रखी थी। टीपू की मौत किले में मैसूर की चौथी लड़ाई के दौरान हुई थी।

गौड़ा का कहना है कि इस पोशाक का संरक्षण करने के लिए विशेषज्ञों की मदद लेनी होगी। यह पोशाक इस वक्त श्रीरंगपट्टनम में टीपू सुल्तान वक्फ बोर्ड के पास है। बोर्ड 24 मई को इस पोशाक को एक प्रदर्शनी में प्रदर्शित कर सकता है।

टीपू के अंतिम दिन

- अपने शासनकाल के दौरान टीपू ने जो कुछ भी एकत्रित किया था, ईस्ट इंडिया कंपनी उनमें से ज्यादातर चीजें ले गई।

- ईस्ट इंडिया कंपनी टीपू को भारत का सबसे ताकतवर शासक मानती थी। दो युद्धों में टीपू ने कंपनी को करारे झटके दिए थे।

- हैदराबाद के निजाम और मराठों की मदद से 1799 में टीपू को मार दिया गया। टीपू के किले में करीब 50 हजार लोगों की सेना घुस गई, जिनका मुकाबला उन्होंने अपने साथियों के साथ पूरी बहादुरी के साथ किया।

अमूल्य धरोहर

- 2004 में विजय माल्या ने एक नीलामी में टीपू की तलवार डेढ़ करोड़ रुपये में खरीदी थी।

- इतिहासकारों के मुताबिक अगर कभी टीपू द्वारा पहनी अंतिम पोशाक नीलाम की गई तो उसकी बोली कम से कम 30 करोड़ रुपये लगेगी।




Monday, March 23, 2009

कोई भी रोक नहीं पाया फांसी.


नई दिल्ली। इतिहासकारों के बीच आज भी इस बात को लेकर विवाद है कि क्या भगत सिंह को बचाया जा सकता था? क्या उन्हें गांधी ने मार डाला? क्या वाकई बापू और अन्य बड़े नेता भगत सिंह के इंकलाबी तेवर और लोकप्रियता से डर गए थे? दरअसल शहीदे आजम की मौत अपने पीछे एक ऐसा सवाल छोड़ गई है जिसे सुलझाया नहीं जा सका है। और शायद जिसे कभी सुलझाया जा भी नहीं सकेगा। लाहौर षड्यंत्र केस में 23 मार्च 1931 को जब 23 वर्षीय भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को सूली पर लटकाया गया तो इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनी गई। ब्रिटिश हुकूमत के इस कुकृत्य की जहां तत्कालीन भारतीय नेताओं ने जमकर आलोचना की, वहीं देश-विदेश के तमाम अखबारों ने भी इसे सुर्खियां बनाया। फांसी 24 मार्च को दी जानी थी। लेकिन जनविद्रोह के डर से ब्रिटिश हुक्मरानों ने तिथि चुपके से बदलकर 23 मार्च कर दी। बिपिन चंद्र द्वारा लिखी गई भगत सिंह की जीवनी 'मैं नास्तिक क्यों हूं' में इस घटना पर तत्कालीन नेताओं और अखबारों द्वारा व्यक्त की गई तीखी टिप्पणियां सिलसिलेवार ढंग से दर्ज हैं।यह काफी दुखद और आश्चर्यजनक घटना है कि भगत सिंह और उसके साथियों को समय से एक दिन पूर्व ही फांसी दे दी गई। 24 मार्च को कलकत्ता से कराची जाते हुए रास्ते में हमें यह दुखद समाचार मिला। भगत सिंह युवाओं में नई जागरूकता का प्रतीक बन गया है।' [सुभाष चंद्र बोस] -'मैंने भगत सिंह को कई बार लाहौर में एक विद्यार्थी के रूप में देखा। मैं उसकी विशेषताओं को शब्दों में बयां नहीं कर सकता। उसकी देशभक्ति और भारत के लिए उसका अगाध प्रेम अतुलनीय है। लेकिन इस युवक ने अपने असाधारण साहस का दुरुपयोग किया। मैं भगत और उसके साथी देशभक्तों को पूरा सम्मान देता हूं। साथ ही देश के युवाओं को आगाह करता हूं कि वे उसके मार्ग पर न चलें।' [महात्मा गांधी] -'हम सबके लाड़ले भगत सिंह को नहीं बचा सके। उसका साहस और बलिदान भारत के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।' [जवाहर लाल नेहरू] -'अंग्रेजी कानून के अनुसार भगत सिंह को सांडर्स हत्याकांड में दोषी नहीं ठहराया जा सकता था। फिर भी उसे फांसी दे दी गई।' [वल्लभ भाई पटेल] -'भगत सिंह ऐसे किसी अपराध का आरोपी नहीं था जिसके लिए उसे फांसी दे दी जाती। हम इस घटना की कड़ी निंदा करते हैं।' [प्रसिद्ध वकील और केंद्रीय विधानसभा सदस्य डीबी रंगाचेरियार] -'भगत सिंह एक किंवदंती बन गया है। देश के सबसे अच्छे फूल के चले जाने से हर कोई दुखी है। हालांकि भगत सिंह नहीं रहा लेकिन 'क्रांति अमर रहे' और 'भगत सिंह अमर रहे' जैसे नारे अब भी हर कहीं सुनाई देते हैं।' [अंग्रेजी अखबार द पीपुल] -'पूरे देश के दिल में हमेशा भगत सिंह की मौत का दर्द रहेगा।' [उर्दू अखबार रियासत] -'राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह की मौत से पूरे देश पर दुख का काला साया छा गया है।' [आनंद बाजार पत्रिका] -'जिस व्यक्ति ने वायसराय को इन नौजवानों को फांसी पर लटकाने की सलाह दी, वह देश का गद्दार और शैतान था।'

