Sunday, July 27, 2008

योग से बढ़ती है एड्स से लड़ने की ताकत


एनबीटीः मेडिटेशन से एड्स के दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। अमेरिकी रिसर्चरों का अनुमान है कि इससे मरीज़ों की प्रतिरोधक क्षमता में सुधार होता है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया के शोधकर्ताओं के मुताबिक अगर बड़े स्तर पर भी ऐसे ही नतीज़े सामने आए, तो निश्चित तौर पर एड्स के खिलाफ लड़ाई में यह एक सस्ता और बिना तकलीफ वाला तरीका होगा। 

टीम ने लॉस ऐंजिलिस के 67 एचआईवी पॉज़िटिव लोगों पर एक छोटा सा टेस्ट किया था। इन मरीजों को तनाव कम करने के एक प्रोग्राम में शामिल किया गया। इसे माइंडफुलनेस मेडिटेशन का नाम दिया। इसमें जोर दिया गया कि लोग अपनी चेतना को अतीत के दुख और भविष्य की चिंताओं में लगाने की जगह वर्तमान के बारे में सोचें। मरीजों द्वारा दो महीने के इस मेडिटेशन प्रोग्राम में हिस्सा लेने से पहले और बाद में उनके सीडी4-टी सेल की गिनती कि गई थी। जैसे-जैसे वॉलंटियरों ने मेडिटेशन का समय बढ़ाया उनके शरीर में सीडी4-टी सेल की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई। इससे अंदाजा लगाया गया कि उनके शरीर का इम्यून सिस्टम या प्रतिरोधी तंत्र एड्स वायरस से आसानी से मुकाबला कर पा रहा है। 

इस स्टडी में अहम भूमिका निभाने वाले डेविड क्रेसवेल का कहना था कि स्ट्रेस मैनिजमंट प्रोग्राम और मेडिटेशन का सीधा असर एचआईवी की सक्रियता पर पड़ता है, और उसकी बढ़त धीमी पड़ जाती है। उन्होंने बताया कि ध्यान में भाग लेने वाले लगभग सभी लोग पहले तनाव से ग्रस्त थे। 

ब्रेन, बिहेवियर एंड इम्युनिटी नामके जर्नल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक इस स्टडी में भाग लेने वाले अधिकतर वॉलंटियर पुरुष, अफ्रीकन-अमेरिकन, होमोसेक्सुअल और बेरोजगार थे। इसके अलावा ये एंटी रिट्रोवायरल इलाज भी नहीं करा रहे थे। 

मेडिटेशन की क्लास में आठ हफ्तों तक हर रोज दो-दो घंटे के सेशन चलते रहे। वॉलंटियरों ने पूरी तरह इसका आनंद उठाया। केसवेल का कहना है कि मेडिटेशन का यह तरीका ग्रुप बेस्ड और बहुत सस्ता है। अगर इसके शुरुआती नतीजे आगे भी मिलते रहते हैं तो यह एड्स से लड़ने के लिए दवाइयों के कोर्स के साथ-साथ एक बढि़या तरीका साबित होगा। 

Friday, July 25, 2008

तीस सालों से अस्थियों को गंगा का इतंज़ार


हफ़ीज़ चाचड़
बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, कराची से
पाकिस्तान में कराची शहर के एक शमशान घाट में 100 से अधिक लोगों की अस्थियाँ गंगा नदी में विसर्जन के इंतज़ार में हैं. कराची में गूजर हिंदू समुदाय शमशान घाट में ये अस्थियां रखी हुई हैं. जिन लोगों की ये अस्थियाँ हैं उनकी आख़िरी इच्छा थी कि अस्थियाँ गंगा में विसर्जित की जाएँ. 

शमशान घाट के प्रबंधक महाराज महादेव ने बीबीसी को बताया, “यह अस्थियाँ कम से कम 30 वर्षों से पड़ी हैं, इन लोगों के परिजन भारतीय वीज़ा न मिलने की वजह से अस्थियों को हरिद्वार के पास गंगा में विसर्जति नहीं कर सके.” 

उन्होंने बताया कि भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों के अनुसार हरिद्वार में कोई रिश्तेदार या जान पहचान वाला हो तभी वीज़ा मिल सकता है. महाराज ने कहा, “ऐसे कई लोग हैं जिनका हरिद्वार में कोई नहीं है, ये ग़रीब लोग बार-बार वीज़ा के लिए इस्लामाबाद जाने का ख़र्च बर्दाश्त नहीं कर सकते थे.” 

इंतज़ार में...
  अस्थियाँ कम से कम 30 वर्षों से पड़ी हैं, इन लोगों के परिजन भारतीय वीज़ा न मिलने की वजह से इन अस्थियों को हरिद्वार के पास गंगा में विसर्जति नहीं कर सके
 
महाराज महादेव 



शमशान घाट प्रशासन ने एक पत्र लिख कर हिंदू समुदाय को सूचित किया है कि 100 के करीब अस्थियाँ पड़ी हैं जिनके बारे में पता नहीं है कि यह किस परिवार की हैं क्योंकि इन मटकों पर नाम मिट चुके हैं. 

महाराज महादेव का कहना है कि अस्थियाँ विसर्जित करने के लिए मरने वालों के परिजनों का उपस्थित होना ज़रूरी है, इसलिए यह पत्र लिखा गया है. 

1998 की जनसंख्या के अनुसार पाकिस्तान में करीब 24 लाख, 33 हज़ार हिंदू है और पिछले 10 सालों में हिंदुओं की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई है. हिंदू समुदाय अधिकतर सिंध प्रांत में रहते हैं. 

पाकिस्तान हिंदू परिषद के सदस्य हरी मोटवाणी ने बताया, “जो ग़रीब लोग भारत नहीं जा सकते, वह अपने परिजनों की अस्थियाँ सिंधू नदी में विसर्जित करते हैं.” 

उन्होंने कहा कि ज़रूरी नहीं है कि अस्थियों को भारत में ही विसर्जित किया जाए और यह तो परिवारजनों की मर्ज़ी पर निर्भर करता है.

पिछले कई सालों से भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में बहतरी के कारण वीज़ा नीति में नर्मी हुई है. 

इसी साल भारत से कई लोगों की अस्थियाँ ला कर सिंधू नदीं में विसर्जित की गई हैं जिनमें सिंधी साहत्यकार हरी मोटवाणी और सुप्रसिध गांधीवादी निर्मला देशपांडे शामिल हैं. 

हिंदू परिषद के सदस्य हरी मोटवाणी के अनुसार आजकल भारत सरकार आसानी से वीज़ा जारी कर रही है लेकिन कुछ दिक्कतें ज़रूर हो रही हैं.

उल्लेखनीय है कि शमशान घाट के प्रशासन ने इन अस्थियों के विसर्जन के लिए भारत सरकार से सपंर्क किया है. महाराज महादेव का कहना है कि यदि भारत सरकार की अनुमति मिल गई तो इन अस्थियों को गंगा नदी में विसर्जित किया जाएगा. 

उन्होंने पाकिस्तान सरकार से मांग की है कि वह इन अस्थियों के विसर्जन के लिए भारत सरकार से अनुरोध करे.

Wednesday, July 23, 2008

नैनो आई नहीं प्रतिबंध की मांग पहले


डीएनए
Wednesday, July 23, 2008 17:12 [IST]
मुंबई.देश में सस्ती कार के नाम से आने वाली नैनो कार भले ही अभी सड़क पर नहीं आई है, लेकिन इसकी दहशत अभी से नजर आने लगी है। महाराष्ट्र विधान परिषद में तो विपक्ष ने इस कार पर प्रतिबंध लगाने तक की मांग कर दी जिसे परिवहन राज्यमंत्री हसन मुशरिफ ने मंगलवार को खारिज कर दिया।
मुंबई में करीब 15 लाख गाड़ियां पहले से सड़कों पर दौड़ रही हैं। इनमें प्रतिदिन 15 हजार गाड़ियां और जुड़ जाती हैं। विपक्ष को अंदेशा है कि नैनो जैसी सस्ती कार के बाजार में आते ही उसे खरीदने वालों में भगदड़ मच जाएगी और प्रदूषण व वाहन संबंधी सारे नियम कायदे टूट जाएंगे। सड़कों पर जाम लग जाएगा और चलने के लिए कहीं जगह नहीं बचेगी।
भाजपा के मधु चव्हाण ने टाटा की नैनो पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। अंतरराष्ट्रीय मापदंड के अनुसार एक किलोमीटर के दायरे में करीब 300 वाहन होने चाहिए जबकि मुंबई में इतने क्षेत्र में करीब 591 गाड़ियां हैं। नैनो के आ जाने से यह संख्या बहुत बढ़ जाएगी। अपना पद संभालने के महज पांच दिन बाद आए संकट से निपटते हुए परिवहन राज्यमंत्री मुशरिफ ने कहा कि किसी भी कार पर प्रतिबंध लगाया जाना व्यावहारिक नहीं है।
अलबत्ता मंत्री ने यह माना कि राज्य के परिवहन विभाग में कई तरह की धांधलियां हैं, जिन्हें दूर किया जाना है। उन्होंने अफसरों को तो भ्रष्टाचार न करने को कह दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि पूरा आकाश ही फटा हुआ है कहां तक उसकी सिलाई करें।

भगवान राम ने खुद तोड़ा था रामसेतु


एजेंसी
Wednesday, July 23, 2008 20:44 [IST]
नई दिल्ली.रामसेतु प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा है कि भगवान राम ने अपनी पत्नी सीता को छुड़ाने के लिए श्रीलंका जाते समय रामसेतु बनवाया था लेकिन लौटते समय उसे खुद राम ने तोड़ दिया था। सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील एफएस नरीमन ने यह दलील कंबन रामायण का हवाला देते हुए दी।
नरीमन के मुताबिक, ऐसे में सरकार किसी सेतु या पुल को नहीं नष्ट कर रही क्योंकि किसी पुल का अस्तित्व नहीं था। फिर भी सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर अपनी प्रतिक्रिया में सेतुसमुद्रम शिपिंग कैनाल प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए वैकल्पिक मार्ग अपनाने पर रजामंदी जताई। इससे रामसेतु को छोड़े जाने के आसार बढ़ गए हैं।
चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन नीत बेंच ने नरीमन को सुझाव दिया कि सरकार को आस्था और जीवमंडल के बीच संतुलन के लिए कुछ करना चाहिए। बेंच में शामिल जस्टिस रवींद्रन ने यह भी सुझाव दिया कि जब कोई मुद्दा नहीं हो तो सरकार को इसे बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। 
नरीमन ने इन सुझावों से सहमति दिखाते हुए शीर्ष कोर्ट को आश्वस्त किया कि वे सरकार को सुझाव देंगे कि वह इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करे। 
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि वह इस पर विचार करे कि वैज्ञानिक, तकनीकी, आर्थिक और सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक लिहाज से क्या थोड़ा बदलाव उचित होगा। 
इससे पहले, पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. सुब्रrाण्यम स्वामी और तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता समेत याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कोर्ट से रामसेतु को राष्ट्रीय विरासत घोषित करने तथा इसे नष्ट नहीं करने की मांग करते हुए अपनी दलीलें दीं।

Saturday, July 12, 2008

बड़े-छोटे मस्त, मंझले की मुसीबत

डीएनए
Sunday, July 13, 2008 09:00 [IST]
मुंबई.बड़ा बच्चा है तो जिम्मेदार होगा और छोटा तो सबका लाडला है। आमतौर पर पेरेंट्स की अपने बड़े और छोटे बच्चे के प्रति कुछ ऐसी ही धारणा होती है इससे बीच वाला बच्चा उपेक्षित रह जाता है या खुद को उपेक्षित महसूस करता है। उसे लगता है उसका कोई वजूद ही नहीं। बर्थ ऑर्डर के हिसाब से पेरेंट्स द्वारा बच्चों से व्यवहार करने के पीछे कई सामाजिक और मनो वैज्ञानिक पहलू हैं। 

बर्थ ऑर्डर कई बार बच्चों के माइंडसेट को काफी गहरे तक प्रभावित करता है। बड़े बच्चे के पहले कदम से लेकर पहले शब्द तक मां बाप की पूरी अटेंशन रहती है, यही वजह है कि उन्हें यह सब खास लगता है। छोटा बच्चा पेरेंट्स की इस अटेंशन से बेखबर रहता है और वही करता है जो उसका दिल करता है। 

मनोचिकित्सक अंजली छाबड़िया के मुताबिक बीच के क्रम वाला बच्चा कुछ अलग ही तरह से सोचता है। 

काश मैं भी बड़ा होता: 

ज्यादातर मां बाप के पूरी तरह से ध्यान नहीं दे पाने के चलते बीच वाला बच्चा खुद को उपेक्षित महसूस करता है। वह सोचता है काश वह बड़ा बच्चा होता। पेरेंट्स को बच्चों को लेकर बैलेंस अप्रोच रखनी चाहिए। कुछ मां-बाप यह बखूबी करते हैं। बच्चों को उनकी जरूरतों और उनके टेलेंट के हिसाब से अलग-अलग तरीके से गाइड करना चाहिए। सभी बच्चों पर एक जैसा फॉमरूला अपनाना भी सही नहीं है।

कैजुअल अप्रोच :

मनोचिकित्सक सीमा हिंगोरानी के मुताबिक आमतौर पर पेरेंट्स अपने पहले बच्चे के साथ ज्यादा इन्वॉल्व होने के बाद दूसरे बच्चे के समय कैजुअल हो जाते हैं।

इसके बाद तीसरे बच्चे के प्रति वे ज्यादा भावुक हो जाते हैं क्योंकि वह इस क्रम में अंतिम होता है। पहला बच्चा आत्मनिर्भर होता है। दूसरा उसी की नकल करने लगता है जबकि तीसरा अलग रवैया अख्तियार करता है। 

बीच के कुछ बड़े नाम..

जरूरी नहीं कि उपेक्षित महसूस करने के बाद बीच वाला बच्च जिंदगी में कुछ नहीं कर पाता है। बचपन की यह धारणा बड़े होने पर खत्म हो जाती है। दुनिया के सबसे अमीर और माइक्रासॉफ्ट के पूर्व चेयरमैन बिल गेट्स, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन. एफ. कैनेडी और क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो और पॉप गायिका मैडोना कुछ ऐसे ही नाम है जिन्होंने बचपन में उपक्षित महसूस करने के बावजूद दुनिया में खूब नाम कमाया।

Saturday, June 28, 2008

बिल की ५ हिदायतें

अगर आप गड़बड़ियां करते हों तो उसके लिए अपने माता-पिता को दोष न दें। अपनी गलतियों का रोना रोने के बजाय उनसे सीखने का प्रयास करंे।
>>आपके पैदा होने से पहले आपके माता-पिता इतने नीरस नहीं थे, जितने अब हैं। वे आपके जरूरी-गैर जरूरी खर्च उठाने, आपके कपड़े साफ करने और आपकी हर बात सुनने की वजह से ऐसे हो गए हैं।
>>आपकी स्कूल में हर चीज का निर्धारण भले ही पास-फेल से होता हो, लेकिन जिंदगी में हर बार ऐसा नहीं होना जरूरी नहीं है।
>> जिंदगी की स्कूल में सेमेस्टर्स नहीं होते। इसमें आपको गर्मियों की छुट्टियां नहीं मिलेंगी।
>>अनाकर्षक व्यक्तियों के प्रति भी अच्छी राय रखें। हो सकता है आपको ऐसे ही किसी व्यक्ति के लिए काम करना पड़े।
यह भी खूब !
>> बिल गेट्स 250 डॉलर प्रति सेकेंड कमाते हैं यानी रोजाना दो करोड़ डॉलर।
>> अगर उनके हाथ से एक हजार डालर का नोट गिर जाए तो उन्हें उसे उठाने की जरूरत नहीं रहेगी। उसे उठाने में उन्हें चार सेकेंड का समय लगेगा और इतने समय में वे हजार डॉलर कमा लेंगे।
>> अमेरिका पर कुल कर्ज 5.62 ट्रिलियन डॉलर है। अगर बिल गेट्स को इस कर्ज का भुगतान करने को कहा जाए तो वे 10 साल से भी कम समय में उसे चुकता कर देंगे।
>> वे संसार के प्रत्येक व्यक्ति को 15 डॉलर दान दे सकते हैं और उसके बाद भी उनके पास 50 लाख डालर बच जाएंगे।
>> अगर गेट्स के पास कुल राशि को एक डालर के नोटों में तब्दील कर दिया जाए तो उन्हें जोड़कर धरती से चंद्रमा तक 14 बार सड़क बनाई जा सकती है। लेकिन एक व्यक्ति को यह सड़क बनाने में 1400 साल लगेंगे, वह भी लगातार 24 घंटे काम करने पर।
>> अगर माइक्रोसाफ्ट विंडो के यूजर्स हर बार कम्प्यूटर हेंग होने पर हर्जाने के तौर पर एक-एक डॉलर की मांग करने लगें तो गेट्स तीन साल में दिवालिया हो जाएंगे।