Thursday, February 5, 2009

24 उंगलियों वाला शिशु


कमानी के परिवार में छह ऊंगलियों वाले कुछ और लोग भी हैं अमरीका के कैलिफ़ोर्निया में एक ऐसा शिशु पैदा हुआ है जिसके दोनों हाथों और पैरों में छह-छह उंगलियां हैं यानी उंगलियां और अंगूठे मिलाकर कुल 24. अधिक उंगलियों और अंगूठों के साथ पैदाईश कोई नई बात नहीं है लेकिन इतनी अधिक उंगलियां शायद ही किसी बच्चे में एक साथ देखी गई हों.बे एरिया अस्पताल के स्टाफ का कहना है कि उन्होंने जब महिला का अल्ट्रासाउंड किया था तो बच्चे में इतनी उंगलियां या अंगूठे नहीं दिखे थे.
इतना ही नहीं जब यह बच्चा पैदा हुआ तब भी अस्पताल के स्टॉफ ने इन उंगलियों को नोटिस नहीं किया था. इस बच्चे का नाम कमानी हब्बार्ड रखा गया है. कमानी की अतिरिक्त उंगलियां सबसे पहले उनके पिता क्रिस ने देखीं.अतिरिक्त उंगलियां या अंगूठा होना आनुवंशिक है और क्रिस का कहना था कि उनके परिवार में कई ऐसे लोग हैं जिनकी अतिरिक्त उंगलियां हैं लेकिन कमानी तो बिल्कुल ही अलग है. उनका कहना था, ''मेरे परिवार में कुछ लोगों की छह उंगलियां हैं और मेरे परिवार के इतिहास में ऐसा देखा गया है.''सेंट ल्यूक अस्पताल के डॉ माइकल ट्रीस कहते हैं, ''इस मामले पर चिंता करने की बजाय इसे सुंदर और रुचिकर दृष्टि से देखना चाहिए.''वो कहते हैं, ''आप सोचिए एक हाथ में 12 उंगलियों वाला व्यक्ति कितना ज़बर्दस्त पियानो बजाएगा, टाइपिंग कितनी तेज़ी से करेगा और उसका नृत्य कितना ज़बर्दस्त हो सकता है. ''
उल्लेखनीय है कि अतिरिक्त उंगलियों के साथ पैदा होने वालों में जाने माने पूर्व क्रिकेटर सर गैरी सोबर्स का भी नाम है जिनके दोनों हाथों में छह छह उंगलियां थीं.

Saturday, January 31, 2009

गांधी का अस्थिवाहक ट्रक फिर चलेगा

 महात्मा गांधी की अस्थियाँ जिस फ़ोर्ड ट्रक पर ले जाई गई थीं उसे इस वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर एक समारोह में प्रदर्शित किया जाएगा.ये पुराना ट्रक 1948 के बाद से ही बंद पड़ा है और इलाहाबाद के एक संग्रहालय में बुरी अवस्था में रखा हुआ था.फ़िलहाल इस ट्रक की मरम्मत का काम चल रहा है और इस काम में लगे इंजीनियरों को ये देखकर हैरत हुई कि ट्रक का इंजन बिल्कुल दुरूस्त हैअधिकारी ये कोशिश कर रहे हैं कि इस ट्रक को 30 जनवरी को फिर से सड़क पर चलने लायक बनाया जा सके.इसके बाद 12 फ़रवरी को महात्मा गांधी के अस्थिकलश की यात्रा की ही तरह ट्रक के साथ एक और यात्रा निकाली जाएगी.
ऐतिहासिक यात्रा
58 साल पहले महात्मा गांधी की हत्या के बाद जब उनकी शवयात्रा निकली थी तो इसमें लाखों लोग शामिल हुए थे.महात्मा गांधी की अस्थियों को इलाहाबाद में संगम में प्रवाहित किया गया था.जब अस्थिकलश ट्रक पर ले जाया जा रहा था तो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस ट्रक पर अस्थिकलश के साथ थे.नेहरू के साथ महात्मा गांधी के बेटे देवदास और भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल भी फ़ोर्ड ट्रक पर सवार हुए थे.12 फ़रवरी 1948 को महात्मा गांधी की अस्थियाँ इलाहाबाद में संगम में प्रवाहित की गई थीं और तब लाखों लोगों ने इस ट्रक के मार्ग में आकर गांधी को श्रद्धांजलि दी थी.
संग्रहालय

1947 में निर्मित इस फ़ोर्ड ट्रक को पहले सेना ने सज्जित कर फ़ायर ब्रिगेड पुलिस को सौंप दिया था.बाद में जब इलाहाबाद में एक संग्रहालय बना तो इस ऐतिहासिक ट्रक को वहाँ राष्ट्रीय संपत्ति बनाकर रख दिया गया.ट्रक पर पिछले साल अगस्त में नज़र पड़ी उत्तर प्रदेश के राज्य परिवहन निगम के निदेशक उमेश सिन्हा की.उमेश सिन्हा ने बीबीसी को बताया,"महात्मा गंधी की अंतिम यात्रा से जुड़ी ये गाड़ी हमारी धरोहर का अमूल्य हिस्सा है. यही सोचकर हमारे विभाग ने इसके जीर्णोद्धार की ज़िम्मेदारी ली".