Friday, June 27, 2008

पहले फ़ील्ड मार्शल सैम बहादुर नहीं रहे

भारत के पूर्व सेना प्रमुख और 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के हीरो माने जाने वाले फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का गुरुवार रात निधन हो गया. वो 94 वर्ष के थे.
कई दिनों से उनकी हालत नाज़ुक बनी हुई थी. मानेकशॉ तमिलनाडु के वेलिंग्टन सेना अस्पताल में भर्ती थे.
समाचार एजेंसियों के अनुसार गुरुवार की सुबह डॉक्टरों ने कह दिया था उनकी हालत लगातार बिगड़ रही है.
भारत के सबसे ज़्यादा चर्चित और कुशल सैनिक कमांडर माने जाने वाले 94 वर्षीय मानेकशॉ का जीवन उपलब्धियों से भरा रहा. उन्होंने भारत के लिए कई महत्वपूर्ण जंगों में निर्णायक भूमिका निभाई.
उनकी सबसे बड़ी कामयाबी मानी जाती है- 1971 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंग में जीत.
उस समय पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में करीब 93 हज़ार पाकिस्तानी सैनिकों फ़ौज ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया था.
तब से सैम बहादुर के नाम से लोकप्रिय फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ को एक राष्ट्रीय नायक के रूप में देखा जाता रहा है.
मानेकशॉ का बचपन
फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ का पूरा नाम सैम होर्मुशजी फ़्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ है. उनका जन्म तीन अप्रैल 1914 को अमृतसर में हुआ था.
उनका परिवार पारसी है. उनके पिता डॉक्टर एचएफ मानेकशॉ एक चिकित्सक थे और पंजाब में जाकर बस गए थे. सैम मानेकशॉ ने प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में ही पाई. बाद में वो नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में दाखिल हो गए.
स्कूली शिक्षा के बाद वो उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैंड जाना चाहते थे. लेकिन उनके पिता ने उन्हें बहुत छोटा जानकर विदेश नहीं भेजा.
बाद में उन्होंने अमृतसर के हिंदू सभा कॉलेज में दाख़िला लिया. उन दिनों 'ब्रिटिश इंडियन आर्मी' में भारतीयों को सीधा कमीशन मिलने लगा था और देहरादून में 'इंडियन मिलिट्री एकेडमी' की स्थापना की गई थी.
सैम ने भी एकेडमी के पहले बैच में प्रवेश के लिए आवेदन किया और सफल हो गए.
मानेकशॉ पर डॉक्यूमेंट्री
फ़ील्ड मार्शल मानेकशॉ पर एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'इन वार एंड पीस: द लाइफ़ ऑफ़ फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ' भी बन चुकी है.
दिल्ली की ग़ैरसरकारी संस्था 'परज़ोर' ने इस डॉक्यूमेंट्री को तैयार किया था.
भारत-पाकिस्तान की 1971 की जंग के दौरान मानेकशॉ भारतीय सेनाध्यक्ष थे
ये फ़िल्म एक दादा द्वारा अपने पोते को बताए गए किस्सों पर आधारित थी. जिसमें दादा सैम मानेकशॉ ने अपने पोते को भारत के कुछ यादगार ऐतिहासिक पलों के बारे में बताया था.
फ़िल्म की निर्देशक जेसिका गुप्ता ने वर्ष 2003 में डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म के उदघाटन समारोह के दौरान बीबीसी को बताया था, "सैम बहादुर का जो मज़ाक करने का अंदाज़ है, जो अपनापन है, उससे आपको इस बात का एहसास हो जाता है कि आप किसी हीरो के पास बैठे हुए हैं."
इस डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म में एक जगह सैम याद करते हैं कि कैसे 1971 की लड़ाई के बाद तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें तलब किया और कहा कि ऐसी चर्चा है कि सैम तख़्ता पलटने वाले हैं.
सैम ने मज़ाक करते हुए अपने जाने-माने अंदाज़ में कहा, "क्या आप ये नहीं समझतीं कि मैं आपका सही उत्तराधिकारी साबित हो सकूँगा? क्योंकि आपकी नाक लंबी है और मेरी भी नाक लंबी ही है."
और फिर सैम ने कहा, "लेकिन मैं अपनी नाक किसी के मामले में नहीं डालता और सियासत से मेरा दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है."
फिल्म में सैम को ये भी कहते हुए दिखाया गया है कि शिमला समझौते के दौरान भारत ने कश्मीर समस्या सुलझाने का सुनहरा मौक़ा ख़ो दिया.

Wednesday, June 18, 2008

कब जागेंगे हम?

जब पिछली बार हमने सत्ता के गलियारों को हिलाने की हिमाकत की थी तो हमें तीन साल तक दहकते अंगारों पर चलने का अभिशाप दिया गया. रक्षा सौदों में भष्टाचार की पोल खोलने वाला ऑपरेशन वेस्ट एंड मार्च 2001 में प्रसारित हुआ था. इसके फौरन बाद दो चीजें हुईं. पहला हमें लंबे समय तक लोगों की अपार सराहना और उनका प्यार मिला. दूसरा, हमारे काम और जिंदगी पर एक अनैतिक और असंवैधानिक हमला बोला गया. ये भी लंबे समय तक नहीं रूका—तब तक जब तक सरकार का सारा गोला-बारूद खत्म नहीं हो गया.
छह साल पहले उस वक्त हम पर एक के बाद एक कई आरोप लगाए गए. कुछ ने कहा कि हम कांग्रेस के लिए काम करते हैं. कइयों के लिए हम दाऊद के आदमी थे. कुछ का कहना था कि हमारे पीछे हिंदुजा का पैसा लगा है. कोई हमें आईएसआई से जोड़ रहा था जिसका मकसद हमारे जरिये शेयर बाजार को औंधे मुंह गिराना था. कहा जा रहा था कि इस काम के लिए हमें करोड़ों रुपये मिले हैं. यही नरेंद्र मोदी उस समय बीजेपी के महासचिव हुआ करते थे. मुझे वह टीवी इंटरव्यू नहीं भूलता जिसमें मोदी और मैं दोनों फोन पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे और मोदी चिल्लाचिल्लाकर हमारे खिलाफ झूठ उगल रहे थे. एक दिन बाद ही वह मेरे बारे में दस तथ्यों से भरा एक पर्चा भी छापने वाले थे.
मुझे वह टीवी इंटरव्यू नहीं भूलता जिसमें मोदी और मैं दोनों फोन पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे और मोदी चिल्लाचिल्लाकर हमारे खिलाफ झूठ उगल रहे थे. एक दिन बाद ही वह मेरे बारे में दस तथ्यों से भरा एक पर्चा छापने वाले थे.
इनमें पहला और सबसे अहम तथ्य ये था कि मैं एक कांट्रेक्टर का बेटा हूं जो कि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह के करीबी सहयोगी थे.
हमारे ख़िलाफ़ उछाला गया हर आरोप दिल्ली के संभ्रांत हलकों में न केवल चटखारे लगाकर सुना-सुनाया गया बल्कि एक कान से दूसरे कान तक जाने की प्रक्रिया में इसमें कई और स्वाद भी जोड़े गए. यहां तक कि दोस्तों और जानने वालों ने भी दबी जबान में बातें कीं. ये वे लोग थे जिन्होंने किसी को बिना फायदे के कभी कुछ करते हुए नहीं देखा था. उनके लिए ये मानना सही भी था कि हम भला उनसे क्योंकर अलग होंगे. और अब जब सरकार हमारे शिकार पर निकल ही चुकी थी तो सच का सामने आना बस कुछ वक्त का ही खेल था. इतना सब कहने के बाद मिलने पर हमारी तरफ एक जुमला उछाल दिया जाता कि आपने असाधारण काम किया...ऐसा काम जो न सिर्फ जरूरी था बल्कि बहुत साहसिक भी.
हकीकत ये है कि-
-मैं कभी भी किसी हिंदुजा से नहीं मिला था
-मैंने स्टॉक मार्केट में एक शेयर की भी खरीद-फरोख्त नहीं की थी.
-मेरा कांग्रेस से कभी भी कोई लेनादेना नहीं रहा. मैं तो राजनीति कवर करने वाला पत्रकार तक नहीं था. रिकार्ड के लिए बता दूं कि तहलका शायद भारत में अकेली ऐसी कंपनी होगी जिसके खिलाफ तीन सीबीआई केस चल रहे हैं. ये तीनों केस एनडीए सरकार के वक्त दर्ज किए गए थे और यूपीए के सत्ता में आने के बाद भी जारी हैं. हमें जमानत लेने के लिए नियमित रूप से कोर्ट के चक्कर काटने पड़ते हैं.
-हमारे पास कभी भी काले धन की एक पाई तक नहीं रही. अगर ऐसा होता तो हर घड़ी हमारे पीछे लगी रही एजेंसियां हमें कब का जेल में ठूंस देतीं. आखिर में ऐसा वक्त आया जब इस कंपनी में काम करने वाले लोग 120 से घटकर सिर्फ चार रह गए. साउथ एक्सटेंशन के पीछे एक किराए के कमरे में हमारा ऑफिस चल रहा था. कानूनी और जिंदगी के तमाम पचड़ों से लड़ने के लिए हम पर दसियों लाख रुपये उधार चढ़ चुके थे जो हम अब तक चुका रहे हैं.
गंभीर आरोप लगने पर चिल्लाचोट की रणनीति भले ही चतुर लेकिन निंदनीय राजनीतिक दांव हो लेकिन भारतीय संभ्रांत वर्ग की साजिश ढूंढने का शगल समझ से परे है. इससे केवल खुद के बारे में सोचने वाली संस्कृति की बू आती है जहां कोई जनहित कोई मकसद ही नहीं होता.
-और हां, अंडरवर्ल्ड को झटका देने वाले क्रिकेट मैच फिक्सिंग के खुलासे के बावजूद हमसे से कोई दाऊद इब्राहिम या किसी और भाई से कभी नहीं मिला था.
मेरे पिता को तो छोड़िये मैं भी उस समय तक अर्जुन सिंह से कभी नहीं मिला था. कांट्रेक्टर होने की बजाय मेरे पिता की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा भारतीय सेना में गुजरा था. इस दौरान उन्होंने 1965 और 1971 में पाकिस्तान से हुए दोनों युद्ध भी लड़े. फिर भी मोदी ने सार्वजनिक मंच पर ये और ऐसे दूसरे कई सफेद झूठ बोलने से पहले कुछ नहीं सोचा और सेंसेक्स से भी ज्यादा चकरायमान मीडिया ने इसके पीछे के सच को बाहर लाने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं समझी.
झूठ के पीछे के सच को अगर बाहर न लाया जाए तो झूठ खतरनाक आकार ले लेता है. सच्चाई का चेहरा विकृत हो जाता है और अराजकता घर करने लगती है. पुरानी कहावत है कि झूठ को अगर लगातार और कई तरीकों से फैलाया जाता है तो वह सच बन जाता है या फ़िर कम से कम सच को डुबो तो देता ही है. इसका उदाहरण तब देखने को मिला जब 1984 में सिक्खों की गर्दनें तलवारों पर रखी गईं. और हमने ऐसा होते 2002 में भी देखा जब गुजरात को दूषित भावनाओं के साथ गलत जानकारी की आड़ में आग के हवाले कर दिया गया. कुछ मौकों पर मीडिया ने सच की पड़ताल कर उसे दिखाया भी. लेकिन तब तक सच का महत्व ही खत्म हो चुका था. सच से बेनकाब होते लोगों की रणनीति इतना शोर मचाने की थी कि उसमें सब कुछ डूब जाए—अच्छा, बुरा, सच, झूठ सब कुछ. हमारी इस तहकीकात पर उनका शोर है कि आपने गोधरा के बारे में तो कुछ कहा ही नहीं. जबकि सच ये है कि इस अंक के 30 पन्ने गोधरा की तहकीकात को ही समर्पित हैं.
गंभीर आरोप लगने पर चिल्लाचोट की रणनीति भले ही चतुर लेकिन निंदनीय राजनीतिक दांव हो लेकिन भारतीय संभ्रांत वर्ग की साजिश ढूंढने का शगल समझ से परे है. इससे केवल खुद के बारे में सोचने वाली संस्कृति की बू आती है जहां कोई जनहित कोई मकसद ही नहीं होता. पिछले कुछ सालों में मुझे कई बार ये अजीब और कड़वा अनुभव हुआ है जब लोगों को मैंने मेधा पाटकर और अरुंधती रॉय जैसे जनता के लिए लड़ने वाले लोगों पर पैसे के लिए काम करने का आरोप लगाते देखा है. किसी की राय से सहमत न होना अलग बात है. लेकिन खुद ही ये मान लेना कि आम लोगों के मुद्दों को उठाने वाले लोग भष्ट्र हैं, हमारे बारे में कई गंभीर पहलुओं की पोल खोलता है. इस विकृति का कुछ लेना-देना हमारी गुलामी के समय से भी है--वह दौर जब हम ईर्ष्या, चालाकी, साजिश, चुगली या धोखा, किसी भी तरह से गोरे मालिकों को खुश करने के लिए बैचैन रहते थे.
इस बार जब हमने 2002 के गुजरात नरसंहार के पीछे छिपे सच का खुलासा किया तो साजिश ढूंढने वालों ने नई ऊंचाइयां नाप लीं. बीजेपी ने हम पर कांग्रेस के लिए काम करने का आरोप लगाते हुए हमला किया. उधर, कांग्रेस का कहना था कि हम बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं. इससे साफ था कि हम किसी सही काम को ही अंजाम दे रहे थे. इस सबके बीच भारत के विचार के लिए लड़ने का काम लालू यादव, मायावती और वामदलों पर छोड़ दिया गया. हालांकि आदर्श भारत का ये विचार कभी कांग्रेस के पुरोधाओं द्वारा रचा गया था लेकिन आज की कांग्रेस से जुड़े दिग्गज शायद इसका मतलब भी भूल चुके हैं.
अगर सीआईआई को थोड़ी भी बदहजमी हो जाए तो प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर देता है. और अगर इस बदहजमी पर वह एक सेमिनार भी करना चाहे तो प्रधानमंत्री उसमें मुख्य वक्ता के रूप में फौरन पहुंच जाते हैं.
ये भी अपने आप में असाधारण बात है कि गुजरात नरसंहार के खुलासे को कई दिन होने को आए लेकिन अब तक इस पर न तो प्रधानमंत्री ने ही कोई बयान दिया और न ही गृहमंत्री ने. पत्रकारिता के इतिहास में पहली बार सामूहिक हत्याकांड करने वाले कैमरे पर खुद बता रहे थे कि उन्होंने कैसे मारा, क्यों मारा और किसकी इजाजत से मारा. ये कोई छोटे-मोटे अपराधी नहीं थे. ये विचारधारा में अंधे वे उन्मादी लोग थे जो उस खतरनाक दरार की सच्चाई का खुलासा कर रहे थे जिसमें इस देश के टुकड़े करने की क्षमता है. लेकिन रेसकोर्स रोड में बैठे भद्रजनों के लिए ये काफी नहीं था. अगर सीआईआई को थोड़ी भी बदहजमी हो जाए तो प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर देता है. और अगर इस बदहजमी पर वह एक सेमिनार भी करना चाहे तो प्रधानमंत्री उसमें मुख्य वक्ता के रूप में फौरन पहुंच जाते हैं.
प्रधानमंत्री को भी कोसने का क्या फायदा. उनके पास जिम्मेदारी तो है पर शक्तियां नहीं. बेईमानी के पहाड़ की चोटी पर बैठा ईमानदार व्यक्ति. कांग्रेस के उन बड़े रणनीतिकारों पर नजर डालते हैं जो खुद तो कोई चुनाव नहीं जीत सकते मगर कईयों को चुनाव जितवाने के रहस्य जानते हैं. उनके हिसाब से देखा जाए तो हत्याओं और बलात्कारों में मोदी की भूमिका का पर्दाफाश इस तरह से डिजाइन किया गया था कि गुजराती हिंदू को ये यकीन हो जाए कि मोदी ही उनके लिए आदर्श नेतृत्व हैं. उन्हें यह नहीं सूझा कि हिंसा के इन सबूतों को वे मोदी के खिलाफ एक हिला देने वाली सार्थक बहस शुरू करने के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
वास्तविकता ये है कि कांग्रेस को आज कुछ ऐसे छुटभैये रणनीतिकार चला रहे हैं जो ये भूल चुके हैं कि सही कदम उठाना क्या होता है. उनके पास न तो इतिहास के अनुभवों का प्रकाश है और न ही भविष्य के लिए दृष्टि. वे यह देख पाने में असमर्थ हैं कि एक जमाने में महान विभूतियों ने धर्म, जाति, भाषा, नस्ल आदि जैसी खाइयों को पाटते हुए इस देश के विचार को शक्ल दी थी. मूर्खतापूर्ण तरीके से वे अब इन्हीं दरारों को फिर से उभार रहे हैं. वे उन संकटों को देख पाने में असमर्थ हैं जो इसके परिणामस्वरूप सामने आएंगे. उन्हें ये नहीं पता कि राजनीति में नैतिकता को हथियार कैसे बनाया जा सकता है और उनमें नैतिकता के रास्ते पर चलने की हिम्मत भी नहीं है. ये लोग और कुछ नहीं ज्यादा से ज्यादा बस चुनावों में वोटों की तिकड़म भिड़ाने वाले एकाउंटेंट हैं जो चुनावी लाभ और हानि के बीच झूला झूलते रहते हैं.
आज की कांग्रेस उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्र में निष्ठा रखने वाले उस भारतीय को निराश करती है जिसे भारत की आत्मा की रक्षा करने को एक राजनीतिक छाते की आवश्यकता है. सही बातें न कहकर, सही कदम न उठाकर ये उस उदार भारतीय को कमजोर करती है जिसकी विवादों में कोई रुचि नहीं और जो अपनी अच्छाई की स्वीकृति चाहता है. इससे पैदा हुए खाली स्थान पर जहरीली और विकृत विचारधाराएं काबिज हो जाती हैं.
और ये सब तब हो रहा है जब भारतीय कुलीन वर्ग ऐसा व्यवहार कर रहा है जैसा कि 1920 में चमक-दमक और शैंपेन की खुमारी में डूबा अमेरिकी कुलीन वर्ग किया करता था जबकि पैरों के नीचे की जमीन बड़ी तेज़ी से दरकती जा रही है. ताजा आंकड़े बताते हैं कि पांच मुख्य राज्यों में गरीबी से बदहाल लोगों की संख्या बढ़ रही है. भारत के 30 फीसदी जिलों में घनघोर दरिद्रता से उठता नक्सलवाद बढ़ता रहा है. आखिर कब तक आकंठ पैसे में डूबे हुए और भूख से मर रहे लोग बगैर टकराव के साथ-साथ रह सकते हैं. सच्चाई ये है कि भारत को सिर्फ आर्थिक सुधारों की नहीं बल्कि राजनीतिक दूरदृष्टि की भी जरूरत है जिसका कहीं अता-पता नहीं. गुजरात के प्रति हमारी बेपरवाही बताती है कि दुनिया के इस सबसे जटिल लोकतंत्र के सामने अब तक की सबसे पेचीदा चुनौती मुंह बाए खड़ी है.
तरुण तेजपाल
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'स्पेलिंग चैम्पियनशिप' में भारतीय दबदबा

Marwar News!
भारतीय मूल के कृष्ण मिश्र और अल्का मिश्र पिछले सात वर्षो से अपने बच्चों को अमरीका में होने वाली वर्तनी प्रतियोगिता- 'नेशनल स्पेलिंग बी' में भाग लेने के लिए इंडियाना से वाशिंगटन डीसी ले जाते रहे हैं.
वे दिल्ली से 15 वर्ष पहले अमरीका आए थे. इस बार उनके पुत्र 13 वर्षीय समीर ने इस प्रतियोगिता में पहला स्थान जीतकर उनका सपना पूरा कर दिया है. .
समीर को 40 हज़ार डॉलर यानी क़रीब 16 लाख रुपए से भी ज़्यादा की राशि पुरस्कार में मिली है.
सबसे पहले उनकी बड़ी पुत्री श्रुति ने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था.
अमरीका में यह प्रतियोगिता काफ़ी लोकप्रिय है. इसके लिए बच्चे महीनों तैयारी करते हैं. प्रतियोगिता के राष्ट्रीय स्तर के फ़ाइनल में पहुँचने से पहले उन्हें स्थानीय और प्रांतीय स्तर पर जीत हासिल करनी पड़ती है.
समीर ने 'guerdon' शब्द की सही स्पेलिंग बता कर यह प्रतियोगिता जीती है. इस बहुत कम प्रचलित शब्द का मतलब पुरस्कार होता है.
लाल कालीन पर चलना आपको एक सेलिब्रिटी होने का एहसास देता है. मेरी पत्नी चाहती थी कि समीर भी सेलिब्रिटी की तरह लाल कालीन पर ले चले

कृष्ण मिश्र, समीर के पिता
इस वर्ष दक्षिण एशिया के बच्चे इस प्रतियोगिता में छाए रहे. दूसरे स्थान पर इस प्रतियोगिता में मिशीगन के 12 वर्ष के सिद्धार्थ चांद रहे जबकि कैनसस की काव्या शिवशंकर को चौथा और पेन्सिलवेनिया की जाह्नवी अय्यर को आठवाँ स्थान मिला.
लगन और इच्छाशक्ति
समीर को परिवार का पूरा सहयोग मिला
न्यूयॉर्क में रहने वाले आठ वर्षीय श्रीराम हथवार ने इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाले सबसे कम उम्र का प्रत्याशी बनकर सबको चौंका दिया.
स्पेलिंग प्रतियोगिता में भारतीय परिवार के बच्चों के वर्चस्व की असली वजह उनका पारिवारिक माहौल है.
वर्ष 1985 में 'स्पेलिंग बी' प्रतियोगिता में जीतने वाले और इस वर्ष के निर्णायकों में से एक, डॉक्टर बालू नटराजन का कहना है कि जो बात सभी जीतने वाले प्रतियोगियों में दिखती है वह है उनका इस प्रतियोगिता के प्रति लगन और परिवार का सहयोग.
वे कहते हैं, "यह ऐसी प्रतियोगिता नहीं है जिसे बच्चे सिर्फ़ अपनी प्रतिभा के बूते जीत लें. मुझे लगता है कि दक्षिण एशियाई परिवारों की इच्छा और सहयोग काफ़ी मायने रखता है."
कृष्ण मिश्र कहते हैं कि 'स्पेलिंग बी' प्रतियोगिता उनके बच्चों के लिए एक अच्छा शैक्षणिक अनुभव रहा है और इससे बेहतरीन अंग्रेजी सीखने में भी मदद मिलती है.
वे हँसते हुए कहते हैं, "लाल कालीन पर चलना आपको एक सेलिब्रिटी होने का एहसास देता है. मेरी पत्नी चाहती थी कि समीर भी सेलिब्रिटी की तरह लाल कालीन पर ले चले."
समीर कहते हैं कि उन्होंने इस प्रतियोगिता के लिए काफ़ी मेहनत किया था. वे कहते हैं, "मैंने सीखा कि कैसे लगातार मेहनत किया जाए और उसे बरकरार रखा जाए."
वर्तनी प्रतियोगिता में दक्षिण एशिया मूल के लोगों की सफलता को देख कर न्यू जर्सी के राहुल वालिया 'दक्षिण एशिया स्पेलिंग बी' प्रतियोगिता का आयोजन कर रहे हैं.
वे कहते हैं इन प्रतियोगिताओं से बच्चों के अंदर विश्वास बढ़ेगा और उनकी प्रतिभा निखरेगी.

Tuesday, June 17, 2008

मारे गए पत्रकारों की स्मृति में स्मारक

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने लंदन में एक स्मारक का अनावरण किया. यह उन पत्रकारों की याद में तैयार किया गया है जो रिपोर्टिंग करते मारे गए.
'ब्रीदिंग' नाम का यह स्मारक बीबीसी के मुख्यालय ब्रॉडकास्टिंग हाउस की छत पर स्थापित किया गया है.
यह एक रोशनी का एक स्तंभ है जिसकी ऊँचाई 32 फ़ुट है. इसका प्रकाश रात को आकाश में एक किलोमीटर तक चमकेगा.
हर रात आधा घंटे यह उस समय रौशन होगी जब बीबीसी का प्रमुख समाचार बुलैटिन प्रसारित होता है. यानी रात दस बजे.
यह स्मारक उन सभी पत्रकारों और उनके साथ काम करने वाले लोगों को समर्पित है, जो अपना काम करते हुए मारे गए, इनमें ड्राइवर हैं और अनुवादक भी.
पिछले दस सालों में औसतन हर हफ़्ते दो ऐसे पत्रकार मारे गए हैं जो युद्ध की रिपोर्टिंग करते हैं, कई अन्य पत्रकार भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग करते हुए मारे गए हैं.
श्रद्धांजलि
संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने उन पत्रकारों को श्रद्धांजलि अर्पित की है जो रिपोर्टिंग करते हुए मारे गए.
बीबीसी के पत्रकार अब्दुल रोहानी और नासेह दाहिर फ़राह की मौत हाल ही में हुई है
बान की मून ने कहा, "यह स्मारक उन लोगों की याद में खड़ा किया गया है जिन्होने अपनी जान गवाँ दी जिससे हम तक ख़बर पहुंच सके. लेकिन यह उन पत्रकारों के लिए भी है जो इस समय ख़तरों का सामना कर रहे हैं और रिपोर्टें भेजने के लिए अपनी जान को जोख़िम में डाल रहे हैं."
इस स्मारक के अनावरण के अवसर पर बीबीसी के महानिदेशक मार्क टॉमसन ने कहा कि समाचार जुटाने का काम दिन पर दिन ख़तरनाक होता जा रहा है. पिछले दस सालों में औसतन हर सप्ताह दो पत्रकार मारे जाते रहे हैं और 90 प्रतिशत मामलों में किसी पर मुक़दमा नहीं चला है.
अनावरण समारोह में उन पत्रकारों के परिजन भी आए थे जो या तो मारे गए या जिनकी हत्या हुई.
इनमें बीबीसी की प्रोड्यूसर केट पेटन के परिवार वाले थे जो 2005 में सोमालिया में मारी गई थीं और कैमरामैन साइमन कम्बर्स के सगे संबंधी भी जो सउदी अरब में मारे गए थे.
इस अवसर पर बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार जॉन सिम्पसन जो वर्ष 2003 में स्वयं एक अमरीकी मिसाइल हमले में मरते-मरते बचे थे उन्होंने जेम्स फ़ैंटन की एक कविता पढ़कर सुनाई.
पूर्व युद्ध रिपोर्टर और कवि जेम्स फ़ैंटन ने यह कविता विशेष तौर पर बीबीसी के लिए लिखी है.

Monday, June 9, 2008

ये ब्लॉग सिर्फ बेटियों के लिए है

Tuesday, April 01, 2008 05:38 [IST]
नई दिल्ली तकनीकी क्रांति के युग में नेट यूजर्स की संख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है। ब्लॉगिंग कल्चर इन दिनों सर्वाधिक लोकप्रिय है। अब एक ऐसा ब्लॉग आया है जो सिर्फ लड़कियों के लिए ही है। ‘बेटियों का ब्लॉग’ एक ऐसा ही ब्लॉग है, जिसमें माता-पिता अपनी बेटियों के बारे में बातें लिखते हैं।
यह एक सामुदायिक ब्लॉग है। जिसमें एक ही छत के नीचे कई ब्लॉगर माता-पिता इकट्ठा होकर अपनी बेटियों के बारे में बातें लिखते हैं। फिलहाल इस ब्लॉग के ग्यारह सदस्य हैं। इस ब्लॉग को शुरू करने वाले अविनाश दास ने अपने पहले पोस्ट में लिखा, ‘‘ये ब्लॉग बेटियों के लिए है। हम सब, जो सिर्फ बेटियों के बाप होना चाहते थे, ये ब्लॉग उनकी तरफ से बेटियों की शरारतें, बातें साझा करने के लिए है।’’
उन्होंने अपने इस पोस्ट का टाइटल रखा- ‘आइए बेटियों के बारे में बात करें।’ इस ब्लॉग पर लिखने वाले सभी ब्लॉगर अपनी बेटियों के बारे में सामान्य, लेकिन रोचक रिपोर्ट प्रकाशित कर रहे हैं। इसमें शामिल एक ब्लॉगर जितेन्द्र चौधरी का कहना है कि इसमें बेटियों के रोचक क्रियाकलापों को भी शामिल किया जाएगा। वहीं रविश कुमार ने ‘बाबा तुम बांग्ला बोलो तो’ में काफी रोचक अंदाज में बताते हैं कि चार साल की बेटी ‘तिन्नी’ उन्हें किस प्रकार बंगाली भाषा का ज्ञान दे रही हैं।
एक ब्लॉगर पुनीता ने ‘क्या बेटियां पराई होती हंै’ के शीर्षक से अपनी बात कहने की कोशिश की है। शादी के बाद पिता के साथ एक भेंट को उन्होंने काफी अलग अंदाज में बयां किया है।

ओबामा के लकी हनुमान

Monday, June 09, 2008 15:30 [IST]
न्यूयॉर्क. बात है तो अजीब लेकिन सच है! अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए संभावित डेमोक्रेटिक उम्मीदवार बैरेक ओबामा व्हाइट हाउस की जंग जीतने के लिए हिंदू भगवान हनुमान का आशीर्वाद ले रहे हैं।
डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से उम्मीदवारी हासिल करने के लिए 17 महीने की जद्दोजहद के बाद हिलेरी क्लिंटन को मात देने वाले ओबामा खुशकिस्मती के लिए अपने साथ छोटे से हनुमान को साथ लेकर चलते हैं।
टाइम्स के व्हाइट हाउस फोटो ऑफ द डे में प्रकाशित एक फोटो में पहली बार अश्वेत अमेरिकी प्रत्याशी का हुनमान प्रेम सामने आया है। ओबामा के पास एक ब्रेसलेट है जिसमें इराक में तैनात एक अमेरिकी सैनिक की यादें हैं, एक जुआरी की लकी चिट, एक छोटा सा वानर भगवान और छोटी सी मैडोना व एक बच्चे की आकृति है।
इस ब्रेसलेट में जो छोटे से वानर भगवान की आकृति है, वह बेशक हिंदू भगवान हनुमान की तरह ही है। प्रकाशित फोटो के साथ भी यह बात लिखी गई है लेकिन फोटोग्राफर ने इसकी पहचान का जिक्र नहीं किया है। केन्याई पिता और कैंसासी माता की संतान ओबामा ने अपना शुरुआती जीवन इंडोनेशिया में बिताया था जहां हिंदू धर्म काफी प्रचारित है।
लकी फैक्टर :इस फोटो के कैप्शन में यह भी लिखा गया है कि रिपब्लिक पार्टी के उम्मीदवार जॉन मैक्केन भी भाग्य में विश्वास करते हुए अपने लकी फैक्टर के रूप में अपनी कलाई पर एक रबर बैंड और एक निकेल बांधते हैं। एक स्वेटर और हैंपशायर में एक होटल रूम को भी वे लकी करार देते हैं।
दूसरी तरफ, हिलेरी क्लिंटन अपने लकी फैक्टर के रूप में अवाम द्वारा दिए गए तोहफों को तरजीह देती हैं। उनके प्रवक्ता के मुताबिक उन्हें टैक्सास में एक महिला ने एक लकी सिक्का व एक रूमाल दिया जिसे वे अक्सर अपनी जेब में रखे रहती हैं। इसी तरह ओहियो में एक महिला द्वारा दिए गए ब्रेसलेट को भी वे हमेशा पहने रहती हैं।

Sunday, June 8, 2008

अपहृत बीबीसी संवाददाता की हत्या

अफ़ग़ानिस्तान में बीबीसी के एक युवा संवाददाता की दक्षिणी हेलमंद प्रांत में गोली मारकर हत्या कर दी गई है.
अब्दुल समद रोहानी का शनिवार को अपहरण कर लिया गया था और रविवार को लश्कर गाह नाम के स्थान पर उनकी लाश पाई गई है.
बीबीसी ने रोहानी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा, "रोहानी की हिम्मत और लगन अफ़ग़ानिस्तान में बीबीसी की रिपोर्टिंग का अहम हिस्सा रही है."
रोहानी बीबीसी के काबुल स्थित ब्यूरो ऑफ़िस के लिए काम करते थे और बीबीसी की पश्तो सेवा के हेलमंद संवाददाता थे.
हेलमंद प्रांत में पिछले कुछ समय से तालेबान के छापामार लगातार हमले कर रहे हैं.
बीबीसी की ओर से जारी बयान में कहा गया है, "रोहानी और उनके साथियों की साहसिक रिपोर्टिंग की ही बदौलत बीबीसी अफ़ग़ानिस्तान का सच दुनिया के सामने ला पाती है."
इस बयान में कहा गया है, "उनकी मौत से हमें एक भारी सदमा लगा है और इस दुखद घड़ी में हमारी संवेदना उनके परिवार के साथ है."
इस वर्ष अफ़ग़ानिस्तान में पत्रकारों पर कई हमले हुए हैं, पिछले वर्ष भी अफ़ग़ानिस्तान में पाँच पत्रकार मारे गए थे.
यह सप्ताहांत बीबीसी के लिए ख़ासा बुरा रहा, इससे पहले सोमालिया में किसमायो में पत्रकार नश्ते दहीर की हत्या कर दी गई, दहीर बीबीसी और समाचार एजेंसी एपी के लिए रिपोर्टिंग किया करते थे.