मरम्मत

परिवहन अधिकारी इस ट्रक को मरम्मत के लिए अपने वर्कशॉप में ले जाना चाहते थे लेकिन संग्रहालय के नियम इसकी अनुमति नहीं देते थे.इस कारण मरम्मत का काम संग्रहालय के ही गैरेज में करना पड़ा.उत्तर प्रदेश पथ परिवहन निगम के क्षेत्रीय निदेशक पी आर बेलवारायर ने कहा,"इंजीनियर ये देखकर हैरान रह गए कि इतने दशकों तक पड़े रहने के बावजूद ट्रक का इंजन बिल्कुल ठीक था, बस उसे थोड़ा साफ़ करना पड़ा और वह बिल्कुल नए ट्रक के जैसा चलने लगा".सबसे अधिक मुश्किल आई ट्रक के लिए नए टायरों का प्रबंध करने में लेकिन टायर निर्माता कंपनी सिएट ने नए टायर उपलब्ध कराए जिसे लगा दिया गया है.अधिकारियों के अनुसार फ़िलहाल संग्रहालय में इस ट्रक को परीक्षण के तौर पर चलाया जा सकता है.

 

कराची की मोहन गली में गांधी जी


“इस तस्वीर को हमने इसलिए नहीं हटाया ताकि उन (भारतीयों) को एहसास हो जाए कि हम भी उन (गांधी) का सम्मान करते हैं. उनसे प्यार करते हैं और दोस्ती करना चाहते हैं.”यह शब्द 27 वर्षीय शहज़ाद बलोच के हैं जो कराची के उर्दू बाज़ार में स्थित अज़ीज़ मंज़िल नाम की एक इमारत में काम करते हैं जहाँ बालकनियों पर माहत्मा गांधी तस्वीर उकेरी गई है.यह एक तीन-मंज़िला सुंदर इमारत है जो उर्दू बाज़ार की मोहन गली में स्थित है. स्थानीय लोगों के अनुसार मोहन गली भी मोहनदास करमचंद गांधी के नाम पर ही है.शहज़ाद बलोच ने बीबीसी से बातचीत करते हुए कहा, “हम लोग इन तस्वीरों का अब भी सम्मान करते हैं और हर किसी को कहते हैं कि देखो हमारे पास अब भी गांधी साहब की तस्वीर मौजूद है.”शहज़ाद बलोच जैसे कई ऐसे युवक भी हैं जो यह नहीं जानते कि ये चित्र किसके हैं. किसी ने कहा कि इंदिरा गांधी के हैं और किसी ने उसे से राजीव गांधी का बताया.इसी इमारत में एक दुकानदार रफ़ीक़ ने गांधी जी के चित्रों पर आपत्ति जताई है. उनका कहना है, “जिन लोगों ने मकान लिया था शायद उनको पता नहीं था कि यहाँ कोई तस्वीर लगी हुई है, वर्ना और कोई भी होगा तो इसे नहीं रखेगा.”उन्होंने बताया कि घरों या इमारतों पर कोई तस्वीर लगाना इस्लाम के अनुरूप ठीक नहीं है.अज़ीज़ मंज़िल के एक निवासी ने तो अपने घर की बालकनी पर लगे गांधी के चित्र के ऊपर सीमेंट और चूना लगा दिया है जिस से वह चित्र मिट चुका है.

लेकिन मोहम्मद अनवर, जिनका इस इमारत में भी दुकान है, वे इस इमारत को अच्छी तरह जानते हैं. उन्होंने बताया कि इस इमारत का निर्माण 1933 में हुआ था और इस का मालिक विभाजन के बाद भारत चला गया था.उन्होंने कहा, “इस इमारत पर गांधी साहब के चित्र आम लोगों और पर्यटकों को बहुत आकर्षित करते हैं.”अनवर ने बताया कि पहले विदेशी पर्यटक यहाँ आते थे, गांधी साहब के चित्र को देख कर ख़ुश होते थे और तस्वीरें खींचते थे. उनके अनुसार अब स्कूल वाले बच्चों को यह चित्र दिखाने आते हैं.कराची शहर में माहत्मा गांधी के नाम पर ओर भी कई स्थान थे और विभाजन के बाद उनके नाम बदल दिए गए थे.चिड़ियाघर जो पहले ‘गांधी गार्डन’ के नाम से जाना जाता था, विभाजन के बाद उसका नाम बदल दिया गया और यह बना कराची गार्डन. इस तरह शहर से केंद्र में स्थित गांधी स्ट्रीट का नाम बदल कर याक़ूब स्ट्रीट रखा गया है.कराची के अतीत में झांकने पर पता चलता है कि इस शहर का महात्मा गांधी के साथ गहरा संबंध था. 

Friday, January 30, 2009

पाक फ़िल्मकार का अपहरणकर्ता कौन?


पाकिस्तान के जाने-माने फ़िल्म निर्देशक और वितरक सतीश आनंद के अपहरण को तीन महीने गुज़र गए हैं लेकिन पुलिस अभी तक उनके बारे में कुछ भी पता नहीं लगी सकी है.

सतीश आनंद को पिछले साल अक्तूबर में कराची में उस समय अग़वा कर लिया गया था, जब वो अपने घर से दफ़्तर जा रहे थे.

सतीश आनंद पाकिस्तान की एक अहम फ़िल्मी शख़्सियत हैं और उनके पिता जयसिंह आनंद भी फ़िल्म से जुड़े रहे हैं. उन्होंने पाकिस्तान में कई कामयाब फ़िल्में दी हैं.

वो भारतीय अभिनेत्री जूही चावला के क़रीबी रिश्तेदार भी हैं.

उनके घर वालों ने पुलिस में शिकायत कर रखी है लेकिन अभी तक पुलिस ने किसी गिरोह की शिनाख़्त नहीं की है और न ही उनके बारे में पता ही लगा सकी है.

शक तालेबान पर


सिटिज़न पुलिस लायज़न कमेटी के प्रमुख शरफ़ूद्दीन मेमन का कहना है कि वो तमाम पहलुओं की जाँच कर रहे है. हालाँकि वो इस अपहरण में किसी धार्मिक संगठन के शामिल होने से न तो इनकार कर रहे हैं और ना ही स्वीकार रहे हैं.