Gmail - इनबॉक्स

‘हनुमान’ है इंजीनियरिंग कालेज के अध्यक्ष

06 जून 2008 आईबीएन-7 लखनऊ (उत्तर प्रदेश)। लखनऊ के एक तकनीकि संस्थान में एक मजेदार वाक्या सामने आया है। लखनऊ के ‘सरदार भगत सिंह टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट’ के चेयरमैन के पद पर बजरंगबली को बिठाया गया है और यह फैसला इसके ट्रस्टियों ने लिया है।दरअसल, ट्रस्टियों के बीच चेयरमैन के पद को लेकर आपस में किसी तरह का समझौता नहीं हो पा रहा था। इसीलिए यहां के ट्रस्टियों ने अपने आराध्य देव हनुमान को ही इस महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी सौंप दी। अब इस कालेज की पूरी जिम्मेदारी हनुमान जी की देख-रेख में हो रही है।मजे की बात तो यह है कि इस कालेज में चेयरमैन का एक बड़ा कमरा है। कमरे के बाहर हनुमान जी के नाम का बोर्ड लगा हुआ है और चेयरमैन की कुर्सी पर हनुमान जी की प्रतिमा को बिठा दिया गया है। ट्रस्टियों ने चेयरमैन की सहायता के लिए एक वाइस-चेयरमैन (उपाध्यक्ष) भी नियुक्त किया है।उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी है कि वो सुबह कालेज के चेयरमैन हनुमान जी के कमरे में जाकर उनका दर्शन करें और उसके बाद अपने काम की शुरुआत करें। ‘सरदार भगत सिंह टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट’ के ट्रस्टी पंकज सिंह भदौरिया का कहना है कि, “हनुमान जी में हमारी अटूट श्रद्धा रही है, हम जो भी काम करते हैं उसकी शुरुआत हनुमान जी से ही करते हैं। इसलिए हम लोगों ने हनुमान जी को ही ये जिम्मेदारी सौंप दी।”ट्रस्टियों का यह तर्क भी है कि “हनुमान जी हर तरह का ज्ञान रखते हैं। इसलिए उनके लिए ये जिम्मेदारी तो बहुत ही छोटी है। लंकापति रावण के साथ हुए युद्ध में भगवान राम ने युद्ध के प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी हनुमान जी को ही दी थी। इसलिए हम लोगों ने उन्हें ये जिम्मेदारी सौंपी है।”वहीं, कालेज से जुड़े लोगों का मानना है कि जब से हनुमान जी ने इस कालेज के चेयरमैन पद की जिम्मेदारी संभाली है, कालेज में काफी सुधार देखने को मिल रहा है।

http://www.josh18.com/showvideo.php?id=220531

कम्प्यूटर से चलती पान की दुकान

7 जून 2008इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
इंदौर। अभी तक आपने हजारों पान की दुकानें देखी होंगी मगर आज हम एक ऐसी पान की दुकान के बारे में आपको बताने जा रहे है जो औरों से अलग है। इसकी खासियत यह है कि यहां आपको सिर्फ एक बार अपना मीनू बताना पड़ता है क्योंकि यह पान की दुकान अत्याधुनिक है। दोबारा आने पर आपको मीनू नहीं अपना नाम बताना होता है और आपकी पसंद का पान हाजिर हो जाता है।इंदौर के बड़ा गणपति चौराहे पर स्थित ‘अप्सरा पान शॉप’ औरों से अलग है। इस दुकान में अन्य पान की दुकानों की तरह चमक-दमक तो है ही साथ ही ग्राहकों का ब्यौरा दर्ज करने के लिए कम्प्यूटर भी लगा है।यहां जो भी पान के शौकीन आते हैं उन्हें सिर्फ एक बार ही आपना मसाला बताना पड़ता है। दुकान के संचालक राम कृष्ण वर्मा बताते हैं उनके यहां जो ग्राहक आता है उसका मसाला कम्प्यूटर में दर्ज कर दिया जाता है साथ ही उसे एक ‘ग्राहक नम्बर’ भी दिया जाता है।पढ़ें
: ताज को वोट दें और मुफ्त में पान खाएं अगली दफा जब वही ग्राहक पुन: दुकान पर पहुंचता है तो उसे सिर्फ अपना नाम और ‘ग्राहक नम्बर’ बताना होता है और कुछ ही देर में उसकी पसंद का पान हाजिर हो जाता है। इससे राम कृष्ण को तो लाभ हो ही रहा है साथ में ग्राहकों का भी समय बच जाता है।राम कृष्ण बताते कि उनके नियमित ग्राहक अपने घर अथवा दफ्तर से निकलने से पहले ही फोन करके अपना ग्राहक नम्बर बता देते हैं और उन्हें आते ही पान तैयार मिल जाता है। इतना ही नहीं घर और दफ्तर तक उन्होंने पान भेजने की भी व्यवस्था कर रखी है। इसके लिए उनकी दुकान पर 40 कर्मचारियों को रखा गया है।राम कृष्ण की दुकान का पान खाने वाले देश और विदेश में भी है। उन तक भी पान पहुंचाने का इंतजाम उनके पास है। राम कृष्ण के कम्प्यूटर में 4,000 से अधिक ग्राहकों के रिकॉर्ड दर्ज हैं, जिसकी पसंद कम्प्यूटर बता देता है।वे जल्दी ही ऑनलाइन सुविधा शुरू करने वाले हैं।

Saturday, June 7, 2008

जालौरः पंकज मुनि की अनोखी तपस्या

07 जून 2008 आईबीएन-7जालौर(राजस्थान)। तपती दुपहरी और आग के बीच भी इस समय एक साधु परमात्मा का सच जानने के लिए साधना कर रहे हैं। ये साधना जालौर के मालवाड़ गांव में हो रही है। साधना में लीन होनेवाले इस साधु का नाम पंकज मुनि है। पंकज मुनि की ये साधना कुल 41 दिनों तक चलेगी।अपनी इस साधना के बारे में खुद पंकज मुनि बताते हैं कि, “मेरी ये साधना अंधविश्वास से छुटकारा और भगवान की तलाश के लिए है।”पंकज मुनि इस समय खुले आसमान में रेगिस्तान की तपती गर्मी के बीच चारों तरफ जलते हुए उपलों के बीच में बैठकर अपनी साधना में मग्न हैं। इस अग्निसाधक के दर्शन के लिए यहां आस-पास के काफी लोग आने लगे हैं। पंकज मुनि दिन के 11 बजे से शाम 5 बजे तक ये साधना कर हैं। वैसे तो पंकज मुनि की चमड़ी अब झुलसने लगी है, लेकिन उनकी साधना पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है।उनकी ये साधना को देखकर यहां के लोग अब पंकज मुनि को भगवान शिव का अवतार मानने लगे हैं। उनका आर्शीवाद लेने के लिए हजारों की संख्या में लोग साधना स्थल पर जुटने लगे हैं। साधना स्थल से उठने के बाद रोज शाम पांच बजे पंकज मुनि भक्तों को प्रवचन देते हैं।

Friday, June 6, 2008

उमर अब्दुल्लाह नज़र आएंगे फ़िल्म में

जुलाई में भारत के सिनेमाघरों में एक फ़िल्म दिखाई जाएगी जिसका नाम है - मिशन इस्तांबूल. आप समझ सकते हैं कि इसमें ख़ास क्या बात है, हर महीने बहुत सी फ़िल्में सिनेमाघरों में दिखाई जाती हैं.
ख़ास बात ये है कि इस फ़िल्म में भारत प्रशासित कश्मीर के नेता उमर अब्दुल्लाह भी नज़र आएंगे. उमर अब्दुल्लाह नेशनल कान्फ्रेंस के मौजूदा अध्यक्ष हैं.
वह पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्लाह के बेटे और कश्मीर में एक बड़ा नाम माने जाने वाले शेख़ अब्दुल्लाह के पोते हैं. उमर अब्दुल्लाह केंद्र में मंत्री भी रह चुके हैं.
मिशन कश्मीर की ही तरह मिशन इस्तांबूल भी आतंकवाद के बारे में एक फ़िल्म है. मिशन इस्तांबूल में ख़ुद उमर अब्दुल्लाह एक विशेष भूमिका में नज़र आते हैं.
यह भूमिका कोई अभिनय की तो नहीं है मगर फ़िल्म में अभिनेत्री ने कश्मीर की स्थिति और मीडिया की भूमिका के बारे में उमर अब्दुल्लाह का इंटरव्यू किया है.
उमर अब्दुल्लाह इस इंटरव्यू में कश्मीर की स्थिति के बारे में मीडिया की भूमिका की आलोचना करते नज़र आते हैं, "कश्मीर में अच्छी बातों को मीडिया ख़बरें नहीं बनाता है. जब तक कोई बम धमाका ना हो, कोई मारा ना जाए, तब तक यहाँ कोई ख़बर नहीं बनती है."
उमर अब्दुल्लाह कहते हैं, "कश्मीर में इतनी सारी अच्छी बातें हो रही हैं मसलन, बहुत से सैलानी आ रहे हैं, लेकिन यह सबकुछ मीडिया में उस तरह से जगह नहीं पाता है जैसा कि हिंसक घटनाओं को ख़ूब ज़ोरशोर से रिपोर्ट किया जाता है."
'राजनीति से फ़िल्में'
अलबत्ता उमर अब्दुल्लाह ये डायलॉग स्क्रिप्ट से बोलते हैं लेकिन उनका कहना है कि जो कुछ भी उन्होंने इस फ़िल्म में कहा है वह उनका ख़ुद का अनुभव भी है.
एक ही बात कई बार...
वह जो ख़ुद समझते और सोचते हैं वही बोलते हैं लेकिन फ़िल्म में उन्होंने यह बात स्क्रिप्ट देखकर कही है और वो भी अलग-अलग अंदाज़ से. एक ही बात को कई बार कहना पड़ा.

उमर अब्दुल्लाह
हालाँकि पटकथा को देखकर डॉयलॉग बोलते हुए उन्हें कुछ अटपटा लगा और उनका कहना है, "वह जो ख़ुद समझते और सोचते हैं वही बोलते हैं लेकिन फ़िल्म में उन्होंने यह बात स्क्रिप्ट देखकर कही है और वो भी अलग-अलग अंदाज़ से. एक ही बात को कई बार कहना पड़ा."
उमर अब्दुल्लाह ने बताया कि उन्हें क़रीब एक सप्ताह पहले स्क्रिप्ट दे दी गई थी और उसे ज़ुबानी याद करने के लिए कहा गया था.
उमर अब्दुल्लाह के लिए मीडिया को इंटरव्यू देना एक आम बात है लेकिन फ़िल्म में यह इंटरव्यू देने के लिए उन्हें कुछ रीटेक करने पड़े यानी एक ही दृश्य को कई बार दोहराना पड़ा.
उमर अब्दुल्लाह को उस अभिनेत्री का नाम तो याद नहीं है जिन्होंने फ़िल्म में उनका इंटरव्यू किया है लेकिन फ़िल्म में विवेक ओबेरॉय और ज़ायद ख़ान जैसे अभिनेताओं ने काम किया है.
उमर अब्दुल्लाह का इंटरव्यू इस फ़िल्म में राजस्थान की राजधानी जयपुर के एक बाग में दर्शाया गया है. हालाँकि उमर अब्दुल्लाह ने यह फ़रमाइश रखी थी कि यह इंटरव्यू कश्मीर में उनके घर में होना चाहिए था लेकिन इतनी बड़ी फ़िल्म यूनिट को वहाँ नहीं ले जाया जा सकता था.
उमर कहते हैं कि उन्होंने अपने स्कूल के एक साथी की गुज़ारिश पर इस फ़िल्म में यह इंटरव्यू दिया है, वैसे उनका राजनीति छोड़कर फ़िल्मी दुनिया में जाने का कोई इरादा नहीं है.

Tuesday, June 3, 2008

गंजेपन का इलाज़ हो सकता है आसान

जो लोग गंजेपन से परेशान हैं उनके लिए एक अच्छी ख़बर है. आरंभिक जाँच में यह बात सामने आई है कि प्रयोगशालाओं में विकसित बालों की कोशिकाओँ के ज़रिए गंजेपन का इलाज़ संभव है.
इस तकनीक में आदमी के सिर के बचे बालों की कुछ कोशिकाओं को लेकर उसे प्रयोगशाला में कई गुणा बढ़ाया जाता है और फिर उसे सिर के उन हिस्सों मे प्रतिरोपित किया जाता है जहाँ बाल झड़ चुके होते हैं.
ब्रिटेन के शोधार्थियों का कहना है कि छह महीने के इस इलाज के बाद 19 में से 11 लोगों के सिर में नए बाल उग आए.
हालाँकि ब्रिटेन के एक विशेषज्ञ का कहना है कि इस प्रयोग में अभी और काम बाकी है जिससे नए बाल अच्छे नज़र आएँ.
आदमी में गंजापन अर्थात बालों का झड़ना (एंड्रोजेनेटिक एलोपेसिया) एक आनुवांशिक बीमारी है. पचास वर्ष की आयु के बाद क़रीब चालीस प्रतिशत लोग दुनिया में गंजेपन से पीड़ित हैं.
नई विधि
बालों के प्रतिरोपण की अभी जो विधि अपनाई जाती है उसमें सिर के बचे हुए बालों के बड़े गुच्छों को एनेस्थीज़िया यानी चेतनाशून्य करने वाली दवा की सहायता से मनचाहे हिस्सों में प्रतिरोपित कर दिया जाता है.
मुझे लगता है कि इससे बालों की देख भाल में क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाएगा. जैसे ही लोगों को पता लगेगा कि वे गंजे हो रहे हैं वे इस विधि को अपना सकते हैं

कंपनी के वैज्ञानिक, डॉक्टर पॉल केंप
इस विधि की पूरी सफलता सिर के बचे हुए बालों पर निर्भर करती है. इसमें कोई नए बाल नहीं उगाए जा सकते हैं.
इस नई विधि को तैयार करने वाली ब्रिटेन की कंपनी इंटरसाइटेक्स का कहना है कि इसके सहारे प्रतिरोपण के लिए बालों की असंख्य कोशिकाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं.
कंपनी का कहना है कि यदि अन्य जाँच भी सफ़ल रहे तो पाँच वर्षों में इस तकनीक को बाज़ार में लाया जा सकता है.
कंपनी के वैज्ञानिक डॉक्टर पॉल केंप ने कहा, "मुझे लगता है कि इससे बालों की देख भाल में क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाएगा. जैसे ही लोगों को पता लगेगा कि वे गंजे हो रहे हैं, वे इस विधि को अपना सकते हैं."

Saturday, May 24, 2008

कार के साथ पिस्तौल मुफ़्त!

Marwar News!
अमेरिका में एक कार डीलर ने अपने ग्राहकों को हर कार के साथ मुफ़्त में पिस्तौल देने की पेशकश की है.
मसूरी के 'मैक्स मोटर' का कहना है कि जबसे ये ऑफ़र रखा गया तब से कार बिक्री में चौगुनी वृद्धि हो गई है.
इस ऑफ़र में ग्राहकों को पिस्तौल या 250 डॉलर के गैस कार्ड में से एक को चुनने की सहूलियत है लेकिन अभी तक अधिकतर ग्राहकों को कार के साथ पिस्तौल ही पसंद आ रही है.
कंपनी के मालिक मार्क मलर का कहना है “हमें इस बात की बेहद ख़ुशी है कि हम एक ऐसे स्वतंत्र देश में रहते हैं जहाँ आप ज़रूरत पड़ने पर अपने साथ पिस्तौल रख सकते हैं.”
ये डीलर नई और पुरानी वाहन बेचता है जिसमें जनरल मोटर्स और फ़ोर्ड की कारें और ट्रकें शामिल हैं.
इस डीलर ने अपनी दुकान का जो लोगो बनवाया है उसमें भी एक काउब्वाय को पिस्तौल लिए दिखाया गया है.
डीलर ने तीन दिनों में ही 30 ट्रकें और कारें बेची हैं और इसका श्रेय वह इस ऑफ़र को ही देते हैं.
मलर का कहना है, "कनाडा के एक ग्राहक और एक बूढ़े व्यक्ति को छोड़कर अब तक सभी ने पिस्तौल को ही चुना है. इन दोनों ग्राहकों ने गैस कार्ड लेना पसंद किया था."
वे अपने ग्राहकों को एक ऐसी पिस्तौल का मॉडल चुनने की सलाह देते हैं जो जेब में आसानी से रखी जा सकती है.
डीलर का कहना है कि इस ऑफ़र का आइडिया उन्हें डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवार बराक ओबामा के एक भाषण से मिला.
वे बताते हैं कि इस भाषण में ओबामा ने सहानुभूति जताते हुए ज़िक्र किया था कि लोग बाइबल ओर पिस्तौल को बराबर अहमियत देने लगे हैं. उनका कहना था कि लोग रविवार को पिस्तौल लेकर चर्च जाने लगे हैं.
इस ऑफ़र का विज्ञापन वेबसाइट पर है और यह इस महीने के अंत तक जारी रहेगा.
इस विज्ञापन में ज़िक्र किया गया है कि पिस्तौल रखने के लिए किसी भी व्यक्ति की पृष्ठभूमि की जाँच-परख आवश्यक होती है.

Monday, May 19, 2008

बांग्लादेशियों की धरपकड़ शुरु


Marwar News!
राजस्थान की राजधानी जयपुर मे हुए बम धमाकों में कथित तौर पर बांग्लादेश के एक गुट का नाम सामने आने के बाद पुलिस ने राज्य भर में बांग्लादेशी नागरिकों की धरपकड़ शुरु कर दी है.
हालांकि राज्य मे कितने बांग्लादेशी है इसे लेकर ख़ुद भारतीय जनता पार्टी सरकार भ्रम में है.
कांग्रेस विधायक डॉक्टर चन्द्रशेखर बेद आंकड़ो का हवाला देकर कहते हैं, "बीजेपी सरकार जानकारी होने के बाद भी कार्रवाई नही कर पाई. क्योंकि इस सरकार के पास इच्छाशक्ति है ही नही."
वामपंथी संगठन कह रहे हैं कि अगर बांग्ला जुबान बोलने वाले भारतीयों को निशाना बनाया गया तो वो विरोध करेंगे.
पुलिस धरपकड़ मे अब तक क़रीब 12 बांग्लादेशियों को गिरफ़्तार किया गया है. इनमें से आठ को अजमेर मे गिरफ़्तार किया गया है.
''यहाँ पश्चिम बंगाल से ग़रीब मज़दूर सोने-चांदी और जवाहरात का काम करने आते रहे है. ऐसे लोगों को बांग्लादेशी बता कर अगर सताया गया तो हम इसे सहन नही करेंगे. क्योंकि पहले भी ऐसा हो चुका है.

वामपंथी नेता वकार उल अहद
पुलिस के अनुसार राज्य भर मे बांग्लादेशियों की जाँच का अभियान चलाया जा रहा है जो एक महीने तक चलेगा.
राज्य के संसदीय कार्य मंत्री राजेंद्र राठौर के मुताबिक जयपुर में पहले सर्वेक्षण मे बांग्लादेशियों की तादाद ढाई हज़ार पाई गई थी लेकिन अब इनकी संख्या दस हज़ार से कम नही है.
उधर, डेढ़ साल पहले गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया ने राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की मौजूदगी में अपने भाषण मे कहा था कि राजस्थान में पचास हज़ार बांग्लादेशी रह रहे है.
लेकिन दूसरी ओर, कांग्रेस विधायक बेद ने सरकार से सवाल पूछा तो जवाब आया कि जयपुर शहर में 916 और ग्रामीण जयपुर मे 345 बांग्लादेशी हैं. भरतपुर मे आठ बांग्लादेशी रह रहे हैं.
सरकार ने माना कि इनमें से कुछ बांग्लादेशियों को राशन कार्ड मिल चुके है, कुछ का नाम मतदाता सूची में शामिल हो चुका है और कुछ ऐसे भी हैं जो ड्राइविंग लाइसेंस ले चुके है.
ये तथ्य सामने आने बाद भी सरकार इन दस्तावेज़ों को ख़ारिज नहीं कर सकी है.
अदालत की टिप्पणी
पिछले वर्ष जयपुर की एक अदालत ने बांग्लादेशियों के बारे में सरकार पर तीखी टिप्पणी की थी.
अदालत ने कहा की सरकार ऐसे गंभीर मामले पर ध्यान नही दे रही है. अदालत ने मुख्य सचिव को भी इस बारे मे सूचित किया था.
विपक्ष के विधायक बेद कहते हैं, "इन प्रमाणों से साफ़ है की सरकार ऐसे ज्वलंत मुद्दों के लिए समय नही निकल पा रही है और बांग्लादेशियों पर उसकी चिल्ल-पो महज सियासी है."
वामपंथी नेता वक़ार उल अहद ने बीबीसी से कहा, "बांग्लादेशी क्या किसी भी विदेशी को हमारी सर जमीं पर रहने का हक़ नही है. आख़िर बांग्लादेशी यहाँ तक कैसे चले आते है."
बीजेपी सरकार जानकारी होने के बाद भी कार्रवाई नही कर पाई. क्योंकि इस सरकार के पास इच्छाशक्ति है ही नही

कांग्रेस के विधायक, चंद्रशेखर बेद
लेकिन वक़ार ये भी कहते हैं कि यदि बांग्ला भाषा बोलने वाले पश्चिम बंगाल के लोगों को निशाना बनाया तो वे विरोध करेंगे.
वे कहते हैं, ''यहाँ पश्चिम बंगाल से ग़रीब मज़दूर सोने-चांदी और जवाहरात का काम करने आते रहे है. ऐसे लोगों को बांग्लादेशी बता कर अगर सताया गया तो हम इसे सहन नही करेंगे. क्योंकि पहले भी ऐसा हो चुका है."
संसदीय कार्य मंत्री राठौर कहते हैं, "इनमें से ज्यादातर बांग्लादेशी अपना पता-ठिकाना पश्चिम बंगाल के कूच बिहार और चौबीस परगना जैसे ज़िलों का बताते है. लेकिन हम इनकी गहराई से जाँच करेंगे. पुलिस को जाँच का काम एक महीने मे पूरा करने को कहा गया है."
उधर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनो ने बांग्लादेशियों के विरुद्ध जनजागरण अभियान चलाने का ऐलान किया है.
बहरहाल बांग्लादेशी नागरिकों का मुद्दा सरकार के गले की फांस बन गया है.

Monday, May 12, 2008

नैनो के बाद अब सबसे सस्ता लैपटाप

Marwar News!
नई दिल्ली। अभी दुनिया की सबसे सस्ती कार (टाटा की नैनो) की चर्चा खत्म भी नहीं हुई है कि एक अन्य भारतीय कंपनी ने दुनिया का सबसे सस्ता लैपटाप बाजार में उतारने का ऐलान कर दिया है।
आईटी क्षेत्र में दुनिया भर में अपनी धाक जमा चुकी एचसीएल इन्फोसिस्टम्स लिमिटेड 'माइलीप' के ब्रांड नाम से दो तरह के लैपटाप उतारने जा रही है। इनमें एक्स सीरीज के तहत लैपटाप की कीमत केवल 13 हजार 990 रुपये रखी गई है। ज्यादा सुविधाओं वाले वाई सीरीज के लैपटाप की कीमत 29 हजार 990 रुपये तय की गई है। 26 जनवरी 2008 से ये लैपटाप देश भर में मिलने शुरू हो जाएंगे।
एचसीएल के चेयरमैन एवं सीईओ अजय चौधरी ने एक संवाददाता सम्मेलन में इन उत्पादों को सार्वजनिक तौर पर पेश किया। टाटा की लखटकिया नैनौ कार के आने के महज पांच दिन बाद सबसे सस्ते लैपटाप की लांचिंग को उन्होंने महज एक इत्तेफाक बताया। चौधरी के मुताबिक जिस तरह नैनो के आने के बाद एक दूधवाला या छोटा-मोटा व्यवसाय करने वाला व्यक्ति भी कार खरीदने का सपना सच कर सकेगा, उसी तरह माइलीप भी आईटी को अब समाज के कमजोर तबके तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाएगा। उन्होंने बताया कि खास तौर पर विद्यार्थियों, बिक्री व बीमा एजेंटों और काम के सिलसिले में अक्सर यात्रा करने वाले प्रोफेशनल्स के लिए यह एक उपयोगी उत्पाद साबित हो सकता है।
दोनों कंप्यूटरों का वजन बेहद हल्का है। इसमें सात इंच की स्क्रीन है। बेहद छोटा होने की वजह से इसे पार्को, ट्रेन, बस, विमान या मेट्रो ट्रेन में ले जाने में किसी प्रकार की दिक्कत आने की संभावना नहीं है। इनमें इंटेल का प्रोसेसर लगा हुआ है। एक्स सीरीज लाइनेक्स और विंडोज दोनों से ही चलने वाले आपरेटिंग सिस्टम से लैस है। इनमें वाई-फाई की भी सुविधा है। इसके अलावा वायरलेस कनेक्टिविटी, 80 जीबी का हार्ड डिस्क एवं ब्लूटूथ जैसी सुविधाएं तो हैं ही। वाई सीरीज में माइक्रोसाफ्ट विस्टा होम प्रीमियम लगा हुआ है। इसकी डिस्पले स्क्रीन 360 डिग्री तक घूम सकती है। यही नहीं, इसका डिजाइन इस तरह से तैयार किया गया है कि धूल, धूप व पानी का इस पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा।
दूसरे शब्दों में कहें तो एक सामान्य पर्सनल कंप्यूटर से आप जितने भी काम करना चाहते हैं वे सभी इस छोटे से लैपटाप के जरिए संभव हैं। शायद इसे ही ध्यान में रखकर चौधरी ने उम्मीद जताई है कि इसे बेचने के लिए ग्राहकों की प्रतीक्षा सूची बनानी पड़ेगी।

Sunday, May 11, 2008

एक दशक बाद नहीं दिखेंगे गिद्ध!

MarwarNews!
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगले दस सालों में एशियाई गिद्ध विलुप्त हो सकते हैं.
इसके लिए जानवरों को दी जाने वाली एक दवा को दोषी ठहराया गया है.
सर्वेक्षण करने वाली टीम का कहना है कि हालांकि सरकार ने जानवरों को दर्द के लिए दी जाने वाली दवा डाइक्लोफ़ेनाक पर प्रतिबंध लगा दिया है लेकिन इसे अभी भी किसानों को बेचा जा रहा है.
यह नया सर्वेक्षण बॉम्बे नेचरल हिस्ट्री सोसायटी के जर्नल में प्रकाशित किया गया है.
सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि सफ़ेद पूँछ वाले एशियाई गिद्धों की संख्या 1992 की तुलना में 99.9 प्रतिशत तक कम हो गई है.
इसके अनुसार लंबे चोंच वाले और पतले चोंच वाले गिद्धों की संख्या में भी इसी अवधि में 97 प्रतिशत की कमी आई है.
ज़ूलॉजिकल सोसायटी ऑफ़ लंदन के एंड्र्यू कनिंघम इस रिपोर्ट के सहलेखक भी हैं. वे कहते हैं, "इन दो प्रजातियों के गिद्ध तो 16 प्रतिशत, प्रतिवर्ष की दर से कम होते जा रहे हैं."
उनका कहना है, "यह तथ्य अपने आपमें डरावना और विचलित करने वाला है कि सफ़ेद पूँछ वाले गिद्ध हर साल 40 से 45 प्रतिशत की दर से कम होते जा रहे हैं."
ख़तरनाक दवा
इससे पहले भी वैज्ञानिकों ने कहा था कि यदि भारत में लगातार विलुप्त हो रहे गिद्धों को बचाना है तो जानवरों को दी जाने वाली दवा को बदलना होगा.
इससे पहले प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया था कि इस दवा को खाने वाले जानवरों का मांस खाकर पिछले सालों में गिद्ध की प्रजाति लगातार ख़त्म हुई है.
शोधकर्ताओं ने सलाह दी थी कि जानवरों को डाइक्लोफ़ेनाक नाम की दर्दनाशक दवा को बंद कर देना चाहिए.
भारत सरकार ने इसे वर्ष 2006 में प्रतिबंधित भी कर दिया गया था लेकिन भारतीय और ब्रिटिश शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रतिबंध का कोई ख़ास असर नहीं हुआ है.
उनका कहना है कि जानवरों के लिए डाइक्लोफ़ेनाक दवा के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया गया है लेकिन अब लोग मनुष्यों के लिए बन रही दवा का उपयोग जानवरों के लिए कर रहे हैं.
उनका कहना है कि दवा का आयात किया जा रहा है और इसका उपयोग हो रहा है.
इससे पहले शोधकर्ताओं ने डाइक्लोफ़ेनाक की जगह मेलोक्सिकैम नाम की दवा के उपयोग की सलाह दी थी लेकिन चूँकि वह डाइक्लोफ़ेनाक की तुलना में दोगुनी महंगी है इसलिए इसका उपयोग नहीं हो रहा है.
उपयोगी गिद्ध
हर साल आधी होती जा रही है गिद्धों की जनसंख्या
वैसे तो गिद्ध भारतीय समाज में एक उपेक्षित सा पक्षी है लेकिन साफ़-सफ़ाई में इसका सामाजिक योगदान बहुत महत्वपूर्ण है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गिद्धों के विलुप्त होने की रफ़्तार यही रही तो एक दिन ये सफ़ाई सहायक भी नहीं रहेंगे.
जैसा कि वे बताते हैं 90 के दशक के शुरुआत में भारतीय उपमहाद्वीप में करोड़ों की संख्या में गिद्ध थे लेकिन अब उनमें से कुछ लाख ही बचे हैं.
वैज्ञानिकों का कहना है कि गिद्धों को न केवल एक प्रजाति की तरह बचाया जाना ज़रुरी है बल्कि यह पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी ज़रुरी है.
वे चेतावनी देते रहे हैं कि गिद्ध नहीं रहे तो आवारा कुत्तों से लेकर कई जानवरों तक मरने के बाद सड़ते पड़े रहेंगे और उनकी सफ़ाई करने वाला कोई नहीं होगा और इससे संक्रामक रोगों का ख़तरा बढ़ेगा.