उनका कहना है, "पुलिस अपने तौर पर काम कर रही है और इस समय कुछ भी बताना मुनासिब नहीं है."

सतीश के अपहरण के बाद कराची में हिंदू बिरादरी में डर का माहौल है.

पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के नेता रमेश कुमार का कहना है कि वो पुलिस की जाँच से संतुष्ट नहीं हैं.

रमेश कुमार का कहना है कि उन्होंने सतीश के घर वालों और सरकार से बातचीत की थी, लेकिन वो इस मामले को अधिक उछालना नहीं चाहते क्योंकि हो सकता है कि घर वाले डरे हुए हों और वो सीधे तौर पर घर वालों से नहीं मिल सके हैं.

उनका कहना है कि उनकी पुलिस से जो बात हुई है उससे उन्हें शक है कि इसमें तालेबान शामिल हो सकते हैं.

सतीश के अग़वा किए जाने के बाद उनके लाहौर दफ़्तर को भी ख़ाली करा लिया गया है.

Tuesday, January 20, 2009

गरीब देता है 495 रूपए की रिश्वत


जोधपुर । भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेडने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की ओर से राजस्थान में गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) जीवन व्यापन करने वाले लोगों पर हुए अनुसंधान में सामने आया कि एक बीपीएल परिवार को सालाना औसतन 495 रूपए रिश्वत के रूप में देने पडते हैं। रिश्वत नहीं दे पाने के कारण एक तिहाई लोग तो बीपीएल कार्ड तक हासिल नहीं कर पाए हैं। 
जोधपुर प्रवास पर आई ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की भारत में कार्यकारी निदेशक अनुपमा झा ने सोमवार को "राजस्थान पत्रिका" से बातचीत में बताया कि राज्य की 5.6 लाख बीपीएल जनता रिश्वत के जाल में उलझी है।
ग्रामीण अधिक जानते हैं आरटीआई 
भ्रष्टाचार के मामले में सूचना का अधिकार (आरटीआई) सशक्त टूल साबित हो रहा है, लेकिन राज्य की 5.5 फीसदी जनता को ही आरटीआई की जानकारी है, इसमें भी सबसे अधिक ग्रामीण तबके के लोग है। 
एफआईआर में भी रिश्वत
ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में पुलिस महक मे को सबसे अधिक भ्रष्ट बताया गया है। चाहे एफआईआर दर्ज करवानी हो या ट्रेफिक पुलिस से वाहन छुडाना हो, हर मामले में पुलिस को रिश्वत देनी पडती है। पुलिस की तरह विद्युत विभाग, स्वास्थ्य, बैंक, जमीन-जायदाद, स्कूली शिक्षा में भी काफी भ्रष्टाचार व्याप्त है। जल विभाग में भ्रष्टाचार सबसे कम है। 
देश का 84 वां स्थान
भ्रष्टाचार के मामले में 180 देशों में भारत का 85 वां स्थान है। भारत को इंटीग्रिटी स्कोर में 10 में से 3.4 अंक मिले हैं, जो बहुत भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करते हैं। सबसे कम भ्रष्ट देशों में फिनलैंड, स्वीट्जरलैंड, डेनमार्क व सिंगापुर देश है, जिनका स्कोर 9.5 तक है। 

Friday, January 16, 2009

'सर्वश्रेष्ठ' नौकरी ने मचाई खलबली

 ऑस्ट्रेलिया के पर्यटन विभाग ने जिस नौकरी को 'दुनिया की सर्वश्रेष्ठ नौकरी' बताया था, उससे इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों में ऐसी खलबली मची है कि पर्यटन विभाग के लिए मुसीबत खड़ी हो गई है.

इस नौकरी के आवेदन स्वीकार करने के लिए जो विबसाइट बनाई गई थी, उस पर तीन दिनों में दस लाख से ज़्यादा 'हिट' आए हैं और वह वेबसाइट क्रैश कर गई है यानी उसने काम करना बंद कर दिया है.

ऑस्ट्रेलियाई पर्यटन विभाग को ऐसा व्यक्ति चाहिए जो क्वींसलैंड समुद्र तट के दूसरी ओर के द्वीपों की देखभाल कर सके और उनके बारे में जानकारी जुटा सके. इसके लिए कोई औपचारिक योग्यता अनिवार्य नहीं, उम्मीदवार को केवल तैराकी, गोता लगाने और नौका खेने का इच्छुक होना चाहिए.

इसके बदले में चुने गए प्रार्थी को छह महीनों में एक लाख तीन हज़ार डॉलर वेतन मिलेगा. इसके अलावा उसे तीन बेडरूम के पूल वाले विला में रहने को मिलेगी जिसका कोई किराया नहीं देना होगा.

इस व्यक्ति को एक महीने में केवल 12 घंटे काम करना होगा और उसकी ड्यूटी में मछलियों की करीब सौ प्रजातियों को खाना खिलाना और द्वीप के पत्रों को एकत्र करना शामिल है. क्षेत्र में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए उसे एक ब्लॉग, एक फ़ोटो डायरी और कुछ वीडियो भी बनाने होंगे.

इस पद का विज्ञापन ऑस्ट्रेलिया के व्हिटसनडे द्वीपसमूह के हैमिल्टन द्वीप के 'केयरटेकर' के रूप में किया गया है.

जुलाई से काम करना होगा

पर्यटन विभाग को पहले ही 2000 वीडियो आवेदन मिले हैं और आवेदन देने की अंतिम तिथि 22 फ़रवरी तक अधिकारियों को हज़ारों और आवेदन मिलने की संभावना है.

इसके बाद मई में दस उचित उम्मीदवारों की सूची तैयार की जाएगी.

टॉरिज़म क्वीन्सलैंड की वेबसाइट पर जाने वाले वोट के आधार पर एक और उम्मीदवार का चयन करेंगे.

फिर उम्मीदवारों को चार दिन की अंतिम इंटरव्यू प्रक्रिया के लिए बुलाया जाएगा और सफल उम्मीदवार एक जुलाई से काम शुरु कर देगा.

 

संबंधों की गहराई तय करते सुर्ख़ लब


कहते हैं कि एक तस्वीर हज़ार शब्दों के बराबर होती है लेकिन क्या एक चुंबन हज़ार बातें कह सकता है....युवतियों की मानें तो शायद हां...

एक अमरीकी विश्वविद्यालय में युवाओं के बीच किए गए एक शोध में यह बात सामने आई है कि युवतियां संबंधों के निर्धारण में चुंबन को सबसे अधिक महत्व देती हैं.

न्यूयॉर्क राज्य विश्वविद्यालय की एक टीम ने लगभग 1000 विद्यार्थियों से इस बारे में सवाल पूछे.

इवोल्यूशनरी साइकोलॉजिस्ट नाम के जर्नल में छपे शोध में कहा गया है कि लड़कियाँ संभावित साथी को समझने के लिए चुंबन को एक तरीके के रूप में अपनाती हैं और इसी आधार पर संबंधों की घनिष्ठता का स्तर तय करती हैं.

वहीं दूसरी तरफ पुरुषों ने चुंबन को कम महत्व दिया और इसे सिर्फ़ शारीरिक संबंध बनाने से जोड़कर देखा.

शोध के दौरान पता लगा कि पुरुष इस बारे में बहुत भेदभाव नहीं करते कि किसका चुंबन ले रहे हैं या किस के साथ शारीरिक संबंध बना रहे हैं.

महत्व

शोध में पाया गया कि पुरुष किसी के भी साथ शारीरिक संबंध बनाने पर राज़ी थे. पुरुषों ने चाहे दूसरे साथी का चुंबन न लिया हो, उसके प्रति आकर्षित न हों या उसे ख़राब चुंबन करने वाला समझते हों फिर भी वो शारीरिक संबंध बनाने के लिए सहमत थे.

लंबे समय के संबंधों में महिलाओं ने चुंबन को पुरुषों से अधिक महत्व दिया और कहा कि पूरे संबंध के दौरान चुंबन का बहुत महत्व होता है.

वहीं पुरुषों का कहना था कि जैसे-जैसे संबंध पुराना होता जाता है वैसे-वैसे चुंबन का महत्व और कम होता जाता है.

महिलाओं और पुरुषों में चुंबन के तरीके को लेकर भी अंतर देखने को मिला.

शीर्ष शोधकर्ता डॉक्टर गॉर्डन गैलप ने कहा कि समय के साथ चुंबन प्रेम-संबंध का एक ज़रूरी हिस्सा बन गया है.

लेकिन उन्होंने यह भी कहा, "महिलाओं और पुरुषों दोनों ही चुंबन से फ़ायदा पाते हैं लेकिन जीवनसाथी की खोज में चुंबन के महत्व पर दोनों में अलग-अलग राय देखने में मिली."

तो फिर युवक हों या युवती...आपको भी चुंबन पर ध्यान देना पड़ सकता है.

 
 

Sunday, January 11, 2009

जूस पिएं, स्वस्थ रहें


अभी तक यही माना जाता था कि फलों रस मोटापा बढ़ाता है। विशेषज्ञों द्वारा अभिभावकों को यही सलाह दी जाती थी कि वे अपने बच्चों को बहुत ज्यादा फ्रूट जूस न पिलाएं, क्योंकि वजन बढ़ने के लिए जिम्मेदारी कारणों में से एक यह भी है। किंतु हाल में हुए एक अघ्ययन में यह बात सामने आई है कि यदि फलों का रस 100 प्रतिशत शुद्ध हो और उसमें शर्करा न मिली हो, तो वह मोटापे का कारण नहीं बनता। इस अघ्ययन को टोरंटो में हुए पीडियाट्रिक ऎकेडमिक सोसायटीज की वार्षिक मीटिंग में प्रस्तुत किया गया। बच्चों पर किए गए अघ्ययन में यह पाया गया कि जो बच्चे 100 प्रतिशत फ्रूट जूस पीते थे उनका वजन नहीं बढ़ा। इस अघ्ययन के लिए पूरे कनाडा से प्रि-स्कूल एज बच्चों यानी वे बच्चे जिन्होंने औपचारिक रू प से स्कूल जाना आरंभ नहीं किया था, के आंकड़े इकट्ठे किए गए थे। शोधकर्ताओं ने यह नतीजा निकाला की 100 प्रतिशत फ्रूट जूस पीने से प्रि-स्कूली बच्चों के बॉडी मास इंडेक्स [बीएमआई] में वृद्धि नहीं हुई। बेयलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन में चाइल्ड न्यूट्रीशन रिसर्चर डॉ. थेरेसा निकल्स के अनुसार, "हमने देखा की जो बच्चे बहुत जूस पीते हैं [100 प्रतिशत शुद्ध] वे ओवरवेट नहीं थे और उन्हें ओवरवेट होने का कोई जोखिम भी नहीं था।" आंकड़ों ने दर्शाया कि जूस न पीने वालों के मुकाबले शुद्ध फलों का जूस पीने वाले बच्चों ने कुल वसा, सैचुरेटिड फैट, सोडियम, शर्करा का कम सेवन किया। शुद्ध जूस पीने वालों ने जरू री पुष्टिकरों को भी खूब मात्रा में हासिल किया जैसे विटामिन- सी, पोटेशियम, मैग्नीशियम फोलेट, विटामिन बी 6 व आयरन। ऎसे बच्चों ने सेब इत्यादि फल भी खूब मात्रा में खाए।
यहां कुछ जानकारियां दी जा रही हैं जिनसे अभिभावक यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उनके बच्चे पौष्टिक फ्रूट जूस ही पिएं।
* लेबल को ठीक से पढ़ें। देख लें कि उसमें लिखा हो कि यह 100 प्रतिशत फलों का रस है। हालांकि कुछ पेय पदार्थों में विटामिन्स एवं कैल्शियम मिलाए जाते हैं। लेकिन यदि वह शुद्ध फलों का रस न हो, तो वह उतना पौष्टिक नहीं होगा। ऎसा फ्रूट जूस चुनें जो पोषक तत्वों से भरपूर हो।
* ऎसे फ्रूट जूस पिएं जो कुदरती तौर पर से भरपूर हों जैसे संतरे का रस। बाकी अन्य फलों की बनिस्पत, 100 प्रतिशत ऑरेंज जूस में विटामिन सी, फोलेट, पोटेशियम और थियामिन अधिक मिलते हैं। आप एक बार में अपने बच्चों को जितने फल खिलाते हैं उससे अधिक पोषण संतरे के एक गिलास जूस में होता है। 
* सॉफ्ट ड्रिंक, कोल्ड ड्रिंक जैसे अस्वास्थ्यकर पेय पदार्थों तथा सेहत का दावा करने वाले रसायन युक्त हैल्थ ड्रिंक्स के बजाए ऎसे आहार को अपनाएं जो पूरी तरह शुद्ध एवं स्वास्थ्यकर हैं जैसे दूध, पानी, नारियल पानी, जूस।