भजन गाओ और तनाव दूर भगाओ

MarwarNews!
लंदन. यदि आप उच्च रक्तचाप और तनाव से पीड़ित हैं तो दवाओं पर पैसा बहाने की बजाए किसी मंदिर में जाकर भजन-कीर्तन में हिस्सा लें।
डेली मेल में प्रकाशित रिपोर्ट में ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि लोगों को प्राणायाम की शिक्षा देने तथा भजन-कीर्तन या मंत्रोच्चर जैसी धुन का प्रयोग करने पर उनमें तनाव का स्तर कम हुआ और उनकी भावनात्मक स्थिति सकारात्मक हुई। शोधकर्ताओं ने इस तथ्य की पुष्टि के लिए कि चर्च में पुरुष गान समूहों में गाए जाने वाले ग्रेगोरियन पद्धति के भजन से तनाव कम होता है, वियना के प्राचीन ईसाई मठ के भिक्षुओं के दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर पर 24 घंटे तक निगाह रखी। भजन के दौरान दोनों न्यूनतम स्तर पर पाए गए।
* ग्रेगोरियन पद्धति के भजन का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह तनाव घटाकर व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ़ा सकता है।- डॉ. एलैन वाटकिंस, वरिष्ठ व्याख्याता, न्यूरोसाइंस, इंपीरियल कालेज लंदन

माँ का दूध पीने वाले ज्यादा स्मार्ट!

Good News!
लंदन.माँ का दूध पीकर बड़े होने वाले बच्चे बोतल या डिब्बा बंद दूध पीने वाले बच्चों की तुलना में अधिक स्मार्ट होते हैं।
लंदन स्थित मेकगिल विश्वविद्यालय के प्रो. मिशेल क्रेमर द्वारा हाल ही में किए गए शोध में यह बात सामने आई है। उन्होंने बताया कि नैसर्गिक रूप से दुग्धपान करने वाले बच्चे बड़े होकर अधिक कुशाग्र बुद्धि के होते हैं और ऐसे बच्चे न सिर्फ पढ़ाई-लिखाई में तेज होते हैं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारियों को भी अधिक कुशलता से निभाते हैं।
प्रो. क्रेमर ने कहा कि उनके इस शोध से दुग्धपान को बढ़ावा देने के लिए चल रही विश्वव्यापी मुहिम को प्रभावी बनाने में सहयोग मिलेगा। उन्होंने बताया कि 14 हजार बच्चों पर किए गए शोध में पाया गया कि दुग्धपान करने वाले बच्चों की बुद्धिमत्ता का स्तर (आईक्यू) कृत्रिम दूध पीने वाले बच्चों की तुलना में अधिक होता है।

कश्मीर में मुठभेड़ ख़त्म, आठ की मौत

Good News!
भारत प्रशासित कश्मीर के सांबा इलाक़े में सेना के साथ मुठभेड़ मे दो चरमपंथियों समेत आठ लोग मारे गए है.
मुठभेड़ में 11 लोग घायल भी हुए हैं. मारे गए लोगों में सेना के दो जवान भी शामिल हैं.
डीआईजी पुलिस फ़ारुख खान का कहना है कि कि मुठभेड़ ख़त्म हो गई है और दो चरमपंथी मारे गए हैं. मारे गए लोगों में दो महिलाएँ और एक स्थानीय अख़बार का वरिष्ठ फ़ोटो पत्रकार शामिल है.
घायलों में एक मेजर, पुलिस अधिक्षक (ऑपरेशन्स) और टीवी चैनल आईबीएन सेवन का वीडियोग्राफ़र शामिल है.
जम्मू के क़रीब सांबा के केलीमंडी इलाक़े में रविवार सुबह चरमपंथियों ने अचानक फ़ायरिंग शुरू कर दी. हमला करने के बाद चरमपंथी क़रीब के ही मकानों में छिप गए.
सुरक्षाबलों ने इस मकान को घेर लिया. चरमपंथियों ने इस दौरान कुछ ग्रेनेड भी इस्तेमाल किए और कुछ लोगों को मकानों के अंदर ही बंदी बना लिया.
मुठभेड़
चरमपंथी दो घरों में छिपे गए. सुरक्षाबलों और चरमपंथियों के बीच रुक रुक कर गोलियाँ चलती रहीं. एक महिला जो उस घर में छुपी हुई थी, उसकी इस गोलीबारी में मौत हो गई.
मुठभेड़ में फोटो पत्रकार अशोक सोढ़ी की मौत हो गई
घर में फंसी एक अन्य महिला और दो बच्चों को सुरक्षाबलों ने बचा लिया. इस मुठभेड़ में एक स्थानीय अख़बार के वरिष्ठ फ़ोटो पत्रकार अशोक सोढी भी मारे गए हैं.
साथ ही एक जवान अतुल कुमार की भी मृत्यु हो गई. गोलीबारी में होशियार सिंह और उनकी पत्नी की भी मौत हो गई.
इस चरमपंथी हमले में होशियार सिंह की बेटी और उनके घर पर आए एक मेहमान भी घायल हो गए.
मुठभेड़ में दो जवान गंभीर रूप से घायल हो गए. आसपास रहने वाले लोगों का कहना है कि मुठभेड़ में कई अन्य पत्रकार भी घिर गए थे.
सुरक्षा बलों ने फ़िलहाल सैलानियों को इस इलाक़े में जाने से रोक दिया है. सुरक्षा बलों का मानना है कि गुरुवार को हुई घुसपैठ में ये चरमपंथी भारत प्रशासित कश्मीर में दाखिल हुए होंगे.
हालांकि पहले सुरक्षा एजेंसियों ने इस बात से इनकार किया था कि गुरुवार को भारत और पाकिस्तान की तरफ़ से हुई गोलीबारी में कोई चरमपंथी भारत प्रशासित कश्मीर में दाखिल हुआ था.

Friday, May 9, 2008

एचआईवी ग्रस्त माँग रहे है 'इच्छा मृत्यु'


राजस्थान में एचआईवी पॉज़िटिव लोगों ने सरकार पर उपेक्षा का आरोप लगाया है. उन्होंने 'इच्छा मृत्यु' की इजाज़त मांगी है.
ये लोग अपनी माँगों को पूरा करवाने के लिए जयपुर में धरने पर बैठ गए हैं.
इनका आरोप है की सरकार ज़रूरी दवाओं की व्यवस्था नहीं कर रही है. वहीं सरकार ने इन आरोपों को ग़लत बताया है.
राज्यपाल को ज्ञापन
एचआईवी पॉज़िटिव पीड़ितों की संस्था के अध्यक्ष ब्रजेश दुबे ने बीबीसी को बताया की 20 पीड़ितों ने राज्यपाल को एक ज्ञापन भेजकर 'इच्छा मृत्यु' की अनुमति मांगी है.
दुबे कहते है, "हम अभाव और उपेक्षा की इस ज़िन्दगी से परेशान हो गए हैं. इस तरह की जिंदगी से अब हम तंग आ चुके हैं. कदम-कदम पर हमे अपमानित किया जा रहा है."
हम अभाव और उपेक्षा की इस ज़िंदगी से परेशान हो गए हैं. इस तरह की जिंदगी से अब हम तंग आ चुके हैं. कदम-कदम पर हमे अपमानित किया जा रहा है

एचआईवी ग्रस्त लोगों की संस्था
उधर एड्स नियंत्रण के लिए ज़िम्मेदार एक वरिष्ठ अधिकारी डॉक्टर अरुण बजाज कहते हैं, "सरकार ने अपने स्तर पर सभी व्यवस्था कर रखी है. हमने दवाओं और ज़रूरी चिकित्सा की माकूल व्यवस्था कर रखी है."
बजाज कहते हैं, "मेरे ख़्याल में दवाओं की कोई कमी नहीं है. जयपुर के अलावा ज़िला स्तर पर भी दवाओं की पर्याप्त व्यवस्था है."
राजस्थान नेटवर्क फ़ॉर पॉजिटिव पीपुल के मुताबिक, राजस्थान में कोई दो लाख लोग एड्स पीड़ित हैं.
सरकार ने अपने स्तर पर सभी व्यवस्था कर रखी है. हमने दवाओं और जरूरी चिकित्सा की माकूल व्यवस्था कर रखी है

एड्स नियंत्रण के उपनिदेशक
नहीं मिलता है काम
प्रकाश एक एड्स पीड़ित हैं. वह अपना दर्द बताते-बताते रो पड़ते हैं.
उन्होंने कहा, "मेरे चार बच्चे है. हम बड़ी मुश्किल में हैं. कही रोज़गार नहीं मिलता हैं. अगर सरकार हमे ग़रीबी रेखा की सूची में शामिल कर ले तो थोडी मदद हो जाएगी. वरना ऐसे घुट-घुट कर कैसे जिएँगे?."
सुरभी (बदला हुआ नाम) कहती हैं, "मेरी बेटी भी इस रोग से ग्रस्त है. समाज जब उपेक्षा करे तो सरकार का बड़ा सहारा होता है. मगर अब सरकार ही ध्यान नही दे रही है. हम माथे पर लगे इस दाग के साथ समाज में कहाँ जाकर खडे होंगे?"
इन पीडितों का कहना है की अगर सरकार सहारा दे तो उनकी ज़िंदगी की राह कुछ आसन हो जाएगी.

नारायण बारेठ

बीबीसी संवाददाता, जयपुर

Thursday, May 8, 2008

भारत के खली ने मचाई खलबली

GooD News !
एक भीमकाय इंसान जो कभी हिमाचल प्रदेश के खेतों में काम करता था और अब अंतरराष्ट्रीय कुश्ती का चमकता सितारा है. जी हाँ, हम बात कर रहे हैं खली की.
अमरीका के अटलांटा शहर में रहने वाले खली का असली नाम दलीप सिंह राणा है.
खली कुछ हॉलीवुड फ़िल्मों में काम कर चुके हैं और अब उन्हें बॉलीवुड से भी काम के प्रस्ताव आ रहे हैं.
उन्होंने वर्ष 2005 की फ़िल्म 'द लॉंगेस्ट यार्ड' और 'गेट स्मार्ट' जैसी फ़िल्मों में काम किया.
पंजाबी मुंडा
छत्तीस वर्षीय राणा आजकल भारत में हैं. वो अपना कुछ समय घर में बिताएंगे और अपने जीवन पर बनने वाली वृत्तचित्र के लिए शूटिंग भी करेंगे.
दलीप सिंह राणा अमरीका में डब्ल्यूडब्ल्यूई में लड़ने वाले पहले भारतीय हैं. वो दुनियाभर में मशहूर डब्ल्यूडब्ल्यूई योद्धा हल्क होगन और द रॉक के साथ काम करते हैं.
खली सात फ़ीट तीन इंच लंबे हैं और उनका वज़न 420 पाउंड है
खली के बारे में डब्ल्यूडब्ल्यूई की वेबसाइट कहती है कि वो भारत के रहने वाले हैं, सात फ़ीट तीन इंच लंबे हैं और उनका वज़न 420 पाउंड है.
वेबसाइट का कहना है कि खली भारत के जंगल में घूमते हैं और उन्हें अजगरों से डर नहीं लगता. वेबसाइट की माने तो 'महान खली' पश्चिम बंगाल के बाघों से भी दो-दो हाथ कर चुके हैं.
खली कहते हैं कि अमरीका के लोगों ने कभी सोचा भी नहीं था कि डब्ल्यूडब्ल्यूई में कभी कोई भारतीय भाग लेगा, लेकिन वे इसका मज़ा लूट रहे हैं.
बढ़ती लोकप्रियता
दो वर्ष पहले अमरीका की सरकार डब्ल्यूडब्ल्यूई के पहलवानों को इराक में सैनिकों के मनोरंजन के लिए ले जाना चाहती थी.
इन पहलवानों की एक शुरुआती सूची बनाई. इस शुरुआती सूची में खली का भी नाम था. हालांकि अंतिम सूची में उनका नाम नहीं था.
उनका हाथ इतना विशाल है कि अगर आप उनसे हाथ मिलाएँ तो आपका हाथ कहीं खो जाता है और वो चाहें तो अपने हाथ से आपका सर मसलकर रख दें

स्टीन कैरेल, हॉलीवुड कलाकार
खली के प्रवक्ता अमित स्वामी हैं, वो उत्तरी राज्य हरियाणा के रहने वाले हैं और ख़ुद एक बॉडीबिल्डर हैं.
अमरीका के फ़िल्म कलाकार स्टीन कैरेल ने खली के साथ ‘गेट स्मार्ट’ फ़िल्म में काम किया था.
वो कहते हैं,'' उनका हाथ इतना विशाल है कि अगर आप उनसे हाथ मिलाएँ तो आपका हाथ कहीं खो जाता है और वो चाहें तो अपने हाथ से आपका सर मसलकर रख दें.''
कैरेल कहते हैं कि खली बेहद मधुर स्वभाव के हैं और ‘मुझे नहीं लगता कि उन्हें पता था कि वो एक फ़िल्म में काम कर रहे हैं.’
उधर खली उर्फ़ राणा का कहना है कि वो सिर्फ़ चुनी हुई भारतीय फ़िल्में ही करेंगे.
खली के शुरुआती दिनों की बात करें तो वो रोड परियोजनाओं के लिए पत्थर तोड़ने का काम करते थे.
उनके गाँव धिराना की महिलाएं उन्हें भारी भरकम काम, जैसे जानवर को उठाकर एक जगह से दूसरी जगह रखना जैसे काम करवाती थीं.
मुश्किलें
खली का जीवन उस वक्त बदला जब वो अपने दोस्त स्वामी के साथ दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अपने पसंदीदा पहलवान डोरियन येट्स से मिलने गए.
खली का कहना है कि जिस मुक़ाम पर हैं, वहाँ पहुंचना बेहद मुश्किल था
येट्स खली का डीलडौल देखकर बेहद प्रभावित हुए.
जल्द ही खली अपनी किस्मत आज़माने जापान रवाना हो गए. वहाँ बिताए एक साल में उन्होंने कई ‘झूठी’ लड़ाइयाँ लड़ी.
उसके बाद वह अमरीका चले गए जहाँ उन्होंने ऐसी लड़ाइयों को पेशा बना लिया.
खली का कहना है कि जिस मुक़ाम पर हैं, वहाँ पहुंचना बेहद मुश्किल था.
आराम की ज़िंदगी
डब्ल्यूडब्ल्यूई कार्यक्रम वालों को राणा का नया नाम ढूढ़ने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी. किसी ने उसे जायंट सिंह कहा तो तो किसी ने उसे भीम नाम से संबोधित किया.
किसी ने कहा कि राणा का नाम भगवान शिव रखा जाए, लेकिन इस नाम को भी ख़ारिज कर दिया गया क्योंकि इससे भारत में रहने वाले लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँच सकती थी.
फिर राणा ने माँ काली का नाम सुझाया और उनकी विनाशकारी शक्तियों के बारे में बताया. सबको यह नाम बेहद पसंद आया. लेकिन विदेशियों ने उनका नाम खली कर दिया.
राणा का कहना है कि वो शाकाहारी हैं और तंबाकू और शराब से दूर रहते हैं.
वो कहते हैं कि वह अपनी पत्नी हरमिंदर कौर के साथ एक साधारण ज़िंदगी व्यतीत करते हैं.
राणा यानि खली का कहना है कि वह डब्ल्यूडब्ल्यूई से कुछ और वर्ष जुड़े रहेंगे.