कुछ अन्य शोध यह बताते हैं कि फलों एवं सब्जियों के प्रचुर मात्रा में सेवन करने से अल्जाइमर जैसे दिमागी विकार के विकसित होने का जोखिम भी कम हो जाता है। फलों व सब्जियों के रस में एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होते जो कैंसर, मोटापे, मधुमेह व ह्वदय रोगों से बचाव करते हैं। सामान्य तौर पर उत्तम स्वास्थ्य के लिए एक दिन में 5 फल एवं सब्जियां खानी चाहिए। व्यावहारिक तौर पर यह संभव नहीं हो पाता तो जूस पी लेना आसान है।

सर गंगाराम हॉस्पिटल, नई दिल्ली में प्रिंसिपल डाइटीशियन शशि माथुर के अनुसार, "संतरे और मौसमी फलों में फाइटो कैमिकल होते हैं, जो विटामिन सी का अच्छा स्त्रोत हैं। विटामिन सी से एंटीऑक्सीडेंट मिलते हैं जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में इजाफा होता है। सोडा या जंक जूस के बजाय भोजन के साथ या स्नैक्स के समय अपने बच्चों को 100 प्रतिशत शुद्ध फ्रूट जूस दें। सुबह के नाश्ते में अपने बच्चे को ऑरेंज जूस दें साथ ही उसके लंच के साथ भी ऑरेंज जूस का एक कार्टन पैक कर सकते हैं।"
ऑरेंज जूस की विशेषताएं

ब्रेकफास्ट ड्रिंक के तौर पर मशहूर ऑरेंज जूस गुर्दे की पथरी से बचाता है। एक अघ्ययन के अनुसार रोज एक गिलास ऑरेंज जूस पीने से गुर्दे की पथरी होने की संभावना कम हो जाती है।

*संतरा- इसमें सबसे ज्यादा विटामिन सी और पोटेशियम होता है। यह फोलेट एवं थियामिन का अच्छा स्त्रोत है। इसमें कैंसर से लड़ने वाले फाइटो कैमिकल होते हैं।

*मौसमी- विटामिन सी के मामले में इसका दूसरा स्थान है।

*सेब- विटामिन सी होने के साथ-साथ यह वसा व कॉलेस्ट्रॉल से मुक्त होता है।

क्या आप जल्दी थकते हैं

क्या आप जल्दी थकते हैं
हो सकता है आपके रक्त की कमी
हो। अपने भोजन में लौह-तत्व की पूर्ति के लिए पत्तेदार सब्जियां और फलों का
सेवन खूब करना चाहिए।

भारत में रक्ताल्पता अर्थात् खून की कमी के रोगी सर्वाधिक हैं। यह अनुपात पुरूषों की अपेक्षा çस्त्रयों में अधिक है। शरीर में खून की मात्रा 4 से 6 लीटर होती है। जब खून में लाल रक्त कणिकाएं कम होने लगती हैं । इस रोग में रोगी का चेहरा पीला या काला, आंखें सफेद, शारीरिक कमजोरी, शीघ्रता से थकान, मानसिक अवसाद, स्नायु एवं स्मृति दौर्बल्य आदि लक्षण प्रकट होने लगते हैं। किसी भी प्रकार के रक्तालपता में कुछ प्रयास अत्यन्त लाभकारी हो सकते हैं।
करें आयरन की पूर्ति
इस रोग में खून में लौह तत्व की कमी आने लगती है, अत: अपने भोजन में लौह-तत्व की पूर्ति करने हेतु फलों में सेब, अंजीर, मुनक्का, अनार, पपीता व सब्जी में पालक, मेथी, गाजर, बथुआ, चुकंदर, खूबानी आदि को रात्रि को लोहे की कड़ाही में पानी के साथ 6 घंटे भिगोने के बाद प्रयोग करें, ऎसा करने से तेजी से खून में आयरन की मात्रा बढ़ेगी।
जरू री है विटामिन बी12
खून की कमी के दौरान शरीर को विटामिन बी12 की सख्त आवश्यकता होती है ,जो खून में लाल रक्त कणिकाओं को तेजी से बढ़ाता है। अनार, सेब, चुकंदर में पाए जाने वाला आयरन शरीर में पहुंचकर विटामिन बी12 में बदल जाता है। यदि सुबह के समय पेट की मिट्टी पट्टी व एनीमा लेकर नीबू पानी व शहद के साथ फल व कच्ची सब्जियों का प्रयोग किया जाए, तो विटामिन बी12की पूर्ति होता है।
खनिज लवण हो आवश्यक
खून की कमी के दौरान शरीर में खनिज लवणों की कमी आ जाती है जो कि शरीर को पानी द्वारा पूर्ति नहीं हो पाती है। यदि इस दौरान शरीर को जैतून तेल से धूप मालिश व धूप सर्वांग मिट्टी लेप दिया जाए तो शरीर इस प्रक्रिया द्वारा खनिज लवणों की मूर्ति कर खून को कोबाल्ट, मैग्नीशियम, कॉपर आदि की पूर्ति कर चेहरा एवं त्वचा को कांतिमय बनाता है।
ऑक्सीजन हो पर्याप्त
खून की कमी का एक मुख्य कारण शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा कम होना भी है। जब शरीर में ऑक्सीजन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहती है तो ऑक्सीजन श्वेत रक्त कणिकाओं व प्लाज्मा के संयोजन द्वारा लौह तत्व की पूर्ति कर लाल रक्त कणिकाओं की संख्या बढ़ाता है। जब शरीर में ऑक्सीजन शुद्ध एवं भरपूर पहुंचता है, तो खून के सारे अवयव ठीक कार्य करते हैं। ऑक्सीजन की पूर्ति के लिए सुबह की खुली ताजा हवा में तेज गति से घूमना आदि तेजी से शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करता है।
जीवंत हो भोजन
भोजन में जीवंत खाद्य पदार्थों को लें जैसे अंकुरित अनाज, दाल, फल, सब्जी, सलाद आदि। जीवंत भोजन नई कोशिकाओं को पैदा कर ऊर्जा देता है, नई कोशिकाएं शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा को बढ़ाकर खून की कमी को दूर करती हैं तथा साथ ही हरी दूब व गेहूं के जवारे का 50 से 60 मिग्रा. रस खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा को तेजी से बढ़ाता है जिसे "ग्रीन ब्लड" कहा जाता है। अब तक की धारणा थी कि मांसाहार खून की कमी को पूरा करता है, कदापि नहीं! मांसाहार शरीर में हीम लौह की मात्रा के साथ-साथ कोलेस्ट्रॉल की मात्रा भी तेजी से बढ़ाता है जो कि दिल का दौरा व उच्च रक्तचाप के लिए जिम्मेदार है। प्रकृति में पाया जाने वाला क्लोरोफिल, आयरन व विटामिन्स खून की कमी को सही तरीके से पूरा करते हैं।
- डॉ. वीरेन्द्र अग्रवाल
      

Thursday, December 18, 2008

सोनल शाह के समर्थन में उतरा भारतीय समुदाय


वॉशिंगटन। अमरीका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति बराक ओबामा के सत्ता हस्तान्तरण दल की सदस्य बनाई गईं सोनल शाह के समर्थन में अमरीका का भारतीय समुदाय सामने आ रहा है। सोनल शाह के विश्व हिन्दू परिषद से सम्बन्ध होने को लेकर पैदा हुए विवाद को देखते हुए भारत-अमरीका राजनीतिक कार्रवाई समिति (यूएसआईएनपीएसी) ने ओबामा को भेजे एक पत्र में कहा है कि सोनल शाह पर मुस्लिमों और ईसाइयों के खिलाफ हिंसा में शामिल संगठन का समर्थक होने का झूठा आरोप लगाया जा रहा है।

यूएसआईएनपीएसी के अध्यक्ष संजय पुरी ने कहा कि भारतीय मूल के अमरीकी समुदाय के विभिन्न धार्मिक समूहों का बहुमत सोनल की नियुक्ति का समर्थन करता है। उल्लेखनीय है कि गूगल की पूर्व कर्मचारी सोनल को ओबामा ने अपने प्रशासन की तकनीकी नीति बनाने के लिए गठित तीन सदस्यों के दल में शामिल किया है। सोनल स्वयं विश्व हिन्दू परिषद की अमरीकी शाखा से अपने सम्बन्ध होने के आरोपों से इनकार कर चुकी हैं।

Tuesday, December 2, 2008

वोट तब, घूंघट हटे जब



जयपुर। चुनाव आयोग के सख्त निर्देशों के चलते विधानसभा चुनाव में इस बार महिलाओं को घूंघट हटाकर मतदान करना होगा। पारंपरिक रीति-रिवाजों और लोक-लाज के कारण राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में महिलाएं लंबे घूंघट में मतदान करती आई हैं।
भारतीय चुनाव आयोग के सख्त निर्देशानुसार वोट डालने से पहले महिलाओं को अपना घूंघट हटाकर मतदान केंद्र में ड्यूटी पर तैनात महिलाकर्मियों को अपने फोटो परिचय पत्र से चेहरे का मिलान करवाना होगा। इससे फर्जी मतदान पर अंकुश लग सकेगा। ग्रामीण परम्परा व लोक-लाज के कारण किसी अजनबी पुरूष के सामने महिलाओं के चेहरा दिखाने को लेकर आने वाली समस्याओं के संबंध में प्रशासन का कहना है कि मतदान केंद्रों पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ महिलाकर्मियों की तैनातगी के प्रयास किए जाएंगे।

Last Updated [ 12/2/2008 12:45:36 AM]

Saturday, November 29, 2008

ग्रेनेड कैमरा हो रहा तैयार

Marwar News!
युद्धभूमि में ब्रितानी सैनिकों की मदद के लिए अब अब आई-बॉल की मदद ली जाएगी.