Friday, May 2, 2008

पाक में एसएमएस भेज मांगते हैं भीख

Go od News!
इस्लामाबाद। मोबाइल फोन आज हर किसी के काम आ रहा है। अपहर्ताओं ही नहीं, भिखारियों के भी। अपहर्ता फोन के जरिए फिरौती मांगते हैं तो भिखारी भीख मांगने के लिए लोगों को एसएमएस भेजते हैं। पाकिस्तान में भिखारियों ने मोबाइल फोन को अपने धंधे का हथियार बना लिया है।
पाकिस्तान के भिखारी हाईटेक जरूर हो गए हैं, लेकिन भीख मांगने का उनका अंदाज वही पुराना है। एसएमएस के जरिए भीख मांगते हुए भी वे अल्लाह को नहीं भूलते। उन्हीं के नाम पर भीख देने को कहते हैं। मसलन, लोगों के पास इस तरह के एसएमएस पहुंचते हैं, 'मैं एक गरीब आदमी हूं। मेरी बेटी अस्पताल में भर्ती है। यदि आप अल्लाह में यकीन रखते हैं तो कृपया मुझे दस रुपये देने का कष्ट करें। अल्लाह आपको बरकत देगा और हर तरह की परेशानियों से दूर रखेगा।'
हाईटेक भिखारियों ने अपनी औकात भी ज्यादा नहीं बढ़ाई है। वे एसएमएस भेज कर ज्यादा से ज्यादा सौ रुपये की ही मांग रखते हैं। व्यवसायी मुहम्मद उस्मान का दावा है कि उन्हें हर दिन ऐसे दस मैसेज मिलते हैं। अखबार 'डेली टाइम्स' ने उस्मान के हवाले से लिखा है, 'इन मैसेज को नजरअंदाज करना मुश्किल है।'
दरअसल, अल्लाह के नाम पर मांगे जाने पर कई लोग असमंजस में पड़ जाते हैं। यूनुस नाम के एक शख्स ने तो इन अनाम संदेशवाहकों को पैसे भेजना भी शुरू कर दिया है। उनका कहना है, 'यह जाने बिना कि मैसेज किसने भेजा है, मैं अल्लाह के नाम पर पैसे दे देता हूं।' हालांकि उनका मानना है कि भिखारियों को लोगों को ब्लैकमेल नहीं करना चाहिए।

क्लास में सिखाते है डेटिंग व रोमांस के गुर

Good News!
सिंगापुर। क्या आप किसी ऐसी क्लास के बारे में यकीन करेंगे जिसमें बैठे युवा छात्र-छात्राएं बाकायदा रोमांस करने, डेट पर जाने और मौज-मस्ती करने के गुर सीख रहे हैं। जी हां, सिंगापुर में इन दिनों ऐसी भी क्लास लग रही हैं।
'लव रिलेशंस फार लाइफ : ए जर्नी आफ रोमांस, लव एंड सेक्सुअलिटी' की इस क्लास में बैठे युवा जोड़े आपस में हंसी-ठिठोली करते हुए पढ़ाई पूरी कर रहे हैं। उनके टीचर सुकी तोंग उन्हें बाकायदा रोमांस करने और डेट पर जाने के नुस्खे बताते हैं।
यहां के दो पालीटेक्निक संस्थानों में इस कोर्स का यह दूसरा साल है। और यह बेहद लोकप्रिय भी हो रहा है। वैसे यह सब सिंगापुर सरकार की देश में गिरती जनसंख्या दर पर लगाम कसने की कवायद के तहत हो रहा है। सरकार गिरती जनसंख्या दर से चिंतित है। पिछले वर्ष सिंगापुर में प्रति महिला जन्मदर गिरकर सबसे कम [1.24] रह गई। यह दुनिया भर में सबसे कम है। सिंगापुर में यह लगातार 28वां साल था जब जनसंख्या के मौजूदा स्तर को बरकरार रखने के लिए जरूरी जन्मदर 2.5 के औसत से कम रही।
पिछले 25 वर्षो से सिंगापुर सरकार युवा जोड़ों को मिलने-जुलने के मौके देने के लिए टी डांस, वाइन टेस्टिंग, कुकिंग क्लास और रोमांटिक फिल्मों की स्क्रीनिंग जैसे सामूहिक आयोजन करती रही है। डेटिंग व रोमांस की ये नई क्लास इसी कड़ी का हिस्सा हैं।
सामुदायिक विकास, युवा मामले व खेल विभाग के मंत्री यू फो यी शून का इस बारे में कहना है, 'हम छात्रों को बताना चाहते हैं कि बच्चे पैदा करने के लिए करियर संवरने तक इंतजार मत करो। इसमें कभी-कभी काफी देर हो जाती है, खास तौर पर लड़कियों के मामले में।'

Thursday, May 1, 2008

आवाज बताती है गर्भधारण का सही वक्त

Good News!
महिलाओं के मासिक चक्र के दौरान गर्भधारण के लिए सबसे मुफीद वक्त का पता उनकी आवाज से लगाया जा सकता है। एक शोध से पता चला है कि जिन दिनों गर्भधारण का सबसे उपयुक्त वक्त होता है, उन दिनों महिलाओं की आवाज सबसे ज्यादा मदहोश करने वाली होती है।
पहले के अध्ययनों में कुछ शारीरिक व व्यवहार संबंधी परिवर्तन का पता चला था, जिनके आधार पर गर्भधारण के सही वक्त का अंदाज लगाया जा सकता है। इन दिनों महिलाओं के शरीर से एक खास तरह की खुशबू भी आने लगती है। लेकिन अब पहली बार पता चला है कि ऐसे वक्त में महिलाओं की आवाज में भी परिवर्तन आ जाता है। यह परिवर्तन सकारात्मक होता है। यानी आवाज काफी मोहक और मादक हो जाती है। इस अध्ययन की रिपोर्ट 'जर्नल आफ इवोल्यूशन एंड ह्यूंमन बिहेवियर' में प्रकाशित होनी है।
न्यूयार्क यूनिवर्सिटी के नाथन पिपीटोन और गार्डन गेलुप ने महिलाओं के मासिक चक्र के दौरान चार विभिन्न अवसरों पर आवाज रिकार्ड की। इन आवाजों को बेतरतीब बजाया गया। महिला व पुरुष निर्णायकों को बार-बार यह आवाज सुनाई गई। पाया गया कि जिस समय गर्भधारण का सबसे उपयुक्त वक्त था, उस समय की आवाज सबसे ज्यादा मोहक थी।

खली को पछाड़ देगा मेरा बेटा करन

Good News!
अमूमन बेटे का कद मां से अधिक ही होता है। यही धारणा भारत की सबसे लंबी महिला स्वेतलाना सिंह की उम्मीद का कारण है। स्वेतलाना को भरोसा है कि उसका बेटा करन एक दिन डब्लूडब्लूई के मशहूर पहलवान ‘द ग्रेट खली’ को लंबाई के मामले में पीछे छोड़ देगा। सिर्फ 10 माह की उम्र में करन की हाइट सवा तीन फीट हो चुकी है।
सात फीट दो इंच लंबी स्वेतलाना का मानना है कि करन का कद सात फुट तीन इंच लंबे खली से भी अधिक होगा। ‘एक दिन वह दुनिया में सबसे लंबे कद का व्यक्ति होगा।’ उन्होंने बताया कि दस माह की उम्र में करण का कद और वजन, दो साल के बच्चे के बराबर हो गया है।
गिनीज रिकार्ड :
गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्डस के अनुसार, स्वेतलाना दुनिया की तीसरी लंबी महिला हैं। दुनिया की सबसे लंबी महिला का रिकॉर्ड चीन की याओ डेफेन (7 फीट 7.5 इंच) के नाम है। उसके बाद अमेरिका की सैंडी एलैन (7 फीट 7 इंच) का नंबर आता है। लिम्का बुक ने स्वेतलाना को भारत की सबसे लंबी महिला माना है।
स्वस्थ मां :
डेफेन को ब्रेन ट्यूमर है तो कमजोर मांसपेशियों के कारण सैंडी को व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ता है। इन दोनों की अपेक्षा स्वेतलाना कहीं अधिक स्वस्थ हैं। स्वेतलाना ने बताया कि उन्हें कभी बुखार तक की शिकायत नहीं हुई है।
विरासत में मिली हाइट :
स्वेतलाना के पति संजय (6 फुट छह इंच लंबे) ने बताया कि जन्म के समय करन का वजन छह किलो और उसकी लंबाई दो फुट दो इंच थी। उसे दिन में 20 बार दूध पिलाना पड़ता है, साथ ही आजकल वह खूब फल खाने लगा है।
इतनी छोटी उम्र में भी करन अपने पैरों पर चल सकता है। संजय के पिता की लंबाई छह फुट पांच इंच है, जबकि स्वेतलाना के पिता छह फुट सात इंच लंबे हैं।
इससे लगता है कि करन को भी लंबे होने के लिए जिम्मेदार जींस विरासत में मिले हैं।
बास्केटबॉल खेलेगा :
मेरठ में प्राकृतिक चिकित्सा के जरिए लोगों का इलाज करने वाले संजय और स्वेतलाना अपने बेटे को बास्केटबॉल का खिलाड़ी बनाना चाहते हैं। ट्रेनिंग के लिए वे उसे अमेरिका भेजना चाहते हैं।

मोटापा और धूम्रपान से जल्दी होंगे बूढ़े

Good News!
अगर आप मोटे हैं और सिगरेट भी पीते हैं तो संभल जाएं क्योंकि ऐसा करने वाले लोग अपने हमउम्र लोगों की अपेक्षा जल्दी बूढ़े हो जाते हैं.
अमरीका और ब्रिटेन में किए गए शोध में यह बात सामने आई है कि धूम्रपान करने से किसी भी व्यक्ति के डीएनए के महत्वपूर्ण हिस्सों की उम्र क़रीब साढ़े चार साल अधिक बढ़ जाती है.
अगर व्यक्ति मोटा हो तो यह नौ वर्ष अधिक हो जाती है. ये आनुवंशिक कोड कोशिकाओं के विभाजन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं और इनका संबंध बढ़ती उम्र के साथ होने वाली बीमारियों से होता है.
बढ़ती उम्र
वैज्ञानिकों ने गुणसूत्रों के अंत में मौजूद डीएनए की परत टेलोमीयर की जांच के बाद यह निष्कर्ष निकाला है.

उम्र बढ़ाने के साथ जानलेवा हो सकता है मोटापा
इस शोध से जुड़े प्रोफेसर टिम स्पेक्टर कहते है कि धूम्रपान और मोटापा उम्र के साथ बढ़ने वाली बीमारियों से पूर्ण रुप से जुड़ी हुई हैं.
प्रयोग के दौरान पाया गया कि धूम्रपान करने वालों और मोटे लोगों में टेलोमीयर की परत तेज़ी से घटती है उनकी तुलना में जो धूम्रपान नहीं करते हैं.
गुणसूत्रों का चक्र
सेंट थामस अस्पताल में शोधरत प्रोफेसर स्पेक्टर का कहना है," जो आप देख रहे हैं वो धूम्रपान के कारण पूरे शरीर की बढ़ती हुई उम्र है न कि सिर्फ़ दिल या किडनी की नहीं."
स्पेकटर कहते हैं कि धूम्रपान से पूरे क्रोमोसोम या गुणसूत्र तेज़ी से घटते हैं यानी उम्र तेज़ी से बढती है.
उनका कहना है कि जवान लोगों को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए कि अगर वो धूम्रपान कर रहे हैं तो क्या वो अपने हमउम्र लोगों से कुछ वर्ष बड़ा होना मंज़ूर करेंगे.
हालांकि ये निष्कर्ष इस मुद्दे पर अंतिम नतीजे नहीं कहे जा सकते लेकिन ये नतीजे धूम्रपान करने वालों को एक बार फिर सोचने को मजबूर कर सकते हैं.

देश का हर बीसवां आदमी शराबी

नई दिल्ली(Good News)शराब के शौकिनों जरा होस में आओ और अपने आप को संभालो नहीं यह शराब आपको तबाह कर देगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि आने वाले दिनों में दुनिया में हर साल 18 लाख लोगों की मौत का कारण शराब बनेगी। भारत में शराबियों की संख्या में पिछले तीन सालों में 15 गुणा बढ़ोतरी हुई है। इंडियन एल्कोहल पॉलिसी संगठन ने एल्कोहल का नक्शा बनाया है। इससे पता चलता है कि देश के किस हिस्से में में शराब के शौकिनों की संख्या कितनी है।
इस नक्शे को स्वास्थ्यमंत्री अंबुमणी रामदास ने जारी किया है। देश में शराब पीने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। आंकड़ों के अनुसार देश में हर 20वां व्यक्ति शराबी है। 1986 में 19 साल की उम्र से शराब पीने की शुरूआत होती थी, लेकिन अब यह महज 13-14 साल रह गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि आने वाले दिनों में विश्व में हर वर्ष शराब से मरने वालों की संख्या 18 लाख होगी। इस मामले में भारत के हालत भी कम चिंताजनक नहीं हैं। इंडियन एल्कोहल पॉलिसी एयायंस ने बताया है कि किस तरह शराबियों की संख्या बढ़ रही है। जहां पहले 300 में एक आदमी शराब पीता था अब यह आंकड़ा हर बीसवां आदमी शराबी है में बदल गया है।
किस राज्य में कितने शराबी
शराबियों के मामले में केरल पहले स्थान पर है, दूसरे पर महाराष्ट्र, तीसरे पर पंजाब, चौथे पर अरुणाचल प्रदेश, पांचवें स्थान पर गौवा, छठे पर सिक्किम, सातवें स्थान पर मध्यप्रदेश, आठवें पर छत्तीसगढ़, नौवें पर उड़ीसा और दसवें स्थान पर आंध्र प्रदेश शामिल है गोवा में शराबियों की संख्या में महिलाएं पहले स्थान पर हैं। महिला शराबियों की संख्या में भी पहले की अपेक्षा पांच फीसदी इजाफा हुआ है। इससे पता चलता है कि राज्य सरकारो क मद्य निषेध विभाग महज दिखावा हैं।

Wednesday, April 30, 2008

Anti-Child Labour Day (To-day)

Good News !
From a poor, hungry, illiterate child labourer to an enthusiastic and happy schoolgirl, Mini has come a long way!
Mini was hardly eight when she lost her parents and was sent off by her relatives to work in a house, far away from her hometown. Alone and friendless in a strange town, Mini endured harshness, beatings and hunger. Worst of all, she was never paid.
She desperately wanted to leave her job, but she had no choice, as she had no one to care for her or help her. Alone and friendless, Mini’s life at the age of eight was the life of a slave…until someone reached out a helping hand to her.
Through World Vision’s child sponsorship programme, a kind-hearted person came forward to sponsor her. Today, because of a person she had never met, Mini looks forward to a life of hope and dignity. Thanks to her sponsor, Mini can be a child again…going to school, playing with friends and enjoying life.
Once caught up in a cycle of poverty, hunger and exploitation, Mini today looks forward to a life of opportunity, hope and dignity!
For just Rs 600 per month, you too can become a child sponsor! Your sponsorship will send your sponsored child to school and provide him/her with access to clean drinking water and good health. You can even write and visit your child.
Help a needy child celebrate life! Sponsor a child and experience the joy of bringing promise to a needy life!

बूढ़े लोगों को मुफ़्त वायग्रा

Good News !
चिली की राजधानी सेंटियागो के निकट एक शहर के मेयर ने शहर में बूढ़े लोगों को रिझाने का एक नया तरीक़ा निकाला है और वो है उन्हें मुफ़्त वायग्रा बाँटने का.
ग़ौरतलब है कि वायग्रा यौन उत्तेजना बढ़ाने वाली एक दवा है.
मेयर गोंज़ालो नावारेट्टी मुनोज़ का कहना है कि वे बूढ़े लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाना चाहते हैं इसलिए वे इन लोगों को मुफ़्त वायग्रा देने की मंशा रखते हैं.
मेयर की योजना है कि साठ साल से ऊपर की उम्र के उन लोगों को वायग्रा मुफ़्त दी जाए जो कामकाजी हैं और ख़ासतौर से लोप्रादो बस्ती में रहते हैं लेकिन आलोचकों का कहना है कि करदाताओं की क़ीमत पर कुछ गिने-चुने लोगों को मुफ़्त वायग्रा बाँटना सही नहीं कहा जा सकता.
मेयर का कहना है कि जब वे एक डॉक्टर के रूप में काम कर रहे थे तो उम्रदराज़ लोगों के सेक्स जीवन की समस्याओं को सुन कर इस क़दम को उठाने के लिए प्रेरित हुए हैं.
मुनोज़ का कहना है, "यह उम्रदराज़ लोगों को बेहतर जीवन मुहैया कराने की कोशिशों के तहत एक क़दम के रूप में किया जा रहा है."
वे हर महीने चार बार वायग्रा उन लोगों के बीच बाँटना चाहते हैं जो इसकी माँग करेंगे और अगले कुछ दिनों में डॉक्टर अपनी डिंसपेंसरियों से वायग्रा मुफ़्त बाँटना शुरू कर देंगे.
मुफ़्त वायग्रा पाने के लिए उम्रदराज़ लोगों की चिकित्सा जाँच भी की जाएगी.
ऐसे क़रीब 1500 लोगों की पहले ही सूची बना ली गई है जिन्होंने वायग्रा लेने के लिए दिलचस्पी दिखाई है.
वायग्रा के बिल का भुगतान मेयर के ऑफ़िस से किया जाएगा.
अनुमान है कि इस कार्यक्रम में पहले साल में क़रीब बीस हज़ार डॉलर यानी लगभग आठ लाख रुपए खर्च होंगे.
आलोचको का कहना है कि मुनोज़ की यह तरक़ीब महज़ चुनाव में फिर से जीत हासिल करने की एक क़वायद है लेकिन मेयर का कहना है कि वे एक सामाजिक सेवा कर रहे हैं और यदि यह कार्यक्रम सफ़ल रहा तो इसे वे पूरे चिली में लागू करेंगे.

Sunday, April 27, 2008

एक साथ प्रक्षेपित होंगे दस उपग्रह

Good News!
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र ( इसरो ) के नए अभियान के तहत सोमवार को उपग्रह प्रक्षेपण यान पीएसएलवी-सी9 के ज़रिए 10 उपग्रहों को प्रक्षेपित किया जाएगा.
श्रीहरिकोटा से होने वाला ये प्रक्षेपण 16 मिनट में पूरा कर लिया जाएगा.
लॉन्च किए जाने वाले दस उपग्रहों में भारत का आधुनिक रिमोट सेसिंग उपग्रह शामिल है.
इसका अलावा आठ विदेशी नैनो उपग्रहों को छोड़ा जाएगा.
पिछले वर्ष अप्रैल में एक रूसी यान से 16 उपग्रहों को छोड़ा गया था. लेकिन ये यान 300 किलोग्राम के आस-पास वज़न लेकर गया था.
जबकि 230 टन वज़न वाला पोलर सेटेलाइट लॉन्च वीहकल (पीएसएलवी-सी9) कुल 824 किलो भार लेकर जाएगा.
एक साथ दस उपग्रह
अधिकारियों का कहना है कि आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा केंद्र में तैयारियां ठीक-ठाक चल रही हैं.
प्रक्षेपण सोमवार सुबह नौ बजकर 23 मिनट पर होगा.
करीब 70 करोड़ की लागत वाले पीएसएलवी-सी9 की ये 13वीं उड़ान है.
रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट कार्टोसेट-2ए का वज़न 690 किलोग्राम है और इसमें आधुनिक पैनक्रोमैटिक कैमरा लगा हुआ है जो बेहत उच्च स्तर की तस्वीरें खींच सकता है.
इसके ज़रिए ऐसे तथ्य मिल सकेंगे जिनका इस्तेमाल शहरी और ग्रमीण इलाक़ों में आधारभूत ढाँचे के प्रबंधन में हो सकता है.
पिछले वर्ष भारत के पीएसएलवी-सी7 से पहली बार चार उपग्रहों को एक साथ प्रक्षेपित किया गया था. इनमें दो उपग्रह अर्जेंटीना और इंडोनेशिया के थे.

अपना हाथ-जगन्नाथ लेकिन कौन सा?

Good News!
चिकित्सा विज्ञान ये मानता है कि हमारा मस्तिष्क बाएँ और दाएँ दो भागों में बंटा हुआ है और बांया हिस्सा दाएँ की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली है. सभी जानते हैं कि मस्तिष्क हमारे शरीर का नियंत्रण करता है. मस्तिष्क से नाड़ियां शरीर के अलग अलग हिस्सों में जाती हैं और शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करती हैं. बाएँ हिस्से से निकलने वाली नाड़ियां गरदन पर आकर शरीर के दाएँ हिस्से में चली जाती हैं जबकि दाएँ हिस्से से आने वाली नाड़ियां शरीर के बाएँ भाग में. यानी शरीर के विभिन्न अंग मस्तिष्क के विपरीत हिस्सों से जुड़े होते हैं.
आमतौर पर लोगों के मस्तिष्क का बायाँ हिस्सा अधिक शक्तिशाली होता है लेकिन कुछ लोगों में दायाँ हिस्सा ज़्यादा प्रमुख रहता है और ऐसे लोग बाएँ हाथ से काम करते हैं. दुनिया में कोई चार प्रतिशत लोग बाएँ हाथ से काम करते हैं. लेकिन इन चार प्रतिशत में बहुत से नामी गिरामी लोग आते हैं जैसे अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति जॉन एफ़ कैनेडी और बिल क्लिंटन, महारानी विक्टोरिया, वैज्ञानिक और कलाकार लियोनार्डो डा विंची, फ़िल्म निर्देशक चार्ली चैपलिन, क्यूबा के राष्ट्रपति फ़िदेल कास्त्रो, अमिताभ बच्चन और सौरव गांगुली.

वाल्मीकि रामायण, तुलसी रामायण!

Good News!
तुलसी रामायण का नाम रामचरित मानस है और इसकी रचना सोलहवीं शताब्दी के अंत में गोस्वामी तुलसीदास ने अवधि बोली में की. जबकि वाल्मीकि रामायण कोई तीन हज़ार साल पहले संस्कृत में लिखी गई थी. इसके रचयिता वाल्मीकि को आदि कवि भी कहा जाता है. क्योंकि उन्होंने अपने इस अदभुत ग्रंथ में दशरथ और कौशल्या पुत्र राम जैसे एक ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम की जीवन गाथा लिखी जो उसके बाद के कवियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी. उसके बाद अलग-अलग काल में और विभिन्न भाषाओं में रामायण की रचना हुई. लेकिन प्रत्येक रामायण का केंद्र बिंदु वाल्मीकि रामायण ही रही है. बारहवीं सदी में तमिल भाषा में कम्पण रामायण, तेरहवीं सदी में थाई भाषा में लिखी रामकीयन और कम्बोडियाई रामायण, पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी में उड़िया रामायण और कृतिबास की बँगला रामायण प्रसिद्ध हैं लेकिन इन सबमें तुलसी दास की रामचरित मानस सबसे प्रसिद्ध रामायण है.

Saturday, April 26, 2008

टी आर पी रेटिंग क्या होती है.

Good News!
टी आर पी का मतलब है टेलिविज़न रेटिंग पौइन्ट्स. एक तरह से ये टेलिविज़न कार्यक्रमों की लोकप्रियता मापने का तरीक़ा है जिसमें विभिन्न कार्यक्रमों को अंक दिये जाते हैं. ये काम टेलिविज़न ऑडिएन्स मैज़रमैंट संस्था करती है. होता ये है कि टैम देश भर में कई छोटे बड़े शहरों का चयन करके उसमें विभिन्न वर्ग के लोगों के घर तलाश करती है और फिर उनके टेलिविज़न पर एक मीटर लगाती है. ये एक छोटा सा काला बक्सा होता है जो ये नोट करता है कि आपने कब कितनी देर कौन से टेलिविज़न चैनल का कौन सा कार्यक्रम देखा. महीने के अंत में ये आंकडे जुटाकर उनका विश्लेषण किया जाता है और उससे पता चलता है कि कौन सा कार्यक्रम कितना लोकप्रिय है.

बाटा शू कंपनी के संस्थापक कौन थे


Good News! बाटा शू कंपनी की स्थापना 1894 में तोहमहश बाहत्याह ने ज़्लिन में की थी जो अब चैक रिपब्लिक का शहर है. अगर इनका नाम रोमन लिपि में लिखा जाए तो टॉमस बाटा पढ़ा जाएगा. शायद इसीलिए दुनिया भर में यह बाटा के नाम से मशहूर हुआ. टॉमस बाटा के परिवार में कई पीढ़ियों से जूते बनाने का काम होता था. लेकिन जब पहला विश्व युद्ध छिड़ा तो सेना को भारी संख्या में जूतों की ज़रूरत पड़ी. बाटा ने इस ज़रूरत को समझा और औद्योगिक स्तर पर जूते बनाने का काम शुरू किया. इस कंपनी का मुख्यालय अब स्विट्ज़रलैंड के लौज़ैन शहर में है, 26 देशों में जूते बनाने की फ़ैक्टरियाँ हैं और 50 से भी अधिक देशों में इसके जूतों की दुकानें हैं.

हँसी का क्या मोल!

GoodNews!
मंद-मंद हँसी यानी मुस्कुराहट तो व्यक्तित्व में ख़ुशमिज़ाजी लाती ही है, अनेक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ज़ोर-ज़ोर से हँसना भी स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है. जब हम हँसते हैं तो हमारे चेहरे की कई मांसपेशियां इसमें क्रियाशील होती हैं, हमारी भंवे चढ़ती हैं, हमारे कान हिलते हैं, आंखे मिचती हैं, नथुनें फूलते हैं, ऊपर का होंठ फैलता है, नीचे का होंठ हिलता है, ठोड़ी हिलती है, गाल पीछे होते हैं... कुल मिलाकर हमारे चेहरे की 53 मांसपेशियों का हँसने में कुछ न कुछ योगदान रहता है. हँसने में चेहरे की ही नहीं बल्कि जबड़े, गले, पेट और डाएफ़्राम की माँसपेशियाँ भी काम करती हैं. और अगर बहुत ज़ोर ज़ोर से हँसा जाए तो शायद शरीर की और माँसपेशियाँ भी क्रियाशील हो जाती होंगी.

याहू का पूरा नाम क्या है?


GoodNews! याहू डॉटकॉम की स्थापना अमरीका के स्टैनफ़र्ड विश्वविद्यालय में इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी कर रहे दो छात्रों, डेविड फ़िलो और जैरी यांग ने 1994 में की थी. यह वेबसाइट जैरी ऐन्ड डेविड्स गाइड टू द वर्ल्ड-वाइड-वैब के नाम से शुरु हुई थी लेकिन फिर उसे एक नया नाम मिला, यट अनदर हाइरार्किकल ऑफ़िशियस ओरैकिल. जिसका संक्षिप्त रूप बनता है याहू. जैरी और डेविड ने इसकी शुरुआत इंटरनेट पर अपनी व्यक्तिगत रुचियों के लिंकों की एक गाइड के रूप में की थी लेकिन फिर वह बढ़ती चली गई. फिर उन्होंने उसे श्रेणीबद्ध करना शुरु किया. जब वह भी बहुत लम्बी हो गई तो उसकी उप-श्रेणियां बनाईं. कुछ ही समय में उनके विश्वविद्यालय के बाहर भी लोग इस वेबसाइट का प्रयोग करने लगे. अप्रैल 1995 में सैकोया कैपिटल कम्पनी की माली मदद से याहू को एक कम्पनी के रूप में शुरू किया गया. इसका मुख्यालय कैलिफ़ोर्निया में है और यूरोप, एशिया, लातीनी अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमरीका में इसके कार्यालय हैं.

Friday, April 25, 2008

तितली आसन से शांत रहता है मन

GoodNews!
आसन को परिभाषित करते हुए महर्षि पतंजलि ने कहा है, "स्थिरं सुखम् आसनम्." इसका अर्थ यह है कि आसन वह है जिसके करने से मन एवं शरीर में स्थिरता आए और सुख का अनुभव हो.
शुरू-शुरू में शरीर में इतनी लचक नहीं होती कि हम स्थिरतापूर्वक बैठकर ध्यान कर सकें. अब तक हमनें जोड़ों से संबंधित छोटे-छोटे आसन सीखें हैं.जिससे हमें मुख्य आसन सीखने में कोई परेशानी न हो.
आसन का लक्ष्य भी यही है कि हम अपने आप को ध्यान के लिए तैयार कर सकें.
इसे प्राप्त करने के लिए हमें सतत प्रयास करते रहना चाहिए. आसन हमें आध्यात्मिक रूप से भी तैयार करता है.
तितली आसन
तितली आसन और पदमासन एक दूसरे के पूरक हैं. जो लोग पदमासन नहीं कर सकते हैं उन्हें तितली आसन का अभ्यास करना चाहिए. जिससे की बाद में वे पदमासन का अभ्यास आसानी से कर सकें.
कैसे लगाएं आसन
कंबल को ज़मीन पर दोहरा बिछाकर उस पर बैठ जाएं. दोनों पैरों को सामने की ओर फैला लें. दोनों पैरों को घुटनों से मोड़ें और दोनों तलवों को आपस में मिला लें.
इस स्थिति में हाथों से पैरों की अंगुलियों को उसके पास से पकड़ें और एड़ी को ज़्यादा से ज़्यादा शरीर के क़रीब लाने का प्रयास करें.
यह करते हुए कोशिश करें कि हाथ सीधे रहें और शरीर को भी पूरी तरह सीधा रखें. जिससे रीढ़ की हड्डी भी सीधी हो जाए.
सांस को सामान्य रहने दें और दोनों पैरों के घुटनों को एक साथ ऊपर की ओर लाएं और नीचे लाते हुए प्रयास करें कि ज़मीन को न छूने पाए.
इस तरह अपने पैरों को लगातार 20-25 बार ऊपर-नीचे की ओर ले जाएं, ध्यान रखें की झटका न लगे.
इसके बाद पैरों को धीरे-धीरे सीधा कर लें और कुछ समय तक शरीर को ढीला छोड़ दें.
यह तितली आसन का एक क्रम है. आप चाहें तो इसे दो-तीन बार कर सकते हैं.
ऐसा न करें
ज़्यादा जोर न लगाएं. इस आसन को करने की जो विधि बताई गई है उसी के अनुसार अभ्यास करें. सांस को सामान्य रखें.
जिन लोगों को साइटिका की बीमारी हो या कमर के नीचले हिस्से में दर्द हो वे लोग तितली आसन का अभ्यास न करें.
तितली आसन के फ़ायदे
इसे करने से पैरों की मांसपेशियां इस तरह हो जाती हैं कि हम पदमासन या पालथी मारकर बैठ सकें.
इसे करने से जांघों की मांसपेशियों में आया तनाव या खिंचाव कम होता है. अधिक देर तक खड़े रहने या चलने के बाद तितली आसन करने से थकान दूर हो जाती है.
पदमासन
कंबल को ज़मीन पर इस प्रकार बिछाकर बैठें की दोनों पैर सामने की ओर रहे.
एक पैर को घुटने से मोड़ें और पैर के तलवे को दूसरे पैर की जांघ के ऊपर रखें.
इसके लिए आप हाथों का सहारा ले सकते हैं. पैर के तलवे को ज़्यादा से ज़्यादा क़रीब लाने का प्रयास करें.
इसी तरह दूसरे पैर को भी मोड़कर जांघ पर रखें. इस स्थिति में दोनों पैरों के घुटने ज़मीन से न छूने नहीं चाहिए, अगर छू भी जाएं तो कोई बात नहीं है.
पदमासन के अभ्यास से शरीर और मन शांत होता है. लगातार अभ्यास से एकाग्राता भी बढ़ती है
इस आसन को करते समय कमर, गर्दन और रीढ़ की हड्डी को सीध रखें और कंधों को ढीला. दोनों हथेलियों को घुटनों पर रखें ज्ञान या चिन्न की मुद्रा में.आंखें बंद कर लें और पूरे शरीर में शिथिलता महसूस करें.
इस दौरान शरीर को न ज़्यादा आगे की ओर झुकाएं और न पीछे की ओर. इस तरह बैठें की शरीर का संतुलन बना रहे.
सावधानियां बरतें
जो लोग साइटिका से पीडि़त हों, कमर दर्द हो, घुटने कमजोर हों या किसी तरह की चोट लगी हुई हो वे पदमासन का अभ्यास न करें.
घुटनों के जोड़ और मांसपेशियों को ढीला करने के लिए पहले जानू आसन का अभ्यास कर सकते हैं.
पदमासन के लाभ
पदमासन एक ध्यानात्मक आसन है. इसके अभ्यास से शरीर और मन शांत होता है. पदमासन का लगातार अभ्यास करने से एकाग्राता भी बढ़ती है.
चूंकि सांस धीरे-धीरे स्थिर हो जाती है, जिससे पूरे शरीर में स्थिरता आती है. इस आसन को करने से ब्लड प्रेशर भी सामान्य होता है.
पाचन तंत्र को ठीक करने में भी पदमासन सहायक हो सकता है.क्योंकि खून का संचार पैर की ओर कम रहता है. इसका केंद्र नाभी के पास ज़्यादा रहता है.
पदमासन एक पारंपरिक आसन है. प्राणायाम के अभ्यास के लिए पदमासन को प्रथम श्रेणी में रखा गया है. इसलिए अगर देखा जाए तो पदमासन हर तरह से एक उपयोगी आसन है.