आई-बॉल एक वायरलेस गेंद की तरह है जिसे लड़ाई के मैदान में हथगोले की तरह फेंका जा सकता है या फिर ग्रेनेड लॉन्चर से भी. इसी वजह से कैमरा ग्रेनेड भी कहा जा रहा है! इसे इतना मज़बूत बनाया गया है कि यह काफ़ी तेज़ झटके सह सकता है, इसके भीतर लगे कैमरे 360 डिग्री यानी चारों तरफ़ की तस्वीरें तत्काल भेज सकते हैं1 लड़ाई के मैदान में दुश्मन के किसी मोर्चे पर कितने सैनिक और कैसे हथियार हैं या मोर्चे की संरचना क्या है, ऐसी जानकारियाँ हासिल करने में इस कैमरा ग्रेनेड से काफ़ी मदद मिल सकती है1 सैनिकों को ख़तरे में डाले बिना दुश्मन के बारे में काफ़ी प्रामाणिक जानकारी मिल सकेगी1 ग्रेनेड कैमरा रियल टाइम में अपने चारों तरफ़ की तस्वीर तुरंत भेज सकता है, विशेष तौर पर तैयार किए गए वायरलेस डेटा प्रोसेसर की मदद से सैनिक ग्रेनेड कैमरा की तस्वीरें बिना किसी समस्या के देख सकते हैं.ब्रितानी रक्षा मंत्रालय की ओर से आयोजित एक प्रतियोगिता के तहत यह आइडिया आया था जिसे मंत्रालय ने आगे बढ़ाया है.स्कॉटलैंड स्थित एक कंपनी ड्रीमपैक्ट इसे बना रही है, कंपनी के प्रमुख पॉल थॉमसन का कहना है कि अभी कैमरा ग्रेनेड अपनी शुरूआती अवस्था में है लेकिन उन्हें पूरी उम्मीद है कि रणभूमि में कारगर सिद्ध होगा.उन्होंने कहा, "हमने कई शुरूआती वैज्ञानिकों चुनौतियों का हल निकाल लिया है, हमें पूरी उम्मीद है कि सैनकों को इससे लड़ाई के मैदान में मदद मिलेगी."रक्षा मंत्रालय के निदेशक एंड्रयू बेयर्ड ने भी इस नई वैज्ञानिक उपलब्धि की सराहना की है.

उन्होंने कहा, "आई-बॉल की टेक्नॉलॉजी बहुत ही बेहतरीन है और उसमें इतना दम है कि भविष्य के रक्षा उपकरणों के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है."आई-बॉल को सैनिकों के हाथ में आने में भी कई साल लग सकते हैं और इसकी लागत के बारे में नहीं बताया गया है.

 

Saturday, November 22, 2008

मलेशिया में योग के ख़िलाफ़ फ़तवा


DingalNews! मलेशिया में इस्लामिक धर्माधिकारियों ने एक फ़तवा जारी करके लोगों को योग करने से रोक दिया गया है क्योंकि उनको डर है कि इससे मुसलमान 'भ्रष्ट' हो सकते हैं. धर्माधिकारियों का कहना है कि योग की जड़ें हिंदू धर्म में होने के कारण वे ऐसा मानते हैं. यह फ़तवा मलेशिया की दो तिहाई लोगों पर लागू होगा जो इस्लाम को मानते हैं और उनकी कुल आबादी कोई दो करोड़ 70 लाख है.
समाचार एजेंसी एपी के अनुसार मलेशिया को आमतौर पर बहुजातीय समाज माना जाता है जहाँ आबादी का 25 प्रतिशत चीनी हैं और आठ प्रतिशत हिंदू हैं। समाचार एजेंसी एपी के अनुसार इस आदेश को मलेशिया में बढ़ती रूढ़िवादिता की तरह देखा जा रहा है। खेल की तरह ज़्यादातर लोगों के लिए योग एक तरह का खेल है जिससे आप अपने तनाव को कम कर सकते हैं और दिन की शुरुआत कर सकते हैं।
लेकिन इस प्राचीन व्यायाम योग की जड़ें हिंदू धर्म में हैं और मलेशिया की नेशनल फ़तवा काउंसिल ने कहा है कि मुसलमानों को योग नहीं करना चाहिए। काउंसिल के प्रमुख अब्दुल शूकर हुसिन का कहना है कि प्रार्थना गाना और पूजा जैसी चीज़ें 'मुसलमानों के विश्वास' को डिगा सकती हैं। हालांकि लोगों के लिए योग न करने के इस आदेश को मानने की बाध्यता नहीं है और काउंसिल के पास इसे लागू करवाने के अधिकार भी नहीं हैं लेकिन बड़ी संख्या में मुसलमान फ़तवे को मानते हैं। इस निर्णय से पहले मलेशिया की योग सोसायटी ने कहा था कि योग केवल एक खेल है और यह किसी भी धर्म के आड़े नहीं आता है.
योग की शिक्षिका सुलैहा मेरिकन ख़ुद मुसलमान हैं और वे इस बात से इनकार करती हैं कि योग में हिंदू धर्म के तत्व हैं। समाचार एजेंसी एपी से उन्होंने कहा, "हम प्रार्थना नहीं करते और ध्यान भी नहीं करते." उनके पिता और दादा भी योग के शिक्षक रह चुके हैं. उनका कहना था, "योग एक महान स्वास्थ्य विज्ञान है. इसे वैज्ञानिक रुप से साबित भी किया जा चुका है और इसे कई देशों ने इसे वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति की तरह स्वीकार भी किया है."
बीबीसी के कुआलालंपुर संवाददाता रॉबिन ब्रांट का कहना है कि हालांकि योग की कक्षाओं में ज़्यादातर चीनी और हिंदू ही नज़र आते हैं लेकिन बड़े शहरों में मुसलमान महिलाओं का योग की कक्षाओं में दिखाई देना आम बात है.